बिना परीक्षा के 'डाक्टर' का सुझाव नामंज़ूर

यूनिवर्सिटी
Image caption विश्वविद्यालय ने कापियों की बार कोडिंग भी की ताकि परीक्षक छात्र को न पहचान सकें.

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के उस सुझाव को नामंजूर कर दिया है जिसमें लगातार फ़ेल हो रहे छात्रों को बिना इम्तिहान के डिग्री (एम बी बी एस) देने की सिफ़ारिश की गई थी.

विश्वविद्यालय ने ये सिफ़ारिश भी की थी कि भविष्य में इम्तिहान में बैठने के लिए एक निश्चित समयावधि तय कर दी जाए.

मेडिकल काउंसिल की सचिव डा. संगीता शर्मा ने कुलपति को भेजे एक पत्र में कहा है कि बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने अपनी बैठक में नियमों को शिथिल करने के सुझाव पर विचार करने के बाद फैसला किया है कि वर्तमान नियम को लागू रखा जाए.

वर्तमान नियमों मेडिकल की परीक्षा में पास होने के लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल में न्यूनतम 50 फ़ीसद नंबर लाना ज़रूरी है.

न केवल लखनऊ बल्कि भारत के अन्य मेडिकल कालेजों में भी बहुत से छात्र ऐसे हैं जो दस-पन्द्रह सालों में भी एम बी बी एस का इम्तिहान नहीं पास कर पाए हैं.

इनमे से अधिकांश छात्र रिज़र्व श्रेणी के हैं, जिन्हें कम अंकों के आधार पर दाख़िला मिलता है.

सालों से फेल हो रहे है

लखनऊ के मशहूर किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज या छत्रपति शाहूजी महराज मेडिकल यूनिवर्सिटी में इस समय क़रीब 50 ऐसे छात्र हैं जो सालों से एम बी बी एस का इम्तिहान पास नहीं कर पाए हैं. सबसे पुराना छात्र 1985 बैच का है.

विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार इनमें तीन चौथाई से ज्यादा छात्र अनुसूचित जातियों के है.

विश्वविद्यालय ने ऐसे छात्रों के लिए अलग से क्लासेस चलवाईं, फीस माफ़ की, किताबें दीं लेकिन ये फ़िर भी परीक्षा पास नही कर पाए.

कुलपति प्रोफ़ेसर डी के गुप्ता ने हाल में ही मेडिकल की शिक्षा की देख-रेख करने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि अभी तक जो पांच नंबर का ग्रेस मार्क केवल एक विषय में दिया जाता है उसे दो या अधिक विषयों में वितरित करके फ़ेल हो रहें छात्रों को पास करने में मदद की जाए.

दूसरा सुझाव यह था कि चूंकि आरक्षित छात्रों को न्यूनतम 40 फीसदी नंबर पर दाख़िला मिलता है तो इनका पास प्रतिशत भी घटाकर 40 कर दिया जाना चाहिए.

कई सालों से फ़ेल हो रहें छात्रों के बारे में कुलपति ने सुझाव दिया था कि इस ग्रुप को अब बिना और कोई इम्तिहान दिए डिग्री देने पर विचार किया जाना चाहिए.

उन्होंने ये भी कहा था कि भविष्य के लिए काउंसिल पुराने नियम को बहाल करते हुए परीक्षा पास करने के लिए अधिकतम समयावधि तय कर दे.

समय सीमा की सुझाव

उन्होंने सुझाव दिया कि साढ़े चार साल का एम बी बी एस कोर्स पास करने के लिए किसी भी छात्र को अधिकतम नौ साल का समय दिया जाए जिसमें एक प्रोफेशनल साल के इम्तिहान को पास करने के लिए अधिकतम तीन मौक़े मिलने चाहिंए

दरअसल पहले इस मामले में जो नियम लागू था वो इसी आधार पर था लेकिन साल 1997 में मेडिकल काउंसिल ने इसे ख़त्म करके मेडिकल छात्रों को बिना किसी मियाद तक पढ़ने और इम्तिहान पास करने की सुविधा दे दी थी.

लेकिन मेडिकल काउंसिल ने पुरानी व्यवस्था बहाल करने, पास प्रतिशत कम करने या पुराने फ़ेल छात्रों को यूं ही पास किए जाने का सुझाव फिलहाल नामंज़ूर कर दिया है.

इससे पहले इन छात्रों की तरफ से अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत की गई थी कि वे आरक्षित वर्ग के हैं इसलिए परिक्षक जानबूझकर उन्हें कम नंबर देते हैं.

हालांकि सुनवाई के बाद कमीशन ने यह शिकायत ख़ारिज कर दी थी.

शिकायत के मद्देनज़र यूनिवर्सिटी ने कापियों की बार कोडिंग कर दी थी ताकि परीक्षकों को छात्र की पहचान न हो सके यानि उन्हें ये पता न चल पाए कि कापी किस छात्र की है.

पक्षपात का आरोप

चूंकि स्थानीय प्रोफेसर्स पर पक्षपात का आरोप था इसलिए यूनिवर्सिटी ने बाहर के परीक्षक बुलवाए. मगर नतीजा नहीं बदला. ये छात्र पास होने के लिए ज़रूरी पचास फ़ीसदी नंबर नही ला पाए.

विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार छात्रों को यह प्रस्ताव भी दिया गया कि वे परीक्षकों के नाम स्वयं बता दें, जो उत्तर पुस्तिकाओं में लिखी गई सामग्री के आधार पर कापी जांच कर उनको नंबर दे सकें.

हाईकोर्ट का आदेश है कि अगर परीक्षक उत्तर पुस्तिका में लिखी गई बातों को नजरअंदाज कर नंबर देते हैं तो उन्हें जुर्माना हो सकता है. इसलिए कोई परीक्षक उदारता करते हुए ज्यादा नंबर नहीं दे सकता है.

हार मानकर यूनिवर्सिटी ने मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया को मशविरा दिया था कि इनके लिए पास का परसेंटेज कम करने के अलावा परीक्षा पद्धति में कुछ और बदलाव किये जाने चाहिए.

प्रोफ़ेसर गुप्ता का कहना है कि यह एक मानवीय समस्या है और वह उसका समाधान करना चाहते हैं.

शिक्षकों का कहना है कि इलाहाबाद, झांसी, मेरठ और देश के दूसरे मेडिकल कालेजों में भी यह समस्या है लेकिन कोई इसका हल ढूंढने की कोशिश नहीं कर रहा.

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