भोपाल गैस पीड़ितों पर लाठीचार्ज

भोपाल गैस पीड़ित (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption भोपाल गैस पीड़ित ढाई दशकों से भी अधिक समय से संघर्ष कर रहे हैं

भोपाल गैस पीड़ितों और कार्यकर्ताओं द्वारा शनिवार को आयोजित रेल रोको आंदोलन हिंसक हो गया है. कई लोग घायल हुए हैं.

ट्रेन रोकने के लिये इकठ्ठा हुए सैकड़ों गैस पीड़ितों ने जब पुलिस की चेतावनी के बाद भी रेल लाईनों से हटने से इंकार कर दिया तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, जिसके बाद भीड़ बेकाबू हो गई.

स्थानीय पत्रकार एस नियाज़ी के अनुसार भोपाल के ऐशबाग क्षेत्र में ट्रेन रोकने के प्रयास के बाद भड़की भीड़ ने लगभग 15 सरकारी वाहनों में तोड़ फोड़ की और आग लगा दी.

भोपाल से दिल्ली जाने वाला ट्रेन मार्ग पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गया है.

भीड़ पर काबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा जिसमें कई लोग घायल हुए है.

कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव का कहना है कि आदोंलनकारियों को समझाने की पूरी कोशिश की गई थी और उसके बाद ही उन पर लाठीचार्ज किया गया.

मुआवज़े की जंग

गैस त्रासदी की 27वीं बरसी पर मुआवज़े का इंतज़ार कर रहे गैस पीड़ितों और उनके परिजनों ने अनिश्चितकालीन रेल रोको आंदोलन का आह्वान किया था.

मुआवज़े के लिए जूझ रहे कई संगठनों ने लोगों से अपील की थी कि वे भोपाल से होकर गुज़रने वाली ट्रेनों से सफ़र न करे.

इससे पहले शुक्रवार को पाँच संगठनों ने डाओ केमिकल्स को ओलंपिक-2012 का प्रायोजक बनाए जाने के विरोध में एक रैली निकाली थी.

उन्होंने ओलंपिक आयोजन समिति के चेयरमैन सेबेस्टियन को के पुतले भी जलाए.

साल 1984 में दो और तीन दिसंबर की दरम्यानी रात मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में डाओ केमिकल्स के संयंत्र यूनियन कार्बाइड से रिसी ज़हरीली गैस से हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी और दसियों हज़ार घायल हो गए थे.

इस मामले में 1989 में हुए एक समझौते के अनुसार डाओ केमिकल्स ने 750 करोड़ रुपए का मुआवज़ा देने को राज़ी हुआ था लेकिन गैस पीड़ित इस राशि को अपर्याप्त मानते हैं और इसे लेकर वे अदालत में मुक़दमा भी लड़ रहे हैं.

आंदोलन

गैस पीड़ितों के हक़ के लिए लड़ रहे पाँचों संगठनों ने तीन दिसंबर से अनिश्चितकालीन रेल रोको का आह्वान किया था.

एक वेबसाइट पर कहा है, "अगर आप तीन दिसंबर को यात्रा कर रहे हैं तो अपना रिज़र्वेशन अभी रद्द कर लीजिए. इससे आपको होने वाली असुविधा का हमें खेद है लेकिन प्रधानमंत्री और सरकार तक अपना महत्वपूर्ण संदेश पहुँचाने के लिए हमें यही एकमात्र प्रभावशाली तरीक़ा दिखता है."

संगठनों का कहना है कि वे लंबे समय से सरकार से बातचीत करने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन इसका अब तक कोई असर नहीं हुआ है.

ऐसे में इस तरह का आंदोलन ही एक रास्ता बचा है.

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