सहजधारी सिखों के हक़ में फ़ैसला

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Image caption अदालत ने कहा है कि मताधिकार का फ़ैसला विधानसभा कर सकती है

एक अहम फैसले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार की वर्ष 2003 में जारी की गई अधिसूचना रद्द कर दी है.

इस अधिसूचना के तहत सहजधारी सिखों को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) चुनाव में मतदान के अधिकार से वंचित किया गया था.

सहजधारी सिख उन्हें कहा जाता है जो दाढ़ी बनाते हैं या अपने केश काटते हैं या धूम्रपान करते हैं या शराब का सेवन करते हैं.

जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस एम जिया पॉल व जस्टिस एमएमएस बेदी की बेंच ने जिरह पूरी होने के बाद 19 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखा था.

याचिकाकर्ता यानी सहजधारी सिख फ़ेडरेशन की तरफ़ से कहा गया था कि केंद्र सरकार को अधिसूचना जारी करने का अधिकार नहीं है. जबकि केंद्र सरकार की दलील थी कि उसे अक्टूबर 2003 की अधिसूचना जारी करने का अधिकार है.

'विधानसभा का अधिकार'

अदालत का कहना था कि मतदान जैसे क़ीमती अधिकार को केवल 'योग्य विधानसभा' ही छीन सकती है. अदालत ने अपने फैसले में कहा, ''किसी प्रतिनिधि को इस बारे में फैसला करने का कोई अधिकार नहीं है.''

अदालत ने कहा कि वह इस का फैसला योग्य विधानसभा पर ही छोड़ती है कि वह सिख गुरुद्वारा एक्ट 1925, के ज़रूरी प्रावधानों में संशोधन करे या न करे.

याचिका के हक़ में फ़ैसला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस फ़ैसले से ऐसी कोई राय नहीं दे रहे हैं कि सिख कौन हैं या फिर अपनी दाढ़ी बनाने वाले सहजधारी सिख भी सिख हैं या नहीं, या फिर सिख धर्म को मानने के लिए सहजधारी सिख का केशधारी होना जरूरी है या नहीं.

न्यायाधीशों ने कहा कि उनका फ़ैसला केवल क़ानूनी है.

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