छोटे शहरों के कंधों पर विकास:नील्सन

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Image caption अगले दस सालों में भारत की आर्थिक वृद्धि की कमान छोटे शहरों के मध्यम वर्ग के हाथों में होगी

भारत के आर्थिक विकास के बारे में माना जाता रहा है कि उसकी गाड़ी का इंजन मेट्रो और अन्य बड़े शहर हैं मगर अब कहा जा रहा है कि उसे दिशा और गति छोटे शहर देंगे.

स्वतंत्र संस्था नील्सन के सर्वेक्षण में कहा गया है कि एक से दस लाख की आबादी वाले चार सौ शहरों में दस करोड़ मध्यम वर्ग के लोग हैं और वर्तमान में ये आबादी भारत में हाथो हाथ बिकने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की 20 फ़ीसदी खपत करती है.

इस समय भारत में तेज़ी से बिकने वाली इन उपभोक्ता वस्तुओं का बाज़ार 287 अरब रूपए का है, जो कि 2026 तक चार खरब रूपए का हो जाएगा.

इसका मतलब ये हुआ कि आने वाले समय में भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार अगर कोई तय करेगा तो वो मध्यम वर्ग ही होगा, न कि बड़े शहरों का उच्च या उच्च मध्यम वर्ग.

मध्यमवर्गीय भारत

सर्वे में पाया गया कि 2002 से भारत के छोटे शहरों में उपभोक्ता वस्तुओं का बाज़ार साढ़े तीन गुना बढ़ चुका है. पूरे भारत के लिए ये आंकड़ा 3.2 फ़ीसदी का है.

हाथों हाथ बिकने वाले 81 उपभोक्ता वस्तुओं की खपत के मामले में 49 वस्तुएं ऐसी हैं जिनका इस्तेमाल पिछले दो सालों में छोटे शहरों के मध्यम वर्ग में काफ़ी बढ़ा है.

सर्वे के मुताबिक़ 2010 से मई 2011 तक एक से दस लाख की आबादी वाले इन शहरों में उपभोक्ताओं के ज़रिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामानों में काफ़ी वृद्धि हुई. सबसे ज़्यादा बिक्री चीज़(पनीर) में देखी गई.

अन्य सामानों में बच्चों के इस्तेमाल में आने वाले डायपर, पैकटबंद चावल, आफ़्टरशेव लोशन, नारियल का तेल , शेविंग के सामान, सौंदर्य प्रसाधन, बैटरी, शीशा साफ़ करने वाला तरल , साबुन , केक, च्वयनप्राश, कफ़ सीरप, कंडोम , डिब्बाबंद चाय, एंटीसेप्टिक क्रीम, बेबी ऑयल, बिस्कुट, ग्लूकोज़ पाउडर जैसे सामान शामिल हैं.

सर्वे के मुताबिक़ चार सौ शहरों में सिर्फ़ पिछले तीन सालों में प्रति शहर 250 से ज़्यादा नए स्टोर खुले हैं.

जून 2008 में एक से दस लाख की आबादी वाले शहरों में आठ लाख 23 हज़ार स्टोर थे, जिनकी संख्या मई 2011 मे बढ़ कर नौ लाख 26 हज़ार तक पहुँच गई.

औसत के लिहाज़ से देखा जाए तो प्रति शहर 250 स्टोर की बढ़ोत्तरी हुई.

सबके पास मोबाइल फ़ोन

सर्वे में पाया गया कि छोटे शहरों के मध्यम वर्गीय परिवारों में मोबाइल का इस्तेमाल काफ़ी बढ़ा है.

सिर्फ़ कुल आबादी के छह फ़ीसदी हिस्से के पास ही अपना निजी फ़ोन नही है.

घर के फ़ोन की जगह अब मोबाइल फ़ोन ने ले ली है. यहाँ तक कि हर गृहणी के पास भी मोबाइल फ़ोन है. साथ ही मनोरंजन के लिए केबल टीवी का वर्चस्व है.

सोशल मीडिया

आश्चर्यजनक रूप से 78 फ़ीसदी छोटे शहरों की मध्यम वर्गीय आबादी ने कभी भी इंटरनेट का इस्तेमाल नही किया, लेकिन जिनके पास इंटरनेट उपलब्ध है उन्हें सोशल नेटवर्किंग, माइक्रोब्लॉगिंग साइटों की भरपूर जानकारी थी.

सर्वे का आधार

नील्सन संस्था ने ये सर्वे भारत के चार शहरों में किया जिसमें 25 से 30 साल की उम्र की कामकाजी महिलाओं,18 से 24 साल के युवक- युवतियों और 35 से 40 साल के कामकाजी पुरूषों से बात की गई.

ये सर्वे पंजाब के भटिंडा , आंध्र प्रदेश के अनंतपुर , महाराष्ट्र के नांदेड़, उत्तर प्रदेश के झांसी और महाराष्ट्र के पुणे में किया गया. इन शहरों में पुणे शहर को मध्यम वर्ग के लिए मानक शहर माना गया.

नील्सन के सर्वे में इन छोटे मध्यम वर्गीय शहरों में रहने वाले लोगों की जीवनशैली और उपभोक्ता वस्तुओं के इस्तेमाल की बदलती आदतों का अध्ययन किया गया.

सर्वे में पाया गया है कि यहाँ का मध्यम वर्ग बेहतर आमदनी के चलते उपभोक्ता वस्तुओं के इस्तेमाल अब ज़्यादा करने लगा है.

और बढ़ते मध्यम वर्ग की बढ़ती क्रय क्षमता की वजह से इन उपभोक्ता वस्तुओं को बनाने वाली कंपनियों की नज़र इस आकर्षक बाज़ार पर है.

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