'जन गण मन' की सेंचुरी

  • 27 दिसंबर 2011
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Image caption टैगोर के इस गीत 'जन गण मन' ने आज भी भारत की जनता और राजनीतिक कल्पना पर अपनी पकड़ बना रखी है.

सौ साल पूर्व पहली बार गाया गया गीत 'जन गण मन' बाद में भारत का राष्ट्र गान बना. इस दौरान ये गीत कई विवादों का सामना कर चुका है.

इस गीत की जितनी तारीफ़ की गई है उतना ही इसके खिलाफ़ बोला गया है. जब भी इसे बजाया जाता है लाखों लोग अपने पाँव पर श्रद्धा और सत्कार के साथ खड़े होते है.

इसके आलोचक इसे ब्रिटेन के शासन की अधीनता वाला गीत मानते हैं. कुछ का कहना है कि ये वर्गों और क्षेत्रों को पूरी तरह से नहीं दर्शाता.

लेकिन साहित्य के लिए एशिया से पहले नोबेल विजेता रबिंद्रनाथ टैगोर के इस गीत को 27 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के कोलकाता सत्र में पहली बार गाए जाने के बाद, जन गण मन ने आज भी भारत की जनता और राजनीतिक कल्पना पर अपनी पकड़ बना रखी है.

टैगोर की धुन पर एलबम जारी करने वाले विख्यात संगीतकार एआर रहमान ने शताब्दी पुराने गीत को नए अंदाज़ में पेश किया है.

शाहरुख ख़ान की फिल्म 'कभी खुशी कभी ग़म' में राष्ट्रीय गान को आँसू निकलवाने के असर के तौर पर इस्तेमाल किया गया था.

संरचना पर विवाद

दूसरी ओर राजनीतिज्ञ इस गीत में बदलाव की माँग करते रहे हैं. साथ ही इसकी संरचना के सह-स्वामित्व के दावों ने भी इसे ख़बरों में रखा है.

जहाँ एक ओर मुंबई-स्थित पंचम निशाद जैसे कुछ सांस्कृतिक संगठन गीत की सौंवी वर्षगांठ को मनाने की योजना बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर असम के एक सांसद ने पिछले महीने अपने राज्य और उत्तर-पूर्वीय क्षेत्रों को इसमें शामिल करने की माँग की है.

कुमार दीपक दास ने कहा कि टैगोर ने गीत में ब्रिटेन-शासित क्षेत्रों को शामिल किया जबकि अधिकतर पूर्वोत्तर क्षेत्र उनके अधिकार से बाहर था.

मुस्लिम विरोध के चलते बंकिम चंद्र चटोपाध्धय के मशहूर बांग्ला गीत 'वंदे मातरम' को पछाड़ते हुए काफ़ी बहस के बाद 'जन गण मन' को राष्ट्रीय गान के लिए साल 1950 में चुना गया था.

साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई एक याचिका में माँग की गई कि कश्मीर को गान में शामिल किया जाए और विभाजन के बाद पाकिस्तान का भाग बन चुके सिंध को इससे हटा दिया जाए.

प्रेरणा

ये तथ्य कि राष्ट्र गान आज भी क्षेत्रीय और वर्गीय पहचान को प्रेरित करता है, तब ज़ाहिर हुआ जब भारत के सिंधी समुदाय ने इसे हटाने का विरोध किया. उनका कहना था कि 'सिंध' शब्द उनके समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने समुदाय के हक़ में और याचिका के खिलाफ़ फैसला किया. उसका कहना था कि राष्ट्र गान देशभक्ति की भावना जताने वाला भजन या गीत है ना कि देश के प्रांतों को परिभाषित करने वाला कोई वृत्तांत.

कांग्रेस सत्र में साल 1911 में इसके पहली बार गाए जाने के दिन से ही ये विवादों में घिरा है.

किंग जॉर्ज पंचम को 30 दिसंबर को कोलकाता शहर में आना था तो कुछ स्थानीय समाचार पत्रों ने लिखा कि टैगोर की ये रचना शहंशाह की तारीफ है.

कवि ने इसे खारिज़ करते हुए साल 1939 में एक पत्र लिखा, ''मैं उन लोगों को जवाब देना अपनी बेईज्जती समझूँगा जो मुझे इस मूर्खता के लायक समझते हैं.''

साल 1911 के कांग्रेस अधिवेशन की रिपोर्ट में भी जन गण मन के आचोलना को अस्वीकार किया गया था.

जन गण मन और टैगोर के समर्थकों में कई दिग्गज शामिल हैं. महात्मा गांधी ने कहा था कि इसने 'हमारे राष्ट्रीय जीवन में जगह बना ली है.' भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने जन गण मन को 'एक महान राष्ट्र गान' बताया था.

साल 1949 में लेखक प्रबोधचंद्र सेन ने अपनी पुस्तक 'इंडियाज़ नेशनल एंथम' में जन गण मन में निहित ब्रिटिश-विरोधी भावों को रेखांकित किया. उन्होंने एंग्लो-इंडियन प्रेस को इस गीत के बारे में 'ग़लत रिपोर्टिंग' के लिए भी लताड़ा.

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