‘मैं अन्ना को नेपाल ले जाना चाहता हूं’

  • 27 दिसंबर 2011
अन्ना का नेपाली समर्थक
Image caption गोविंद नेपाल से दिल्ली किसी काम से आए थे, लेकिन खुद को रामलीला मैदान आने से न रोक पाए.

जहां भारत में हज़ारों लोग अन्ना हज़ारे के समर्थन में सड़कों पर उतरते दिखाई दे रहे हैं, वहीं पड़ोसी देश नेपाल के कुछ लोग भी अन्ना के प्रभाव से अछूते नहीं रहे.

गोविंद प्रसाद शर्मा नेपाल से दिल्ली आए थे किसी काम से, लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना के समर्थन में जुट रही मण्डली में शामिल होने से ख़ुद को न रोक पाए.

गोविंद अपने दोस्तों के साथ बड़े ही ध्यान से रामलीला मैदान के स्टेज पर हो रही बयानबाज़ी को सुन रहे थे.

उनका कहना है कि 'नेपाल में हो रहे भ्रष्टाचार ने' उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि क्या नेपाल में कभी ऐसा जन-आंदोलन हो सकता है?

उनका कहना था, “नेपाल भी भारत की ही तरह भ्रष्टाचार से लंगड़ा हो गया है. हमारी भी इच्छा है कि हमारे देश में भी अन्ना जैसा एक नेता पैदा हो.”

जहाँ भारत में अब तक सशक्त लोकपाल न बन पाने के कारण कुछ लोग थोड़े निराशावादी हो गए हैं, वहीं नेपाल से आए गोविंद का सकारात्मक रुख़ उनकी मुस्कान में झलक रहा था.

बड़े ही आशावादी स्वर में उन्होंने कहा, “जब लाखों-करोड़ों की तादाद में भारत की जनता सड़कों पर उतरी है, तो लोकपाल का क़ानून ज़रूर बनेगा. दुनिया में कोई भी सरकार ऐसी नहीं है, जो जनता के दबाव के बिना सशक्त कानून बनाए. अन्ना सरकार पर दबाव नहीं डाल रहे, बल्कि अपने हक़ की मांग कर रहे हैं.”

गोविंद कहते हैं कि नेपाल में भ्रष्टाचार तेज़ी से बढ़ रहा है, और वहां भी ऐसे आंदोलन की ज़रूरत है. उनका बस चलता तो वे अन्ना को अपने साथ नेपाल ही ले जाते.

उनका कहना था, “नेपाल में लोकतंत्र तो आ गया, लेकिन उसके साथ-साथ भ्रष्टाचार भी बहुत फैल रहा है. हम तो चाहते हैं कि अन्ना जी को अपने साथ नेपाल ले जाएं, ताकि वहां भी ऐसा ही आंदोलन छिड़े.”

भीड़ नहीं, पर जज़्बा वही

Image caption दिल्ली में पिछली बार की तरह इस बार रामलीला मैदान में वो रौनक नहीं दिखी.

इस बार अन्ना का अनशन भले ही दिल्ली से मुंबई पहुंच गया हो, लेकिन राजधानी में कड़कड़ाती ठंड के बीच टीम अन्ना के कुछ सदस्य आंदोलन की लौ जलाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.

प्रशांत भूषण और शांति भूषण की अगुआई में दिल्ली के रामलीला मैदान में एक सम्मेलन आयोजित किया गया है, जहाँ 450-500 लोग ही जमा हुए हैं.

पिछली बार की तरह इस बार रामलीला मैदान में वो भीड़ और वो शोर नहीं दिखा, लेकिन दूर-दूर से आने वाले लोगों के जज़्बे में कोई कमी नहीं दिखी.

हालांकि देशभक्ति जगाने वाले गीत संगीत तो ख़ूब सुनाई दिए, लेकिन आस-पास की जनता को मैदान तक खींच लाने में नाक़ामयाब रहे.

बनारस से आए राजेंद्र प्रसाद से जब मैंने पूछा कि क्या अन्ना के बिना भी लोग भ्रष्टाचार को लेकर उस तरह संगठित होंगे, जिस तरह गत अगस्त में हुए थे, तो उनका कहना था, “शायद सर्दी की वजह से ज़्यादा लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में नहीं आए, लेकिन मुझे यकीन है कि जैसे-जैसे दिन चढ़ेगा, यहां लोगों की भीड़ बढ़ेगी. अन्ना हों या न हों, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रहेगी.”

तो वहीं रोहतक से आए कुछ बूढ़े लोगों को लोकपाल के मसौदे में हुए बदलावों के बारे में ज़्यादा जानकारी तो नहीं थी, लेकिन अन्ना के समर्थन में ख़ूब जोश से नारे लगा रहे थे.

उनमें से एक ने कहा, “सभी नेता अपने फ़ायदे के लिए इस क़ानून को पास नहीं होने देना चाहते. उन्हें लगता है कि मज़बूत लोकपाल आया तो उनके सभी राज़ सामने आ जाएंगें. हम अन्ना के साथ हैं और ग़िरफ़्तारियां देने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं.”

मैदान में मौजूद जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रशांत भूषण ने सरकार के ख़िलाफ़ ज़ोरदार बयानबाज़ी की.

उनका कहना था कि सरकार ने टीम अन्ना को धोखा दिया है, लेकिन वो इस धोखे को कभी स्वीकार नहीं करेंगे और मज़बूत लोकपाल के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देंगे.

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