कुशवाहा प्रकरण पर यूपी बीजेपी में घमासान

Image caption बाबू सिंह कुशवाहा को बीजेपी में शामिल करने का पार्टी के भीतर विरोध हो रहा है

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में कई हज़ार करोड़ रुपयों के घोटाले के मुख्य अभियुक्त और माया सरकार के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को लेकर भारतीय जनता पार्टी में नीचे से ऊपर तक घमासान मचा है और पार्टी समर्थक ठगे से महसूस कर रहें हैं.

पूर्वांचल में बीजेपी के मुख्य स्तंभ और सांसद योगी आदित्यनाथ ने इस निर्णय को “शरारतपूर्ण, दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए साफ़ इशारा किया है कि अगर कुशवाहा को बाहर नहीं किया गया तो वे स्वयं पार्टी छोड़ देंगे.

पार्टी प्रबंधक समझ नहीं पा रहे हैं कि इस मसले पर हो रहे राजनीतिक नुक़सान को कम करने के लिए क्या किया जाए.

पार्टी का बड़ा तबका दबाव बना रहा है कि कुशवाहा को फ़ौरन दल से निकाल दिया जाए, लेकिन फिलहाल राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी इसके लिए तैयार नहीं हैं.

बीजेपी सूत्रों के अनुसार गडकरी ने पार्टी नेताओं को कहा है कि वे धीरज रखें क्योंकि कुशवाहा को एक योजना के तहत दल में शामिल किया गया है.

जानकार लोगों का कहना है कि श्री गडकरी ने उत्तर प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विनय कटियार की सलाह से कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने का निर्णय किया. प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने इस फ़ैसले को लागू किया. दल के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह इस फ़ैसले में शामिल थे.

जानकार लोगों का यह भी कहना है कि संघ के नागपुर मुख्यालय को इसकी जानकारी थी.

इन नेताओं का आकलन था कि बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लेने से पिछड़े वर्ग में भाजपा कि पैठ बढ़ेगी और चुनाव में फ़ायदा होगा.

विनय कटियार ने उन्हें “विभीषण” की उपाधि दी, जबकि प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने कहा कि इससे बीजेपी को ताक़त मिलेगी.

लेकिन दल के अन्य बड़े नेताओं जैसे लालकृष्ण आडवाणी, डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली आदि को इसकी जानकारी नहीं थी.

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का तो कहना है कि कुशवाहा को बीजेपी में शामिल कराने के लिए करोड़ों रुपयों का सौदा हुआ, जिसकी सीबीआई जाँच होनी चाहिए.

हैरानी वाली बात यह है कि गडकरी के क़रीबी समझे जाने वाले बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव डॉक्टर किरीट सोमैया ने स्वयं भारत सरकार और सीबीआई को प्रमाणों के साथ यह जानकारी दी थी कि कुशवाहा और मुख्यमंत्री मायावती के परिवार के लोगों ने मिलकर दर्जनों कंपनियां बनाकर भ्रष्टाचार की काली कमाई को सफ़ेद किया, जिसके लिए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए.

लेकिन पार्टी नेतृत्व के फैसले को सही ठहराने के लिए उत्तर प्रदेश में बीजेपी के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं, “कुशवाहा को एक राजनीतिक रणनीति के तहत लिया गया है, जिसका परिणाम कुछ दिनों में सामने आ जाएगा.”

बीजेपी नेताओं का इशारा है कि बाबू सिंह कुशवाहा जल्दी ही मुख्यमंत्री मायावती के भ्रष्टाचार का खुलासा कर सकते हैं.

बहरहाल पाठक मानते हैं कि कुशवाहा को बीजेपी में शामिल करने से समाज में बहुत प्रतिकूल प्रतिक्रया हुई है.

समाज में इसी प्रतिकूल प्रतिक्रिया के कारण योगी आदित्यनाथ और मेनका गांधी जैसे नेताओं ने खुलकर इस निर्णय की आलोचना की है. दूसरे अनेक नेता पार्टी मंच के अंदर इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं.

योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में एक प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि बाबू सिंह कुशवाहा स्वास्थ्य विभाग में घोटालों के लिए जिम्मेदार हैं, जिसके कारण इस इलाक़े में सैकड़ों बच्चों की मृत्यु हुई.

उन्होंने कहा, “हम इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते कि जिन्हें हत्या का अभियुक्त बनाना चाहिए, उनके प्रति हमदर्दी दुर्भाग्यपूर्ण है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद स्थिति है. हमें सोचना पड़ेगा कि ऎसी स्थिति में हम सार्वजनिक जीवन में रहें या राजनीति से अलग हो जाएँ.”

योगी का कहना है कि विधान सभा चुनाव के बीच इस तरह का निर्णय शरारतपूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण है.

उन्होंने सवाल किया कि एक ओर बीजेपी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लोकपाल की बात करती है और दूसरी ओर कुशवाहा जैसे 'भ्रष्टाचार के अभियुक्त' को पार्टी में शामिल करती है तो “हम किस मुंह से जनता के बीच वोट मांगने जाएँगे.”

बीजेपी नेतृत्व ने यह सफ़ाई देने की कोशिश की कि कुशवाहा को चुनाव में टिकट नहीं दिया जाएगा. इस पर सवाल करते हुए योगी ने कहा कि सवाल टिकट देने का नहीं बल्कि राजनीतिक संरक्षण देने का है.

वैसे भी कुशवाहा न तो पहले कभी विधान सभा चुनाव लड़े न आगे इरादा था. वह विधान परिषद के सदस्य हैं.

जानकार लोगों का तो यह भी कहना है कि इस मामले में बीजेपी के अंदर पिछड़े वर्ग की अंदरूनी राजनीति भी काम कर रही है.

विनय कटियार अपने को उमा भारती से बड़ा साबित करने के लिए दूसरे दलों से पिछड़े वर्गों के नेताओं को बीजेपी में ला रहे हैं. ज़ाहिर है उमा भारती को यह पसंद नहीं आ रहा.

प्रेक्षक मानते हैं कि इस अकेले निर्णय से बीजेपी ने विधान सभा चुनाव से पहले अपना बड़ा नुक़सान कर लिया है.

वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार याद दिलाते हैं “इसी तरह सन 2004 में डीपी यादव को पार्टी में शामिल करने का निर्णय हुआ था और अटल जी ने जो स्टैंड लिया था उसके कारण डी पी यादव को शामिल होने के बाद भी अलग होना पड़ा.”

अजय कुमार का कहना है कि, “आज अटल जी जैसी कोई शख़्सियत न होकर गडकरी जैसे लोग शामिल करा रहे हैं कुशवाहा को. तो जो भाजपा बढ़ रही थी उत्तर प्रदेश में, आज सारे लोग भाजपा के पीछे पड़ गए हैं इस प्रकरण को लेकर. मुझे लगता है कि इससे भाजपा का बहुत बड़ा नुक़सान होगा. उनका जो अन्ना फ़ैक्टर था वह भी काम नहीं आएगा. भाजपा ने ख़ुद अपनी क़ब्र खोदी है.”

बीजेपी सूत्र कहते हैं कि अब कुशवाहा को इस बात के लिए तैयार किया जा रहा ही कि वह स्वयं अपने को पार्टी से अलग कर लें.

लेकिन उससे भी नुक़सान की भरपाई मुश्किल है.

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