क्यों नहीं चल रही है संसद?

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption संसद के वर्तमान सत्र में अब तक संसद एक दिन भी ठीक ढंग से नहीं चली

भारतीय संसद में हर पक्ष कह रहा है कि वो संसद चलाना चाहता है लेकिन संसद बावजूद उसके चल नहीं रही.

सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों कहते हैं वो रिटेल में पूँजी निवेश पर बातचीत करने के लिए तैयार हैं लेकिन गतिरोध बना हुआ है. पूरे विवाद की धुरी है स्थगन प्रस्ताव. इस मुद्दे पर के भिन्न पहलुओं पर जमी धुंध हटाने के लिए अविनाश दत्त ने बातचीत की लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप से.

स्थगन प्रस्ताव है क्या और इस पर लोक सभा में गतिरोध क्यों बना हुआ है?

स्थगन प्रस्ताव में पहले बहस होती है और बहस के बाद मतदान होता है.

अगर सरकार स्थगन प्रस्ताव के मतदान में हार जाती है तो इसे सरकार की निंदा माना जाता है. सरकार यह नहीं चाहती कि उसकी निंदा के भाव वाले किसी प्रस्ताव पर मतदान हो.

लेकिन सरकार तो कह रही है कि वो स्थगन प्रस्ताव के लिए तैयार है बस उसका और विपक्ष का विरोध प्रस्ताव की भाषा पर है. भाषा इतनी महत्पूर्ण क्यों है?

सरकार कह रही है कि किसी भी विषय पर किसी दूसरे नियम के तहत बहस कर लो मतदान ना कराओ.

सरकार यह भी कह रही है कि अगर स्थगन प्रस्ताव पर बहस कराओ तो इसका विषय गोलमोल रखो साफ़ ना रखो. भारतीय जनता पार्टी यह कह रही है कि प्रस्ताव में यह हो कि रिटेल के क्षेत्र में विदेशी निवेश का फ़ैसला रद्द हो जिसके लिए सरकार किसी भी क़ीमत पर तैयार नहीं है.

मान लीजिये कि अगर इस प्रस्ताव में सरकार हार गई और उसकी निंदा हो भी गई तो क्या फ़र्क पड़ेगा? राजनेताओं से बेहतर यह कोई नहीं जानता कि हर काम में तारीफ़ नहीं हो सकती ?

सरकार इस मसले पर इसलिए अड़ी हुई क्योंकि उसे अपने बहुमत पर भरोसा नहीं है.

डीएमके और तृणमूल कॉंग्रेस जैसे घटक दल सरकार के खिलाफ़ इस मसले पर मतदान कर सकते हैं. अगर सरकार को पूरा भरोसा होता कि वो स्थगन प्रस्ताव को हरा देगी तो वो इस मुद्दे पर नहीं अड़ते.

क्या इसका अर्थ यह है कि अगर सरकार स्थगन प्रस्ताव में हार जाती है तो भारतीय जनता पार्टी को मौका मिल जाएगा सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का और सरकार पर गिरने का ख़तरा पैदा हो जाएगा ?

नहीं इसका अर्थ यह नहीं है.

स्थगन प्रस्ताव में हारने का यह मतलब नहीं है कि सरकार को इस्तीफ़ा देना ही होगा.

सरकार के घटक दल हो सकता है कि इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ़ मतदान करें लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि वो सरकार गिराने में भाजपा का पक्ष लें. पर हाँ इससे सरकार दबाव में तो आ ही जाएगी.

क्या यूपीए के घटक दल सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं और उसे दबाव में डाल कर अपना वज़न बढ़ाना चाहते हैं?

गठबंधन की राजनीति का सबसे बड़ा सरदर्द ही यही है.

जब से गठबंधन की राजनीति शुरू हुई है सरकार को समर्थन देने वाले घटक दल हमेशा सरकार को ब्लैकमेल करते हैं और सरकार से अपना हिस्सा चाहते हैं.

हर बार सरकार को अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए इनकी बात माननी पड़ती है.

संबंधित समाचार