राजनीतिक दलों ने दी अन्ना को सलाह

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Image caption अन्ना हज़ारे ने अपने पिछले आंदोलनों में राजनीतिक पार्टियों का बहिष्कार किया था.

जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे अन्ना हज़ारे के मंच पर विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने कुछ हिदायतों के साथ उनका समर्थन किया है.

भारतीय जनता पार्टी, जनता दल युनाइटेड, समाजवादी पार्टी, तेलुगु देसम पार्टी, अकाली दल, वामदल और बीजू जनता दल के सांसदों और प्रतिनिधियों ने जनता को संबोधित करते हुए मज़बूत लोकपाल विधेयक की मांग की.

इन सभी दलों ने प्रधानमंत्री, सीबीआई और तृतीय श्रेणिय सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने की अन्ना की मांग की हिमायत की है, लेकिन कुछ राजनेताओं ने अन्ना को सुझाव दिया है कि वे अपने तरीकों में लचीलापन लाएं.

सीपीआई पार्टी के महासचिव एबी बर्धन ने मंच पर अन्ना को सलाह देते हुए कहा, “टीम अन्ना ये अपेक्षा न करे कि जो भी उन्होंने जन-लोकपाल में लिखा है, उसका अगर हर शब्द, हर पूर्णविराम और अर्धविराम मंज़ूर हो जाएगा, तभी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी जाएगी. मैं ये समझता हूं कि उस रवैये में लचीलापन होना चाहिए और आपको भी औरों के पक्ष को सुनना चाहिए.”

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव ने जनता को संबोधित करते हुए कहा कि ये ज़रूरी नहीं कि संसद में अन्ना टीम की हर मांग मान ली जाए.

उनके इस बयान पर जनता ने कड़ा रोष व्यक्त किया और नारेबाज़ी शुरू कर दी. लोगों के ग़ुस्से को ठंडा करने के लिए खुद अन्ना हज़ारे को लोगों से अपील करनी पड़ी.

लेकिन अन्ना को बाहरी समर्थन देते हुए जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि संसद में लोकपाल के मसौदे पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए और अंतिम फ़ैसला संसद में ही होना चाहिए.

शरद यादव ने कहा, “लोकपाल पर जल्दी हो या कम समय में हो, लेकिन जब संसद में इस मुद्दे पर ज़्यादा बहस होगी, तभी आपका पक्ष मज़बूत रहेगा. अगर लोकपाल के मसौदे पर कम ही बहस हुई तो चूं-चूं के मुरब्बे जैसा ही लोकपाल बनेगा, जिस पर हमारा कोई बस नहीं होगा. या तो शीतकालीन सत्र की अवधि को बढ़ाया जाए, या एक ख़ास सत्र बुलाया जाए लोकपाल पर घनघोर बहस की जाए.”

मंच पर मौजूद सभी पार्टियों ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की अपील की.

खेल के नियम

लोकपाल पर खुली बहस की शुरुआत अरविंद केजरीवाल ने सभी राजनेताओं की आवभगत से की, लेकिन वे उन्हें साफ़ तौर पर कई नियम भी बताते चले.

अरविंद केजरीवाल ने कहा, “हम आप सभी राजनेताओं को चाय-कॉफ़ी तो नहीं पिला पाएंगें, लेकिन हां पानी ज़रूर ऑफ़र कर सकते हैं.”

हर राजनेता को मंच पर बोलने से पहले हिदायत दी गई कि वे अपने बयान को पांच से दस मिनट के भीतर ही सीमित रखें.

सभी राजनेताओं ने अपने बयान के शुरुआती दो मिनट अन्ना हज़ारे का आभार व्यक्त करने और उनकी प्रशंसा करने में बिताए.

कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस बहस से दूर रहे, लेकिन विपक्षी पार्टियों ने इस मौक़े का पूरा फ़ायदा उठाने की कोशिश की.

