'बुंदेलखंड पैकेज में हो रहा है भ्रष्टाचार'

  • 8 दिसंबर 2011
बुंदेलखंड के किसान
Image caption जन-सुनवाई के दौरान सैंकड़ों किसानों ने अपनी परेशानियों का बयान किया.

पिछले एक दशक से सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड के त्रस्त किसानों के लिए बृहस्पतिवार को दिल्ली में एक सार्वजनिक सुनवाई का आयोजन किया गया.

सुनवाई के दौरान किसानों पर बढ़ता क़र्ज़, बढ़ते क़र्ज़ के दबाव में आकर हो रही आत्महत्याएं, गांवों में पानी की किल्लत, सूखा और किसानों के शहरों की ओर हो रहे पलायन जैसे मुद्दों को उजागर किया गया.

बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग के सात ज़िलों और पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के छह ज़िलों से मिलकर बना एक विशाल क्षेत्र हैं, जो भारत के सबसे कम विकसित भागों में से एक है.

दशकों से सूखे की मार की वजह से बुंदेलखंड में इसी साल के शुरुआती पांच महीनों में 519 किसानों ने आत्महत्या की, जबकि 2010 में ये सालाना आंकड़ा 583 था.

साल 2009 में केंद्रीय सरकार ने बुंदेलखंड के लिए 7,226 करोड़ रुपए का एक विशेष आर्थिक पैकेज जारी किया था, लेकिन दिल्ली आए किसानों की शिकायत है कि सरकार की इस घोषणा के दो साल बाद भी उस पैकेज का लाभ उन तक तिनका भर भी नहीं पहुंचा है.

झांसी से आए श्रीराम नरेश ने बताया, “अधिकारी बहुत भ्रष्ट हो गए हैं, जिसका नतीजा हम किसानों को भुगतना पड़ रहा है. हमारे लिए बनाए हुए पैकेज का फ़ायदा हम तक ही नहीं पहुंच रहा है. अधिकारी सिर्फ़ पैसा खाने की सोचते हैं. कोई ये नहीं सोचता कि सूखे से निपटने के लिए हमारे लिए गांव में कुँए बनाए जाएं. दिल्ली से पैसा राज्य में आता है, लेकिन निचले स्तर तक पहुंचते पहुंचते वो पैसा न जाने कहां ग़ायब हो जाता है.”

धांधली

ग़ैर सरकारी संस्था एक्शन ऐड की स्थानीय प्रोग्राम मैनेजर गुरजीत कौर का कहना है कि 2009 से लेकर अब तक, सरकारी पैकेज की केवल 11 प्रतिशत राशि ही इस्तेमाल हो पाई है.

उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में बिगड़ते हालात को देखते हुए पैकेज के कार्यान्वयन की गति को बढ़ाना बेहद ज़रूरी है.

उन्होंने कहा, “पैकेज तो सरकार ने दे दिया, लेकिन इसके कार्यान्वयन के रास्ते में जितनी अड़चनें आ रही हैं, उस पर सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है. सबसे बड़ी मुसीबत है भ्रष्टाचार. दूसरी ओर इस पैकेज के लागू किए जाने की प्रक्रिया में कहीं भी आम लोगों की सहभागिता नहीं है. गांवों में जो प्रभुत्व वाले लोग हैं, उन्हीं को ही पैकेज के लाभ मिल रहे हैं. सूखे की स्थिति से निपटने के लिए ज़मीनी स्तर पर जिस तरह की दूरदर्शी योजना होनी चाहिए, उसका कहीं न कहीं अभाव है.”

बुंदेलखंड के लिए दिए गए सरकारी विशेष पैकेज में धांधली के आरोपों के बीच मुख्यमंत्री मायावती की ये शिकायत है कि केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड को 80,000 करोड़ रुपए के पैकेज की स्वीकृति नहीं दी.

दोहरी मार

Image caption पति की आत्महत्या के सालों बाद भी विमला यादव को मुआवज़ा नहीं मिला है.

