'हिरासत में हर दिन चार लोगों की मौत'

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Image caption उत्तर प्रदेश में पुलिस व न्यायिक हिरासत में सबसे ज़्यादा लोगों की मौत दर्ज की गई हैं

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में वर्ष 2010 और 2011 के बीच पुलिस और न्यायिक हिरासत में 1574 लोगों की मौत हुई.

यानी भारत में हर दिन क़रीब चार लोग पुलिस या न्यायिक हिरासत में मारे गए.

इनमें से जहां 146 मौतें पुलिस की हिरासत में हुईं, वहीं 1426 मौतें न्यायिक हिरासत में दर्ज की गई हैं.

राज्य सभा में सांसद एचके दुआ ने हिरासत में हुई मौत का ब्यौरा मांगा था, जिसके जवाब में गृह मंत्रालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने आयोग की रिपोर्ट सौंपी, जिसमें ये आंकड़ें सामने आए हैं.

एचके दुआ ने अपने सवाल में ये भी पूछा था कि सरकार ने हिरासत में होने वाली मौत के मुद्दे को संबोधित करने के लिए क्या क़दम उठाए हैं.

इसके जवाब में मंत्रालय ने कहा है कि चूंकि ये मामले आपराधिक श्रेणी में आते हैं, इसलिए इन्हें संबोधित करना राज्य सरकारों की ही ज़िम्मेदारी है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में हिरासत में सबसे ज़्यादा लोगों की मौत दर्ज की गई हैं, जहां 15 लोग पुलिस हिरासत में मारे गए और 316 लोगों की न्यायिक हिरासत में मौत हुई.

आंकड़ों में गिरावट?

उत्तर प्रदेश के बाद बिहार की तस्वीर सबसे ख़राब उभर कर आई है, जहां कुल 136 लोग न्यायिक व पुलिस हिरासत में मारे गए हैं.

सौ का आंकड़ा पार करने वाले बाकी राज्य हैं महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश, जहां क्रमानुसार 130 और 106 मौतें दर्ज की गई हैं.

राजधानी दिल्ली में ऐसे 22 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से तीन मौतें पुलिस हिरासत में हुई जबकि न्यायिक हिरासत में 19 मौतें दर्ज की गईं.

भारत प्रशासित कश्मीर में छह ऐसी मौतें दर्ज की गई हैं.

मानवाधिकार आयोग के सूत्रों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के मुक़ाबले मणिपुर राज्य में मानवाधिकार हनन के सबसे ज़्यादा मामले देखने को मिलते हैं, लेकिन मणिपुर में हिरासत में होने वाली मृत्यु का केवल एक ही मामला सामने आया है.

आयोग के सूत्रों के मुताबिक़ हिरासत में होने वाली मृत्युओं के चलन में पिछले कुछ सालों में गिरावट दर्ज की गई है.

गृह मंत्रालय के आंकड़ों मुताबिक़ 2008-09 में हिरासत में होने वाली मृत्युओं का आंकड़ा 1,746 था.

दूसरी ओर भारत में मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्था वर्किंग ग्रुप ऑफ़ ह्यूमन राइट्स ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि मानवाधिकार के मामलों में भारत का इतिहास बेहद ख़राब रहा है.

संस्था का कहना है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिरासत में हो रही मौत से जुड़े जो आंकड़ें पेश किए हैं, वो वास्तविकता से कहीं दूर है.

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