एक महाराजा की अग्रेज़ों को चुनौती...

महाराज सयाजी राव
Image caption महाराज सयाजी राव तृतीय ने अपने राज्य में साल 1906 में मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का नियम शुरू किया.

एक तरफ़ दिल्ली अपनी शान के सौ साल पूरा करने जा रहा है वही एक भारतीय महाराजा के साहस और शान का मिसालनामा एक अंग्रेज़ नौकरशाह की डायरी में पाया गया है. हाल ही में मिली ये डायरी खो चुकी थी.

आज से क़रीब सौ साल पहले, एक लाख लोगों और डायरी के लेखक लिलाह विंगफील्ड की मौजूदगी में बड़ौदा के गायकवाड़ यानि महाराज सयाजी राव तृतीय ब्रितानी सम्राट के समक्ष पेश हुए.

जहाँ हर कोई तीन बार सिर झुकाकर सम्राट के प्रति सम्मान व्यक्त कर रहे थे, वहीं सयाजी राव सिर्फ़ एक बार झुके और फिर पलट कर, जॉर्ज पंचम को पीठ दिखाते हुए वापस लौट आए.

जिस समारोह में सयाजी राव ने ये साहसी काम किया वह प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस समय से 60 साल पहले तक की किसी भी शाही शादी से बड़ी थी.

साल 1911 की दिल्ली दरबार यानि आम सभा आयोजित किए जाने वाले दिनों में जॉर्ज पंचम भारत की अंग्रेज़ी शासन के राजा थे.

अंग्रेज़ो के शान में की 'गुस्ताखी'

दिल्ली दरबार में अंग्रेज़ी साम्राज्य के पदाधिकारी और भारतीय राजे-रजवाड़े आए थे और सभी के रहने का बंदोबस्त दिल्ली के पास तंबूओं से बसाए गए शहर में किया गया था.

उन दिनों हर भारतीय राजा को तत्कालीन अंग्रेज़ शासक के सामने तीन बार झुककर बिना पीठ दिखाए उल्टे चलना होता था.

महाराज सयाजी ने न केवल पीठ दिखाकर अंग्रेज़ों की बेइज्ज़ती की बल्कि उनपर कथित तौर पर हँसकर चले दिए.

लिलाह विंगफील्ड की देखी हुई ये बाते उनकी पोती जेसिका डगलस होम ने एक किताब में लिखी हैं. ये किताब जेसिका ने अपने भारत भ्रमण के दौरान लिखी थी.

Image caption जेसिका डगलस होम के पास अपनी दादी माँ लिलाह विंगफील्ड की दिल्ली दरबार की तस्वीरें अब तक है

जेसिका डगलस होम के पास अपनी दादी की दिल्ली दरबार की तस्वीरें तो थी लेकिन लिलाह विंगफील्ड की टिप्पणियों के साथ वाली डायरी खो चुकी थी. ये डायरी पुरानी किताबें बेचनेवाले एक दुकान में पाई गई जहां से इसे डगलस होम को दे दिया गया.

अपनी किताब 'ए ग्लिंप्स ऑफ़ एंपायर' में डगलस होम ने लिखा, ''पता चलता है कि हैदराबाद के निज़ाम के बाद दूसरे सबसे अहम रजवाड़े सयाजी राव ने भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की किताब का हर क़ानून तोड़ा है.''

डगलस होम ने आगे लिखा, ''दरबार में अंग्रेज़ राजा और रानी के शामियाने तक आने के बाद सयाजी राव हल्के से झुके और पीठ फेरकर अपनी सुनहरी लाठी को ठकठकाते हुए चल दिए.''

'भौंचक रह गए सब'

डगलस होम के मुताबिक़ महाराजा के इस अंदाज़ को देखकर सारे अंग्रेज़ अधिकारी भौंचक रह गए.

तब से साल 1939 में उनकी मृत्यु तक अंग्रेज़ी हुकुमत ने उनका बहिष्कार जारी रखा.

घटना के कुछ दिनों के भीतर ही सयाजी राव ने एक चिठ्ठी लिखकर अपने व्यवहार की माफ़ी मांग ली थी. उन्होने लिखा था कि वह अंग्रेज़ शासकों को देखकर घबरा गये थे.

साल 1919 में महाराजा और अंग्रेज़ों के बीच के रिश्ते में कुछ सुधार आया था जब उन्हे 'नाईट ग्रैंड कमांडर' की उपाधि दी गई थी.

सयाजी राव कोई आम भारतीय रजवाड़े नहीं थे. उनका नाम देश के कुछ समाज सुधारकों में आता है.

वे पहले भारतीय राजा थे जिन्होने अपने राज्य में साल 1906 में मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का नियम शुरू किया.

बड़ौदा में कपड़ा व्यवसाय और बैंकिंग को प्रचलित करने में भी सयाजी राव का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है.

लेकिन वर्तमान भारत में उन्हें डॉ भीमराव अंबेडकर को कोलंबिया विश्वविद्यालय में तीन साल तक पढा़ई करने के लिए छात्रवृति दिए जाने के लिए याद किया जाता है.

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