सार्वजनिक सुनवाई में किसानों का पक्ष रखने आए आपदा निवारक मंच के मुताबिक़ बुंदेलखंड की लगभग 86 प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है.

ग़ैर-सरकारी संस्था एक्शन ऐड का कहना है कि बुंदेलखंड में 75 प्रतिशत परिवार क़र्ज़ में डूबे हुए हैं और हर परिवार पर औसतन 45,000 रुपए का क़र्ज़ बकाया है.

दमोह ज़िले से दिल्ली आई विमला यादव के पति ने क़र्ज़ के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली थी.

पति के स्वर्ग सिधारने के तुरंत बाद ससुराल वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया. विमला आज भी अपने पति की मौत के मुआवज़े का इंतज़ार कर रही है.

विमला अपनी आपबीती का बयान करते हुए कहती हैं, “क़र्ज़ से दुखी होकर मेरे पति ने ज़हर पी लिया था. इसके बाद मेरे देवर और सास ने मिलकर मुझे घर से निकाल दिया, जिसके बाद मुझे अपने माइके लौटना पड़ा. मेरी तीन बेटियां है. इनके भविष्य की चिंता मुझे खाए जा रही है. लेकिन अब मुझे मुआवज़े की भी आस नहीं है. मैं और मेरे पिताजी जब अधिकारियों के पास मुआवज़ा मांगने जाते हैं, तो हमें लताड़ दिया जाता है.”

केवल बुंदेलखंड विशेष फ़ंड में ही नहीं बल्कि दूसरी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में भी धड़ल्ले से हो रही धांधली की मार किसान को झेलनी पड़ रही है.

जहां एक ओर विमला यादव अपने मुआवज़े की लड़ाई लड़ रही है, वहीं टीकमगढ़ से आए सीता राम पाल मनरेगा में हो रही धांधली को उजागर करने के मक़सद से दिल्ली आए.

मनरेगा की राशि के दरुपयोग को साबित करने वाले बहुत से दस्तावेज़ हाथों में लहराते हुए सीता राम कहते हैं, “मेरी पत्नी की साल 2003 में मौत हो गई थी. लेकिन मेरी जानकारी से परे उसके नाम का फ़र्ज़ी जॉब कार्ड बना कर सरपंच और सचिव ने उसके नाम का वेतन अपनी जेब में रख लिया.”

सीता राम जैसे कई किसानों की कुछ ऐसी ही कहानियां थीं.

कई किसानों का कहना है कि मनरेगा के अंतर्गत भी उन्हें नौकरी न मिल पाने की वजह से ज़्यादा से ज़्यादा किसान शहरों का रुख़ कर रहे हैं.

बंटवारे से फ़ायदा?

Image caption सीता राम पाल का आरोप है कि उनके गांव में मनरेगा योजना के फ़ंड का दुरुपयोग किया जा रहा है.

उत्तर प्रदेश के चुनाव नज़दीक हैं और इस बीच चुनावी गहमा-गहमी बढ़ती नज़र आ रही है.

उत्तर प्रदेश के कई पिछडे हुए इलाकों में अब नेताओं के आने-जाने की ख़बरें आ रही हैं.

पिछले दिनों योजना आयोग के अध्यक्ष मोन्टेक सिंह आहलुवालिया भी बुंदेलखंड की स्थिति का जायज़ा लेने वहां पहुंचे थे.

जहां कांग्रेस के नेता यूपी के पिछड़े इलाकों का दौरा कर अपना चुनावी कार्ड खेल रहे हैं, वहीं मायावती ने राज्य के बंटवारे की बात कर चुनावी सरगर्मी बढ़ा दी है.

कुछ लोगों ने मायावती की इस घोषणा को केवल एक चुनावी हथकंडा बताया था लेकिन सभा में मौजूद कुछ किसानों का मानना था कि बुंदेलखंड के नए राज्य बन जाने से उनकी स्थिति में सुधार आने की उम्मीद है.

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