अवैध त्रिकोण, सन्नाटा और सूना भविष्य

संग्रामपुर
Image caption पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में हुए इस हादसे में 160 लोग मारे गए है और 200 के ऊपर लोग अस्पताल में है

संग्रामपुर से दो-तीन किलोमीटर पहले से ही मरघट जैसी चुप्पी उस तूफ़ान का आभास देने लगती है जिसकी तबाही इलाक़े के कई गांवों में पसरी पड़ी है. कुछ आगे बढ़ने पर यह चुप्पी टूटती है लगभग हर दूसरे घर से आ रही महिलाओं और बच्चों के रोने-चीख़ने की आवाजों से.

हवा में शवों के सड़ने-गलने-जलने की बदबू भरी है. किसी घर के लोग शव को जलाने या दफ़नाने की तैयारी में जुटे हैं तो कोई अभी-अभी इससे निपट कर लौटा है.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से कोई 52 किलोमीटर दूर दक्षिण 24-परगना ज़िले के संग्रामपुर, मंदिरबाजार और उस्ती गांवों की ज़्यादातर आबादी ग़रीब है.

ज़हरीली शराब से सैकड़ों लोगों की मौत के बाद गुमनाम-सा संग्रामपुर गांव फ़िलहाल पूरी दुनिया में सुर्ख़ियों में है. लोग रिक्शा-ठेला खींच कर या फिर मज़दूरी करके दो जून की रोज़ी-रोटी का जुगाड़ करते हैं.

कड़ी मेहनत के बाद थकावट दूर करने और ग़रीबी का ग़म भूलाने के लिए ‘चोलाई’ के नाम से मशहूर कच्ची शराब का सहारा लेना उनकी दिनचर्या में शुमार है.

लेकिन यही दिनचर्या यहां डेढ़ सौ से भी ज़्यादा लोगों की मौत का सबब बन गई और अभी भी लगभग 200 लोग विभिन्न अस्पतालों में ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहें हैं.

जो लोग मरे हैं उनमें से ज़्यादातर घर के इकलौते कमाऊ सदस्य थे. उनकी मौत के बाद उनके परिवार की सबसे बड़ी चिंता दो जून की रोटी का जुगाड़ करना है.

बचत के नाम पर उन लोगों के पास शायद ढेला भी नहीं बचा है. मज़दूरी से मिली रक़म में घर का ख़र्च निकालने के बाद जो पैसा बचता था वह तो नज़दीक के शराब के ठेके पर पौव्वे (शराब) की भेंट चढ़ जाता था.

आमतौर पर लोग शाम को शराब पीते हैं. लेकिन इस इलाक़े के लोगों को तो नशे की ऐसी लत थी कि वे काम पर निकलने से पहले ही पौव्वा चढ़ा लेते थे. मंगलवार को भी रोज़ की तरह इन लोगों ने इलाक़े के चार अलग-अलग ठेकों पर पौव्वा चढ़ाया. लेकिन वह उनके जीवन का आख़िरी पौव्वा साबित हुआ. काम पर जाने की बजाय तमाम लोग अस्पतालों की ओर दौड़े जहां सैकड़ों की जान चली गई.

कौन बनाता है यह शराब

इस धंधे के एक कारोबारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कच्ची शराब बनाने वाले लोग बेहद कम अनुभवी होते हैं. ठेकेदार उनको कम पैसे में नौकरी में रखकर शराब बनाने के गुर सिखा देते हैं.

अनुभवहीनता की वजह से कभी मिथाइल या मिथेनॉल की मात्रा ज़्यादा हो गई तो वह शराब जानलेवा हो सकती है. इस घातक द्रव्य की थोड़ी मात्रा भी ज़हर का काम करती है. ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की नीयत से रखे गए नौसिखिए लोगों की एक मामूली ग़लती ने सैकड़ों घरों को सूना कर उन परिवारों को भूखमरी की राह पर धकेल दिया है.

कैसे बनती है चोलाई

Image caption जो लोग मरे हैं उनमें से ज़्यादातर घर के इकलौते कमाऊ सदस्य थे

पुलिस और आबकारी विभाग के लोग बताते हैं कि इन भट्ठियों में घरेलू प्रक्रिया से पहले गुड़ या चीनी के शीरे को सड़ा कर ईथाइल अल्कोहल तैयार किया जाता है. उसमें सड़ा हुआ चावल भी मिलाया जाता है. सबसे आख़िर में नशा बढ़ाने के लिए मिथाइल अल्कोहल और कीटनाशक मिलाए जाते हैं.

