'एक धेले का क़ानून नहीं'

  • 29 दिसंबर 2011
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Image caption लोकपाल विधेयक पर लोकसभा में गहन रस्साकशी के बाद राज्यसभा में उस पर चर्चा की जा रही है.

एक ओर जहाँ लोकपाल विधेयक के मसौदे पर राजनीतिक दलों के बीच वाकयुद्ध चल रहा है, वहीं दूसरी ओर ग़ैर-राजनीतिक तबकों में भी इस क़ानून की आलोचना की जा रही है.

संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि हालांकि ये अच्छी बात है कि चार दशकों बाद लोकपाल से जुड़ा क़ानून लोकसभा में पारित किया गया, लेकिन मौजूदा क़ानून को मज़बूती देने से पहले नया क़ानून लाना व्यावहारिक नहीं होगा.

उनका कहना था, “भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए मौजूदा भ्रष्टाचार-निरोधी क़ानूनों का अगर ईमानदारी और निष्पक्षता से पालन किया जाए, तो भी भ्रष्टाचार से लड़ा जा सकता है. लेकिन ऐसा होता नहीं है. अगर भविष्य में लोकपाल क़ानून का भी मौजूदा क़ानूनों जैसा हश्र होता है या फिर लोकपाल का ढांचा ख़ुद ही निरंकुश और भ्रष्ट हो गया, तो फिर इस क़ानून का क्या फ़ायदा?”

उनका कहना था कि सरकार का बनाया गया लोकपाल क़ानून भ्रष्टाचार के कारणों पर जब तक ध्यान नहीं देता, तब तक ये क़ानून बिलकुल दंतहीन ही रहेगा.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “लोकपाल चाहे कैसा भी बने और उसमें कैसे भी प्रावधान क्यों न दिए जाएं, उससे भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा. लोकपाल क़ानून तो केवल इस बात पर केंद्रित है कि भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यक्ति के ख़िलाफ़ कैसी कार्रवाई हो और उसे किस प्रकार की सज़ा मिले. जब तक किसी क़ानून के ज़रिए भ्रष्टाचार के मूल कारणों पर आघात न किया जाए, तब तक ऐसा क़ानून व्यर्थ है.”

'मुक्त हो सीबीआई'

सीबीआई की स्वायत्तता और उसे लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर सिविल सोसाइटी और सरकार के बीच ख़ासी तनातनी रही.

अंतत: सरकार ने फ़ैसला किया कि लोकपाल को सीबीआई के दायरे में न लाया जाए. हालांकि मौजूदा विधेयक में ऐसा प्रावधान है जिसके तहत लोकपाल सीबीआई से मांग कर सकता है कि वो आरोपी के ख़िलाफ़ छह महीनों के भीतर शुरुआती जाँच करे.

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Image caption टीम अन्ना का कहना है कि राज्यसभा में विधेयक पारित होने की उम्मीद बहुत कम है.

लेकिन इस प्रावधान की कड़ी आलोचना करते हुए सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह ने कहा, “ऐसा तो किसी भी हालात में मुमकिन नहीं है. सीबीआई के पास इतने कर्मचारी ही नहीं हैं कि वो मामलों को छह महीने के भीतर निपटा सके. पिछले 30 सालों में सीबीआई के पास करीब 10,000 मामले लंबित हैं. सैंकड़ों पद ख़ाली पड़े हैं. जब तक कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं होगी, तब तक ये कैसे संभव है कि सीबीआई अपने ऊपर बढ़ते भार को संभाल पाएगी. दूसरी बात ये कि जब तक कुछ संवैधानिक बदलाव न किए जाएँ, तब तक लोकपाल जैसे क़ानून से एक पैसे का भी फ़र्क नहीं पड़ेगा.”

इसके अलावा उन्होंने सीबीआई को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की भी वकालत की और कहा कि जब तक जांच एजेंसी सरकार के चंगुल से मुक्त नहीं होती, तब तक एक प्रभावशाली प्रणाली की उम्मीद करना बेकार होगा.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “सीबीआई को क़दम-क़दम पर सरकार से इजाज़त लेनी पड़ती है. यहां अंग्रेज़ों के बनाए हुए क़ानूनों का पालन किया जा रहा है और सरकार इसे बदलने को भी तैयार नहीं है.”

राज्यों की प्रभुसत्ता

राज्यों को केंद्र की तरह लोकपाल नियुक्त करने के लिए बाध्य करने के प्रावधान की लोकसभा और राज्यसभा में कई विपक्षी दलों ने आलोचना की और कहा कि ऐसा प्रावधान भारतीय संघीय ढांचे का उल्लंघन है.

इस मुद्दे पर एक वैकल्पिक रास्ता सुझाते हुए सुभाष कश्यप ने कहा, “लोकपाल बिल सदन में लाए जाने से पहले एक संविधान संशोधन लाया जाना चाहिए था जिसके तहत ये कहा जाना चाहिए कि केंद्र में एक लोकपाल होगा और राज्यों में एक लोकायुक्त होगा और उसके लिए संसद और राज्यों की विधान पालिकाएं क़ानून बनाएंगी.”

सुभाष कश्यप का कहना है कि एक ही जाँच संस्था से ये उम्मीद रखना कि वो हर क्षेत्र के भ्रष्टाचार पर नज़र रखे, थोड़ा अव्यावहारिक है.

उन्होंने कहा, “मेरे विचार में एक ही संस्था की निगरानी में सभी क्षेत्रों को लाया जाना ठीक नहीं है. एक ही लोकपाल से ये उम्मीद रखना कि वो सरकारी दफ़्तरों, मंत्रियों और अन्य संस्थाओं पर निगरानी रखे, थोड़ा अव्यावहारिक है. मेरे ख़्याल से संसदीय लोकपाल अलग होना चाहिए, न्यायिक लोकपाल अलग होना चाहिए सुरक्षा बलों के लिए अलग और शैक्षणिक संस्थाओं के लिए अलग लोकपाल होना चाहिए.”

सुभाष कश्यप का ये भी कहना था कि लोकपाल की संस्था में आरक्षण का प्रावधान केवल राज्यों में आने वाले चुनाव को ध्यान में रख कर लाया गया है.

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