सबके अपने अपने दांव

  • 29 नवंबर 2011
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Image caption कांग्रेस आसानी से रिटेल पर अपने फ़ैसले को आसानी से पलटने तैयार नहीं दिखती

यूपीए-दो की शुरुआत से दबे हुए से दिख रहे कांग्रेस के अपने साथी दल कांग्रेस को परेशान कर रहे हैं और अपनी सरकार में स्थिति को वज़नदार बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

तृणमूल कांग्रेस और डीएमके की तरह के यह दल और संसद चलाने में कोई मदद नहीं कर रहे हैं बल्कि विपक्ष के सुर में सुर मिला रहे हैं.

भाजपा इस खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश की बात पर किसी भी तरह से मत विभाजन करना चाहती है जिससे सरकार बचना चाहती है.

भाजपा के मत विभाजन की बात पर इतना जोर देने के पीछे यूपीए के दलों से मिल रहा समर्थन भी एक पहलू है.

'भीतर का दबाव'

मंगलवार सुबह बेनतीजा रही सर्वदलीय बैठक के भीतर हाल बताते हुए राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा," संसद में अधिकाँश सांसद क्या चाहते हैं यह सुबह की सर्वदलीय बैठक में झलक रहा था. तृणमूल और डीएमके के बैठक में खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश के फ़ैसले को फ़ौरन वापस लेने की बात कही. मुस्लिम लीग के ई अहमद का रुख भी इसी प्रकार का था."

अरुण जेटली के अनुसार केंद्रीय कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सर्वेसर्वा शरद पवार ने उस बैठक में कहा कि वो खुद तो विदेशी निवेश के पक्षधर हैं लेकिन वो इस पर मत विभाजन कराना चाहते हैं ताकि संसद चल सके.

तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, मुस्लिम लीग और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कुल मिला कर 50 सांसद हैं.

अगर सरकार खुदरा पर विदेशी निवेश पर मत विभाजन की बात मान जाती है और मतदान में वो हार जाती है तो विपक्ष इसके खिलाफ़ अविश्वास का प्रस्ताव लाकर एक नई परेशानी खड़ी कर देगा. जितने भी यूपीए के घटक इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं उन सबको कांग्रेस और केंद्र सरकार से अलग अलग परेशानी है.

तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ़ बंगाल में यूथ कांग्रेस रैलियाँ निकाल रही है. तमिलनाडू की डीएमके टूजी घोटाले की जांच से परेशान है, मुस्लिम लीग के ई अहमद जो की बरसों से राज्य मंत्री हैं वो पदोन्नति की आशा रखते हैं. शरद पवार और उनकी पार्टी माहाराष्ट्र में लवासा टाउनशिप परियोजना में अपने ऊपर उंगली उठाए जाने से चिढ़े हैं.

कलह और फ़ायदा

कांग्रेस की दिक्कत महज़ इतनी ही नहीं है. उसके अपने नेता उत्तर प्रदेश से सुल्तानपुर से सांसद संजय सिंह विपक्ष की ही तरह इस फ़ैसले का खुल कर विरोध कर रहे हैं. इसी तरह केरल कांग्रेस के अध्यक्ष रमेश चेन्नीथला ने प्रधानमंत्री को इसके खिलाफ़ एक ख़त लिख दिया है.

लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने गुरुवार को सर्वदलीय बैठक के बाद सवाल उठाया कि आखिर ऐसे समय पर जब संसद पहले ही से महंगाई और काले धन के मसले पर ठप्प पड़ी थी तो ये फ़ैसला लेने की क्या ज़रुरत थी?

सुषमा स्वराज ने पूछा, "सभी विपक्षी दलों ने यह सवाल पूछा कि आखिर क्या मसला आन पड़ा कि सरकार ने इसी समय यह फ़ैसला लिया."

फ़ैसले न करने के आरोपों से घिरी कांग्रेस के लिए एफ़डीआई के फ़ैसले ने इतना फायदा तो पहुंचाया ही कि बहस इस बात पर हो रही है कि सरकार क्या कर रही है बजाय इसके कि सरकार क्या नहीं कर रही हैं.

इसके अलावा भारत के भीतर से लगातार उद्योग जगत सरकार के खिलाफ़ बयान दे रहा था कि उसने ने किसी भी तरह का निर्णय लेना बंद कर दिया है. दूसरी तरह संसद के बाहर अन्ना हज़ारे दिसंबर से फिर सरकार के खिलाफ़ आंदोलन की घोषणा कर चुके हैं.

इन तमाम दिक्कतों से घिरी कांग्रेस ने शायद इसीलिए इतना ख़तरा उठाया. मंगलवार को दोपहर में बेनतीजा रही सर्वदलीय बैठक के चंद घंटों के भीतर ही यूथ कांग्रेस के एक सम्मलेन में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा खुदरा व्यापार की लाभों को गिनाया और साफ़ कर दिया कि सरकार इस निर्णय को वापस लेने के मूड में नहीं है.

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