कई बार तो नशा तेज़ करने के लिए उनमें सल्फ़र और अमोनियम क्लोराइड जैसे घातक केमिकल भी मिलाए जाते हैं. पुलिस का कहना है कि कच्ची शराब में मिथाइल की मिलावट रोकने के लिए अब नीले रंग की मिथाइल अल्कोहल की सप्लाई होती है. लेकिन सफेद रंग की शराब में नीले रंग का मिश्रण मिलाने पर तो उसका रंग बदल जाना चाहिए? वैसे में यह जालसाज़ी पकड़ में क्यों नहीं आती.

इसका जवाब आबकारी विभाग के पास है. एक अधिकारी बताते हैं कि यह मिलावट एक तालाब में एक दवात स्याही मिलाने की तरह है. इसलिए रंग में कोई बदलाव नज़र नहीं आता.

लेकिन क्या यही मिश्रण इतना घातक साबित होता है? चिकित्सकों का कहना है कि दस मिलीलीटर मिथाइल अल्कोहल शरीर में जाते ही लोगों को अंधा बना देती है. 30 मिलीलीटर या उससे अधिक के सेवन पर उस व्यक्ति का बचना असंभव है.

कुटीर उद्योग बना धंधा

इलाक़े में कच्ची शराब का धंधा कुटीर उद्योग बन गया है. रोज़ाना हज़ारों लीटर अवैध शराब बसों और लोकल ट्रेनों के ज़रिए विभिन्न ठेकों पर भेजी जाती है.

अब तक कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ था. इसलिए सब कुछ चुपचाप चल रहा था. लेकिन इस हादसे ने कच्ची शराब के इस काले धंधे में शराब बनाने वालों, पुलिस और राजनीतिज्ञों के अवैध त्रिकोण की कलई खोल दी है.

लेकिन आख़िर अवैध शराब का यह धंधा फला-फूला कैसे? इलाक़े के लोगों की बातचीत से साफ़ है कि विभिन्न तबक़े की सांठ-गांठ के बिना यह अवैध धंधा बिना किसी रुकावट के नहीं चल सकता था.

संग्रामपुर में पुलिस चौकी से महज़ दो सौ मीटर दूर ही वह ठेका है जहां लोगों ने शराब के पाउच में ज़हर पी थी. ऐसे में पुलिस को इसकी जानकारी नहीं हो, इस बात पर भरोसा करना मुश्किल है.

एक युवक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ‘क्या बताएं साहब, अक्सर पुलिस के कुछ जवान भी सादी वर्दी में इन ठेकों पर पौव्वा चढ़ाते नज़र आते हैं. नीचे से ऊपर तक सबको इस अवैध कमाई में से हिस्सा मिलता है.’

मोटा है मुनाफा

Image caption ज़हरीली शराब से सैकड़ों लोगों की मौत के बाद गुमनाम-सा संग्रामपुर गांव फ़िलहाल पूरी दुनिया में सुर्खियों में है.

आख़िर चोलाई के धंधे पर अंकुश क्यों नहीं लगता? इसका जवाब इस धंधे से जुड़े लोग ही देते हैं. इस धंधे में तीन से चार गुना मुनाफ़ा है. इस कारोबार में पैसे लगाने वालों के दूसरे धंधे भी हैं.

ऐसे हादसों के बाद अमूमन उन भट्ठियों में काम करने वाले ग़रीब मज़दूर ही पुलिस की गिरफ़्त में आते हैं. संग्रामपुर में लोगों ने 10 से 30 रुपए तक की शराब पी थी.

आबकारी विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि अवैध शराब की बिक्री काफ़ी होती है.

क़ीमतें कम होने की वजह से ग़रीब तबक़े के लोग इसका सेवन करते हैं.

दूसरी ओर, ठेकेदारों के लिए यह मुनाफ़े का सौदा है. उनको कहीं कोई कर नहीं देना पड़ता. महज़ कुछ असरदार लोगों को चढ़ावा देना ही काफ़ी है.

संग्रामपुर में इस हादसे में जीवित बचने वाले लोगों के लिए भी बाक़ी ज़िंदगी किसी संग्राम से कम नहीं है. ज़्यादातर की आंखों की रोशनी चली गई है. यानि अब उनको पूरा जीवन दूसरों के सहारे काटना होगा. लेकिन जो ख़ुद अपने परिवार का इकलौता सहारा थे, उनका सहारा कौन बनेगा?

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