जहां वामदल ने इस मंच का इस्तेमाल कॉर्पोरेट जगत पर हमला करने के लिए किया, वहीं भाजपा नेता अरुण जेटली ने सीबीआई के कथित दुरुपयोग पर कांग्रस को आड़े हाथों लिया.

किसे किसकी ज़रूरत?

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Image caption अन्ना के समर्थन में जंतर मंतर पर जुटी जनता ने बहस के दौरान राजनेताओं के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी शुरू कर दी.

इस सब के बीच रेखांकित करने वाली बात ये थी कि जिन राजनीतिक पार्टियों का टीम अन्ना ने अपने पिछले दो अनशनों में बहिष्कार किया था, आज वही राजनीतिक पार्टियां टीम अन्ना के साथ एक ही मंच पर दिखाई दे रही थीं.

दोनों पक्षों के बीच लोकपाल पर होने वाली ‘सकारात्मक’ बहस के बीच ये मालूम नहीं चल रहा था कि किसे किसकी ज़्यादा ज़रूरत है.

जहां टीम अन्ना ने अपने पिछले आंदोलनों में लगभग सभी राजनेताओं को भ्रष्ट बताया और उनका मज़ाक उड़ाया, वहीं आज जंतर मंतर पर दोनों पक्ष एक-दूसरे को बराबर मौका देने की कोशिश कर रहे थे.

टीम अन्ना ने भले ही अपनी रणनीति में बदलाव किया हो, लेकिन उनके समर्थन में बैठे हज़ारों लोग अपने पक्षपाती रवैये से बाज़ नहीं आए.

देखा जाए तो लोकपाल पर होने वाली ये सार्वजनिक बहस एकतरफ़ा ही थी क्योंकि जब-जब लोगों को राजनेताओं की बातें अच्छी नहीं लगी, तब-तब उन्होंने नारेबाज़ी शुरू कर दी.

लोगों को शांत करने के लिए अन्ना और केजरीवाल को बार-बार लोगों से अपील करनी पड़ी.

ऐसे में ए बी बर्धन और बृंदा कराट ने राजनीति की छवि पर लगी धूल को झाड़ने की कोशिश की और कहा कि सभी नेताओं को भ्रष्ट कहना सही नहीं है.

‘संसद की अवहेलना’

एक तरफ़ जहां सभी पार्टियां जनता के साथ मिल कर लोकपाल पर बहस करने जंतर मंतर पहुंचे, उधर अलग-थलग पड़ी कांग्रेस पार्टी ने अन्ना पर आरोप लगाया कि वो संसद की अवहेलना कर रहे हैं.

कांग्रेस के प्रवक्ता राशिद अल्वी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “विरोध-प्रदर्शन करना अन्ना जी का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन सोनिया जी और राहुल गांधी पर सीधे तौर से प्रहार करना ये दर्शाता है कि अन्ना लोकपाल के मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं.”

उधर पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि क़ानून सड़कों पर नहीं, संसद में बनाए जाते हैं.

संसद के दोनों सदनों में लोकपाल विधेयक के मसौदे पर स्थाई समिति की रिपोर्ट पेश कर दी गई है लेकिन लेकिन अन्ना हज़ारे इस बिल के मसौदे से नाखु़श हैं.

प्रधानमंत्री को लोकपाल में शामिल किए जाने पर ये सुझाव रखे गए हैं– लोकपाल के दायरे में लेकिन सुरक्षा के प्रावधानों के साथ, लोकपाल के दायरे में लेकिन अभियोजन प्रक्रिया पद छोड़ने के बाद ही या लोकपाल के दायरे से बाहर.

लेकिन अन्ना का कहना है कि ये मसौदा बेहद कमज़ोर है और इससे भ्रष्टाचार घटने के बजाए बढ़ जाएगा.

अन्ना ने कहा है कि अगर इसी सत्र के दौरान उनकी शर्तें न मानी गईं, तो वे 27 दिसंबर से अनिश्चितकाल भूख हड़ताल पर बैठेंगें.

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