लोकपाल पर नहीं बन सकी सर्वसम्मति

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Image caption मनमोहन सिंह चाहते थे कि संसद में विधेयक पेश करने से पहले ही इस पर सहमति बन सके

लोकपाल विधेयक पर चर्चा के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सर्वसम्मति नहीं बन सकी है.

बुधवार की रात ख़त्म हुई इस बैठक में प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने न रखने, निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों और सीबीआई को इसके दायरे में लाने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विभिन्न राजनीतिक दलों की राय अलग-अलग थी.

हालांकि बैठक की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद के शीतकालीन सत्र में ही लोकपाल विधेयक को पारित करने के लिए सभी दलों से सहयोग की अपील की थी लेकिन कोई रास्ता बनता दिखाई नहीं पड़ा.

अन्ना हज़ारे पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि यदि संसद के शीतकालीन सत्र में लोकपाल विधेयक पारित नहीं हुआ तो वे एक बार फिर आंदोलन करेंगे.

मतभेद

बैठक की शुरुआत करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, "मैं व्यक्तिगत रुप से चाहता हूँ कि ये महत्वपूर्व क़ानून जहाँ तक हो सके सभी दलों की सहमति से पारित हो सके और इसमें दलगत राजनीति आड़े नहीं आना चाहिए."

लेकिन तीन घंटे चली इस बैठक में सभी राजनीतिक दलों के विचार विरोधाभासी ही दिखे.

उदाहरण के तौर पर प्रमुख विपक्षी दल भाजपा चाहती थी कि ग्रुप सी और डी के सरकारी कर्मचारी लोकपाल के दायरे में लाए जाने चाहिए जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) इसके सख़्त ख़िलाफ़ थी.

सीपीआई नेता गुरुदास दासगुप्ता ने बैठक के बाद पत्रकारों से कहा कि चूंकि सी और डी ग्रुप के कर्मचारियों की संख्या लाखों में है इसलिए उन्हें लोकपाल के दायरे में न रखकर उनके भ्रष्टाचार पर निगरानी के लिए एक अगल व्यवस्था की जानी चाहिए.

वामपंथी दलों की मांग थी कि लोकपाल को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार भाजपा और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने सीबीआई के जाँच शाखा को लोकपाल के दायरे में लाने की अनुशंसा की.

Image caption अन्ना हज़ारे घोषणा कर चुके हैं कि यदि विधेयक पारित नहीं हुआ तो वे फिर से आंदोलन करेंगे

जबकि शिरोमणि अकाली दल का कहना था कि सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति में लोकपाल की भूमिका होनी चाहिए.

इससे पहले सीबीआई के निदेशक एपी सिंह को भी आमंत्रित किया गया था जिससे कि वे अपनी राय रख सकें और उनका कहना था कि वे सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाए जाने के विरोध में नहीं हैं लेकिन इसे टुकड़ों में नहीं बाँटना चाहिए.

जबकि टीम अन्ना चाहती है कि सीबीआई की जाँच शाखा को लोकपाल के दायरे में रखना चाहिए जिससे कि लोकपाल अपने मामलों की जाँच अपनी निगरानी में करवा सके.

हालांकि वामपंथी और दक्षिणपंथी दल इस बात पर एकमत थे कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए.

इस सर्वदलीय बैठक से पहले प्रधानमंत्री ने सत्तारूढ़ यूपीए के घटक दलों की एक बैठक बुलाई थी जिसमें सभी दलों में लोकपाल को लेकर सर्वसम्मति बन गई थी.

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