मुस्लिम युवाओं को मुआवज़े पर मुहर

मक्का मस्जिद
Image caption मक्का मस्जिद में जुम्मे की नमाज़ के दौरान बम विस्फोट में छह लोगों की मौत हो गई थी और उसके बाद पुलिस फायरिंग में नौ और लोग मारे गए थे.

भारत में अपनी तरह की पहली घटना में आंध्र प्रदेश की सरकार ने उन मुस्लिम युवाओं को मुआवज़ा दिए जाने की घोषणा की है जिन्हें पाँच साल पहले मक्का मस्जिद में हुए बम धमाकों के मामले में गलत तरीक़े से पकड़ा गया था.

राज्य के मुख्य मंत्री किरण कुमार रेड्डी विधानसभा में पहले ही यह मान चुके है कि इस मामले में पुलिस के कुछ अधिकारियों ने गलत कार्रवाई की थी. इस मामले पर उन्होंने समुदाय विशेष से माफ़ी भी मांगी थी.

पीड़ित युवाओं को मुआवज़ा देना उन छह सिफ़ारिशों में से एक है जो राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने चार महीने पहले आंध्र प्रदेश सरकार को भेजी थी.

मुआवज़ा देने के संबंध में राज्य सरकार ने एक औपचारिक आदेश भी जारी किया जिसमें कहा गया है कि 20 पीड़ित युवाओं को तीन-तीन लाख रूपए और 50 अन्य पीड़ित लोगों को 20 हज़ार रूपए मुआवज़ा दिया जाएगा.

राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के सचिव मोहम्मद अली रफ़त ने बीबीसी से कहा कि जिन युवाओं को गिरफ्तार करके बाद में छोड़ दिया गया था उन्हें बीस हज़ार रुपये मिलेंगे.

मुआवज़ा

इस मामले में अदालत से बरी किए गए जिन लोगों पर देश के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे उन्हें तीन-तीन लाख रूपए देने की घोषणा की गई है.

रफत ने इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया और कहा कि इससे उन युवाओं के ज़ख्मों पर मरहम लगाने में सहायता मिलेगी.

जबकि इन युवाओं को न्याय दिलाने के लिए काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व सेना अधिकारी मेजर सैय्यद घौस कादरी ने मुआवज़े को कम बताया.

उन्होने कहा, "यह मुआवज़ा बहुत ही कम है. एक लाख करोड़ से भी ज्यादा की वार्षिक बजट वाली सरकार के पास क्या इन निर्दोष युवाओं की सहायता के लिए पैसे नहीं है जिनका जीवन कुछ पुलिस अधिकारियों ने बर्बाद कर दिया".

मेजर कादरी ने आपत्ती इस बात पर भी उठाई है कि मुआवज़े का पैसा मक्का मस्जिद की मरम्मत के लिए रखे गए राशि से लिया जाएगा.

उन्होने कहा, "हमारी असली लड़ाई न्याय के लिए है. अल्पसंख्यक आयोग ने भी कहा था कि मुआवज़े की राशि उन्ही पुलिस अधिकारियों की जेब से ली जाए जिन्होने इन निर्दोष युवाओं को निशाना बनाया था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ है".

आयोग की दूसरी सिफा़रिशों में यह बात भी शामिल थी कि इन युवाओं को अच्छा चरित्र रखने का सर्टिफिकेट दिया जाए और उन्हें सरकारी नौकरी भी दी जाए.

रफ़त का कहना है की दूसरी सिफा़रिशों पर अभी काम जारी है.

बम धमाका

हैदराबाद की मक्का मस्जिद में 18 मई 2007 को जुम्मे की नमाज़ के दौरान बम विस्फोट में छह लोगों की मौत हो गई थी.उसके बाद पुलिस फायरिंग में नौ और लोग मारे गए थे.

इसके तुरंत बाद पुलिस ने यह कहते हुए बड़े पैमाने पर ये कहते हुए मुसलमान युवाओं की गिरफ़्तारी शुरू कर दी थी कि ये विस्फोट मुस्लिम चरमपंथी संगठनों ने किया है.

इस मामले पर मुसलमानों के अनेक संगठनों की तरफ से काफ़ी विरोध हुआ लेकिन गिरफ्तार किए गए युवाओं को फर्ज़ी मामलों में कई सालों तक उलझाए रखा गया.

बाद में राज्य सरकार ने इसकी छानबीन की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो को दी और उसी ने यह खुलासा किया कि यह बम विस्फोट हिन्दू चरमपंथियों ने किया था.

इस मामले में सीबीआई अब तक स्वामी असीमानंद समेत पांच लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है.

चुनौती

मुआवज़े की घोषणा पर पीड़ितों ने मिली जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की जिनका जीवन इस पूरे मामले ने अस्तव्यस्त करके रख दिया था.

पीड़ितों में से एक असलम सिद्दीकी ने कहा है की उनके लिए मुआवज़े से ज्यादा ज़रूरी अच्छा चरित्र प्रमाण पत्र है.

एक अन्य पीड़ित डॉ इब्राहिम जुनैद ने कहा, "अदालत ने मुझे निर्दोष बताते हुए बरी कर दिया था लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. जब मुझे एक नौकरी मिली तो पुलिसवालों ने दबाव डाल कर मुझे वहाँ से भी निकलवा दिया".

अब भी इन युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो पुलिस के लगाए हुए धब्बों से छुटकारा पाकर एक सामान्य जीवन बिता पाए.

संबंधित समाचार