व्यापारियों में डर कितना सही?

  • 29 दिसंबर 2011
Image caption ख़ुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव से छोटे व्यापारियों के मन में बहुत शंकाएं हैं.

भारत के तमाम बड़े और मध्यम-वर्गीय शहरों में रिहायशी इलाकों के पास छोटी दुकानों में घी-तेल, दूध-ब्रेड, दाल-आटा, बिस्कुट-नमकीन, शैम्पू-टूथपेस्ट जैसी तमाम चीज़ें मिलती हैं.

किराने कि एक छोटी दुकान- काउंटर के उस पार ज़रूरी नहीं कि सामान करीने से लगा हो लेकिन अक़्सर जो नहीं भी दिख रहा होगा, माँगने पर मिल जाएगा.

दिल्ली की एक कॉलोनी के पास सुभाष चन्द बंसल की भी ऐसी एक दुकान है. लेकिन रिलायंस फ्रेश और बिग ऐप्पल जैसे बड़े नाम बाज़ार में आने के बाद बंसल को अपना भविष्य संकट में लगता है.

बंसल कहते हैं, “हम यहां 17 साल से दुकान चला रहे हैं, लेकिन इन बड़ी दुकानों के आने के बाद से, पिछले 4-5 सालों में हमारी बिक्री पर फ़र्क पड़ा है, और विदेशी निवेश वाले व्यापार में तो पैसा ज़्यादा होगा, निवेश ज़्यादा होगा, अब हम उसकी बराबरी थोड़े ही कर पाएंगे.”

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव फ़िलहाल सरकार ने वापस ले लिया है. लेकिन बंसल के मुताबिक़ अगर ऐसा हुआ तो उनके घाटे बढ़ जाएंगे, ग्राहक टूटेंगे और फिर वापस शायद ना आएं. उनके मुताबिक बहुत कम ही पहलू हैं जो ग्राहक को उनकी दुकान तक खींचेगे जैसे सामान लौटाने की सुविधा, घर से नज़दीकी और दुकानदार का आचार और अपनापन.

पास ही में हरीश बरेजा की ब्रान्डेड कॉस्मेटिक्स और होज़री कपड़ों की दुकान है. थोड़ी बड़ी है और सामान बाक़ायदा शो केस में सजा है.

बरेजा के मुताबिक उन्हें पिछले पांच-छह सालों में बाज़ार में उतरी बड़ी दुकानों और मॉल्स से ख़तरा नहीं लगता था पर अब इन विदेशी बड़ी दुकानों के आगे वो टिक नहीं पाएंगे.

बरेजा कहते हैं, “ये थोक में ख़रीदेंगे और इसलिए सस्ते दाम पर बेच पाएंगे, तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचेगा, जब ग्राहक नहीं आएगा तो अपने यहां काम करने वालों को तनख़्वाह ही नहीं दे पाएंगे, आख़िर हमें भी उन्हीं के पास नौकरी करनी पड़ेगी.”

उपभोक्ता की पसंद

भारत का नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा खुदरा उद्योग असंगठित है. यानि ऐसे ही छोटे व्यापारियों से बना. तो ख़रीदार का मन क्या इतनी जल्दी पाला बदल लेगा?

एक गृहिणी दीपिका जैन के मुताबिक उनकी पसंद घर के नज़दीक की छोटी दुकानें हैं क्योंकि वैसी विविधता मॉल में नहीं मिलती.

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Image caption बड़ी दुकानों में आकर्षक तरीके से रखा सामान, बड़ी ब्रान्ड्स औऱ कम दाम उपभोक्ता को आकर्षित करते हैं

दीपिका ने कहा, “गाड़ी लेकर जाओ, पार्किंग करो, सामान भी खुद बटोरो, फिर पैसे देने के लिए लंबी लाइन में लगो, घर तक सामान पहुंचाने का भी कोई तरीका नहीं, तो मॉल तक जाने मे ये सब दिक्कतें पेश आती है.”

वहीं क़रीब 25 वर्षीय पंकज ने कहा कि दोनों बाज़ारों की अपनी अहमियत है, “अगर कुछ ब्रान्डेड लेना हो, ख़ास लेना हो तो मैं मॉल जाना ही पसंद करता हूं लेकिन रोज़मर्रा के कपड़ों और बाक़ी चीज़ों के लिए पास का बाज़ार काफ़ी होता है.”

फिर मुझे मिलीं अमरीका से दिल्ली आईं अंजु सेतिया जो वॉलमार्ट और टेस्को जैसी बड़ी दुकानों का ख़ूब इस्तेमाल कर चुकी हैं.

अंजु ने कहा, “इससे उपभोक्ता को बहुत फ़ायदा होगा, क्योंकि वॉलमार्ट जैसी बड़ी दुकानों पर सामान की क्वालिटी भी बेहतर होती है और दाम भी कम.”

आधुनिक ख़ुदरा व्यापार

यानि उपभोक्ता अलग तो बाज़ार की उसकी पसंद भी अलग. तो क्या दोनों बाज़ार एक साथ बढ़ सकते हैं और क्या छोटे दुकानदारों का डर बेबुनियाद है?

संगठित खुदरा व्यापारियों के संगठन रीटेलर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कुमार राजगोपालन के मुताबिक विदेशी कंपनियों के आने के बाद भी छोटे दुकानदारों को नुक़सान नहीं होगा.

राजगोपालन कहते हैं, “उपभोक्ता तो व्यापार से भी तेज़ी से बदल रहा है, लेकिन मॉल और बड़ी दुकानों के आगे छोटे व्यापारी फिर भी टिक पाएंगे, शायद दस साल तक भी टिक जाएँ पर उन्हें बदलाव को अपनाना होगा. व्यापार के नए तरीके समझने होंगे, इंटरनेट जैसी सुविधाओं से जुड़े व्यापार के आयामों के प्रति सजग होना होगा और उन्हें अपने फायदे के मुताबिक़ इस्तेमाल करना होगा.”

राजगोपालन के मुताबिक भारत का ख़ुदरा व्यापार बदल रहा है और उसके पास आधुनिक होने के अलावा कोई विकल्प है भी नहीं.

भारत का संगठित खुदरा व्यापार फ़िलहाल बहुत छोटा है – कुल खुदरा व्यापार का दस फ़ीसदी से भी कम.

वहीं ‘द इकॉनॉमिस्ट अख़बार’ के मुताबिक चीन का संगठित खुदरा व्यापार, कुल व्यापार का 20 फ़ीसदी और अमरीका का संगठित खुदरा व्यापार, कुल व्यापार का 80 फ़ीसदी है.

साथ ही ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि भारत में आने वाले वर्षों में आबादी का ज़्यादा हिस्सा युवा है यानि उपभोक्ता वर्ग. ज़ाहिर है भारत के खुदरा बाज़ार के नए अवसरों का फ़ायदा उठाने की टक्कर होगी तो कांटे की ही.

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