जेल से मॉल तक

  • 6 दिसंबर 2011
सेलेक्ट सिटीवॉक मॉल में टीजेज़ का काउंटर
Image caption तिहाड़ जेल के कैदियों का बनाया सामान टीजेज़ ब्रांड के तहत दिल्ली के सेलेक्ट सिटीवॉक में बेचा जा रहा है.

पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली के तिहाड़ जेल में क़ैदियों के सुधार और पुनर्वास के लिए कई क़दम उठाए गए हैं. उन्हें तरह-तरह के काम सिखाए जा रहें हैं जिससे वे सज़ा ख़त्म होने के बाद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके.

जेल के विभिन्न कारख़ानों में इन क़ैदियों के ज़रिए बनाए गए सामान ‘टीजेज़’ के नाम से भी बेचे जाते हैं. सामान में मसाले, नमकीन, हाथ से बने काग़ज़ के उत्पाद, कपड़े, हथकरघा, बेकरी और लकड़ी के उत्पाद शामिल हैं.

अब तक टीजेज़ उत्पाद तिहाड़ जेल के अलावा दिल्ली के विभिन्न न्यायालय परिसर, केंद्रीय भंडार, खादी भंडार, गांधी स्मृति, कुछ सरकारी और शिक्षण संस्थानों और प्रदर्शनियों में बेचे जाते थे.

लेकिन अब इनको मिला है एक नया पता.

नया पता

दक्षिणी दिल्ली का एक उच्चवर्गीय इलाक़ा है साकेत जहां कई वर्ग मील में फैला है सेलेक्ट सिटी वॉक शॉपिंग मॉल. इस मॉल में कई देशी-विदेशी ब्रैंड्स के महंगे-से-महंगा सामान बिकता है.

इन बड़े-बड़े नामों के बीच हाल ही में एक छोटी सी शुरूआत की है टीजेज़ ब्रैंड ने.

इतने बड़े मॉल में एक स्थायी काउंटर खोलने की वजह तिहाड़ के जनसंपर्क अधिकारी सुनील कुमार ने कुछ इस तरह बताई, "इस साल दिवाली पर हमने टीजेज़ उत्पादों की सेलेक्ट सिटी वॉक मॉल में प्रदर्शनी लगाई थी जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया था. उस प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर हमने सोचा कि क्यों न यहां पर अपने सामान का एक स्थायी आउटलेट खोला जाए. हमने जब मॉल के अधिकारियों से इस बारी में बात की, तो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी हमारा प्रस्ताव मान लिया."

सुनील कुमार के मुताबिक़ इस चुनाव की एक और वजह भी थी. वे कहते हैं, "एक और भी बात थी. यह पढ़े-लिखे लोगों का इलाक़ा है जिस वजह से लोगों का जेल सुधारों के प्रति बहुत सकारात्मक रवैया रहता है. इसीलिए हमने वहां से शुरुआत की."

शुरुआत किसी बड़े चमचमाते हुए शोरूम से नहीं बल्कि मॉल की एक कार पार्किंग से हुई है. यहां पर लगभग 15x15 फ़ुट की जगह में कुछ मेज़ो पर सजे हैं बिस्कुट, नमकीन, कमीज़े, दरियां, सरसों का तेल, फ़ाईल कवर. इस काउंटर को रवि कुमार संभाल रहे हैं.

जगह भले ही छोटी है लेकिन रवि कुमार की आवाज़ में छलकता उत्साह बताता है कि हौसले बुलंद हैं, "यहां पर हमें बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. जो भी आता है, वो कुछ-न-कुछ ख़रीद कर ही जाता है. छुट्टी वाले दिन पांच हज़ार रूपए तक बिक्री हो रही है और बाक़ी सप्ताह डेढ़ से दो हज़ार तक. अभी तो हम यहां पार्किंग में हैं, इसलिए ज़्यादा लोगों को हमारे बारे में नहीं पता. लेकिन अगर हमें ऊपर (मुख्य मॉल) में जगह मिल जाए, तो हमारी बिक्री बहुत बढ़िया जाएगी."

बदलता नज़रिया

जिस मॉल में बिकने वाले कई उत्पादों की क़ीमत ही हज़ारों में हों, वहां एक दिन में ज़्यादा-से-ज़्यादा पांच हज़ार रूपए कमाई की बात सुनने में शायद कुछ अजीब लगे.

लेकिन सुनील कुमार कहते हैं कि मक़सद मुनाफ़ा कमाना नहीं बल्कि लोगों का नज़रिया बदलना है.

उन्होंने कहा, "हम कभी भी इस काम को मुनाफ़े या नुक़्सान के नज़रिए से नहीं देखते. असली मक़सद आम जनता को जानकारी देना है कि तिहाड़ में क़ैदी हैं जो इस तरह का काम करते हैं जिससे लोगों का इनके प्रति सकारात्मक रवैया रहे. ताकि जब ये क़ैदी जेल से छूट कर जाएं तो लोग इनसे नफ़रत न करें बल्कि इनकी मदद के लिए आगे बढ़ें."

Image caption दिल्ली के तिहाड़ जेल में कैदियों के सुधार और पुनर्वास के लिए उन्हें तरह-तरह के काम सिखाए जाते हैं.

टीजेज़ के काउंटर पर सामान देख रहीं स्वाति का क़ैदियों के सुधार के लिए उठाए गए इस क़दम के बारे में कहना था, "ये एक अच्छा विचार है कि क़ैदियों को काम सीखने और उसे इस्तेमाल करने का मौक़ा मिल रहा है. इस तरह से जेल से छूटने के बाद भी उनके पास रोज़गार का एक ज़रिया हो जाता है."

दिल्ली के अशोक विहार इलाक़े में एक प्ले स्कूल चला रहे राजीव गुप्ता ने जब तिहाड़ में बने सामान के सेलेक्ट सिटीवॉक में काउंटर खुलने की बात अख़बार में पढ़ी, तो उनके मन में भी अपने स्कूल में टीजेज़ के उत्पाद रखने का विचार आया.

राजीव गुप्ता का कहना था, "ये विज्ञापन पढ़ने के बाद मेरे मन में विचार आया कि जब सरकार और तिहाड़ के अधिकारी क़ैदियों को सही राह पर लाने की इस तरह की कोशिशें कर रहे हैं, तो क्या हम जैसे, पढ़े-लिखे समाज में रहने वाले लोग उसमें अपना योगदान नहीं दे सकते."

तीस-वर्षीय ललित लगभग आठ साल से जेल में हैं और जेल की नमकीन बनाने वाली फ़ैक्टरी में काम करते हैं.

जो काम ललित ने यहां पर सीखा है वो जेल से छूटने के बाद उसे ही व्यवसाय के तौर पर अपनाना चाहते हैं. ललित कहते हैं, "हम यहां से कुछ अच्छा काम सीख कर जाएंगे, तो अपने मां-बाप और बाक़ी परिवार की मदद कर पाएंगे और अच्छी ज़िंदगी जी सकेंगे."

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