चुनाव आयोग के फ़ैसले पर उठे कई सवाल

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Image caption चुनाव आयोग ने मूर्तियों को ढकने का आदेश दिया है

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मायावती और उनके चुनाव चिह्न हाथी की प्रतिमाओं को ढँकने के चुनाव आयोग के आदेश पर कई राजनीतिक पार्टियों ने ये कहते हुए आपत्ति जताई है कि इससे मुश्क़िले पैदा होंगी और यह फ़ैसला व्यावहारिक नहीं है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव डी राजा का कहना है, ''इस फ़ैसले से कई समस्याएं खड़ी हो जाएंगी. लागू करने की दृष्टि से यह अव्यावहारिक है.''

उन्होंने कहा, ''ये अतार्किक प्रतीत होता है और चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टियों के चिह्नों के संबंध में ये कार्रवाई करने से पहले इसके तमाम पहलुओं पर गहराई से विचार करना चाहिए था. ज़िंदा हाथियों को कैसे ढँकेंगे? हैंडपंप जैसे चुनाव चिह्न भी हैं. क्या आप इन सभी को ढँक देंगे?''

वहीं जनता दल यूनाइटेड के प्रमुख शरद यादव ने कहा, ''मूर्तियों को ढँकने में कोई तुक नहीं है. ये मूर्तियां इस बात का ठोस सबूत हैं कि सार्वजनिक धन बर्बाद किया गया.''

हालांकि डी राजा की ही पार्टी के अतुल कुमार अंजान कहते हैं कि आयोग ने बिल्कुल सही फ़ैसला किया है.

चुनाव आयोग की राय

उधर चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा, ''ये आज का मुद्दा नहीं है. ये वर्ष 2009 का मामला है. तब एक सज्जन ने चुनाव आयोग में इन मूर्तियों के बारे में याचिका दी थी."

उन्होंने कहा, ''हमने ये फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के हिसाब से लिया है. हमने याचिका दाख़िल करने वाले और बचाव करने वाले, दोनों के पक्ष सुने. वर्ष 2010 में कोई चुनाव नहीं था, इसलिए तब इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया.''

ब्रह्मा ने बीबीसी से कहा, ''अक्तूबर 2010 के फ़ैसले में हमने स्पष्ट रूप से बताया कि जब चुनाव होंगे, हम तभी कार्रवाई कर पाएंगे. फ़िर हमने उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव के बारे में दिसंबर 2011 में घोषणा की. अब तो हमें कार्रवाई करनी ही होगी.''

उन्होंने कहा, ''हम नहीं चाहते कि इन मूर्तियों और स्मारकों की वज़ह से कोई दिक्क़त हो. इसलिए हमने ये आदेश दिया. हम इस तरह के प्रचार की इजाज़त नहीं दे सकते जो किसी ख़ास पार्टी के पक्ष में हो. हम चाहते हैं कि सबको बराबर मौक़ा मिले.''

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मायावती और उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों को ढँकने संबंधी आदेश की राजनीतिक दलों में अलग- अलग तरीक़े से प्रतिक्रिया हो रही है.

कुछ राजनीतिक दल जहां आयोग के इस फ़ैसले का समर्थन कर रहे हैं तो कुछ का कहना है कि चुनाव के ठीक पहले इस तरह के आदेश का कोई औचित्य नहीं है.

चुनाव आयोग का कहना था कि इससे बहुजन समाज पार्टी का प्रचार होता है क्योंकि हाथी उसका चुनाव चिह्न है.

लेकिन बसपा का तर्क है कि चुनाव आयोग का ये आदेश उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाता है क्योंकि जो मूर्तियां इन जगहों पर लगी हैं, उनमें और पार्टी के चुनाव चिह्न में फ़र्क है.

लेकिन अपने गठबंधन के साथी जनता दल यूनाइटेड के विपरीत भारतीय जनता पार्टी ने आयोग के फ़ैसले को सही बताया है.

भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख़्तार अब्बास नक़वी कहते हैं कि साल 2004 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने ही कांग्रेस के साथ मिलकर राष्ट्रीय राजमार्गों पर अटल बिहारी वाजपेयी के चित्र हटाने की आयोग से मांग की थी.

नक़वी ने कहा, "उस समय चुनाव आयोग ने न सिर्फ़ चित्रों को ढँक दिया था, बल्कि सारे बोर्डों को हटा दिया गया था जबकि उन पर प्रधान मंत्री का चित्र छपा था."

जनता दल यूनाइटेड मानती है कि इस फ़ैसले से मायावती को फ़ायदा होगा.

पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव जावेद रज़ा कहते हैं कि चुनाव आयोग ने पहली बात तो ये फ़ैसला देर से किया और दूसरा उसके इस फ़ैसले से बहुजन समाज पार्टी को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ गई है.

उत्तर प्रदेश में मायावती और हाथी की मूर्तियां ढँकने के लिए चुनाव आयोग ने तीन दिन का समय दिया है और आदेश के मुताबिक़ बुधवार शाम पाँच बजे तक ये सारी मूर्तियां ढँक दी जानी हैं.

बताया जा रहा है कि राज्य में मायावती की 10 मूर्तियां और हाथी की 90 मूर्तियां बनाई गई हैं. कई पार्टियों ने तो पहले भी हाथी की मूर्तियों को हटाने की माँग भी की थी.

हालांकि चुनाव आयोग के इस फ़ैसले के अमल में राज्य के दो विभागों की लड़ाई आड़े आ गई है.

रविवार को ज़िला प्रशासन के आदेश पर निर्माण निगम ने मूर्तियों को ढँकना शुरू ही किया था जब विकास निगम ने मौक़े पर पहुँचकर काम रुकवा दिया.

उनका कहना था कि मूर्तियों को ढँकने का काम वही करेंगे, क्योंकि उन्होंने ही इन्हें बनाया है.

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