बेरोज़गारी के साथ मेरा संघर्ष

अनिल कुमार
Image caption अनिल कुमार डेढ़ साल से नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं.

विश्व भर में भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी के मुद्दे पर हो रही चर्चाओं की गूंज भारत में भी सुनी जा सकती है.

बीबीसी वर्लड सर्विस के सर्वेक्षण के नतीजे को प्रामाणिक बनाने वाले भारत में भी कई उदाहरण दिखते हैं.

ऐसा ही एक उदाहरण हैं 22 वर्षीय अनिल कुमार, जो बेरोज़ग़ारी के साथ अपने संघर्ष का बयान कर रहे हैं.

"मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक डिग्री के लिए पढ़ाई कर रहा हूं और साथ ही पिछले डेढ़ साल से नौकरी की तलाश कर रहा हूं.

इस बीच मैंने दिल्ली परिवहन निगम में बस कंडक्टर की नौकरी पाने के लिए विभाग से प्रशिक्षण हासिल किया.

जब ट्रेनिंग पूरी हुई, तो कंडक्टर की नौकरी के लिए आवेदन पत्र डाल दिया, लेकिन वहां से अब तक कोई जवाब नहीं आया है.

कई और जगह भी नौकरी के लिए इंटरव्यू दिया, लेकिन सिर्फ़ यही जवाब मिलता कि ‘फ़ोन पर आपको जवाब बता देंगें’. वो फ़ोन कॉल आज तक नहीं आया.

हर सुबह एक नई उम्मीद के साथ घर से निकलता हूं, लेकिन ज़्यादातर इंटरव्यू में अजीबो-ग़रीब सवाल पूछ लिए जाते हैं.

और फिर वही जवाब मिलता है... ‘फ़ोन पर आपको जवाब बता देंगें.’

दिमाग़ परेशान हो जाता है कभी-कभी. लगातार हताशा का चेहरा देखना अच्छा नहीं लगता.

बेरोज़गारी पर चर्चा

हर रोज़ तकरीबन पांच-छह बार मैं अपने परिवार वालों और दोस्तों से नौकरी के बारे में चर्चा करता हूं.

हर दोस्त को फ़ोन कर लगातार पूछता रहता हूं कि उनकी नज़र में कहीं कोई नौकरी तो नहीं निकली है.

दोस्तों के किसी रिश्तेदार की अगर किसी बड़े पद पर नियुक्ति होती है, तो उससे गुज़ारिश करता हूं कि मेरी उनसे थोड़ी सिफ़ारिश कर दें.

आख़िरकार, आजकल के ज़माने में नौकरी पाने के लिए किसी बड़े अफ़सर का हवाला देना बहुत ज़रूरी है.

आजकल हर विभाग में प्रतिस्पर्धा इतनी ज़्यादा बढ़ गई है कि नौकरी पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है.

हाल ही में दिल्ली पुलिस विभाग में 2,500 नौकरियां निकली थीं, और उन सभी नौकरियों के लिए लाखों नौजवानों ने आवेदन पत्र भरा.

ऐसे में बहुत मुश्किल है अपने लिए एक जगह बनाना.

संघर्ष करने से मैं नहीं डरता, लेकिन भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और आरक्षण जैसी अड़चनें मेरे रास्ते का कांटा बन गई हैं.

कमज़ोरी

ज़्यादातर नौकरियां तो भाई-भतीजावाद के ज़रिए ही दी जाती हैं और फिर भ्रष्टाचार की दोहरी मार.

बड़े-बड़े विभागों में तो नौकरी के लिए भी मोटी रक़म की मांग की जाती है.

छोटे से छोटे पद के लिए भी आजकल पांच लाख से कम की रिश्वत की मांग नहीं की जाती और घूस देने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं मिलती कि नौकरी मिल ही जाएगी.

कभी भ्रष्टाचार की मार झेलनी पड़ती है, तो कभी ख़ुद की ही ख़ामियां ले डुबोती हैं.

विश्व में भले ही आर्थिक मंदी की मार की वजह से नौकरियों की कमी हो गई हो, लेकिन भारत में नौजवानों के बेरोज़गार होने की सबसे बड़ी वजह मैं भ्रष्टाचार को ही मानता हूं.

हमारे मंत्रियों को नौजवानों की बेरोज़गारी की कम और पैसे खाने की चिंता ज़्यादा लगी रहती है".

(बीबीसी संवाददाता शालू यादव से बातचीत पर आधारित)

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