बिहार में 'कालचक्र' के सुख-दुख

  • 11 जनवरी 2012
कालचक्र महोत्सव

बिहार के बोधगया में विश्व धरोहर घोषित 'महाबोधि मंदिर' परिसर में दस दिनों का 32वां 'कालचक्र महोत्सव' 10 जनवरी को संपन्न हुआ.

इसमें लाख से भी अधिक देसी-विदेशी बौद्ध श्रद्धालुओं ने नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा के नेतृत्व में पारंपरिक पूजा-अर्चना की.

'कालचक्र पूजा' नाम से मशहूर इस आयोजन में चित्त यानी आत्मा को बुद्धत्त्व प्राप्ति के लायक शुद्ध और सशक्त बनाने जैसा आध्यात्मिक अभ्यास कराया जाता है.

तांत्रिक साधना जैसे इस तिब्बती धार्मिक अनुष्ठान को दलाई लामा ने विश्व-शांति और मानवीय सदभाव की कामना से जोड़कर एक ख़ास आयाम दिया है.

पीड़ा

वैसे, इस बार बोधगया में कालचक्र महोत्सव के दो रंग-रूप एक दूसरे पर हावी होते हुए बार-बार दिखे. कभी इस धार्मिक अनुष्ठान का आध्यात्मिक श्वेत पक्ष उभरता हुआ सा लगा, तो कभी प्रशासनिक लापरवाही से उभरी घोर अव्यवस्था के कारण बोधगया की नारकीय स्थिति इस आयोजन की पीड़ा बन गई.

भारत और अन्य देशों से हज़ारों-हज़ार की तादाद में पहुँचे बौद्ध श्रद्धालुओं का जो हुजूम बोधगया में 10 दिनों तक उमड़ता रहा, उसकी बड़ी फ़जीहत भी हुई.

ख़ासकर ठहरने की जगह, पेयजल और मल-मूत्र त्याग संबंधी समस्याओं ने विकराल रूप ले लिया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इन बुनियादी ज़रूरतों के लिए स्थानीय प्रशासन और आयोजकों की तरफ़ से पुख़्ता बंदोबस्त नहीं किए गए थे.

उसी दौरान असमय हुई बारिश ने हालात और बिगाड़ दिए. नतीजा हुआ कि बोधगया पहुंचे हज़ारों लोग 10 दिनों तक भीषण गंदगी से जूझते रहे. साथ ही घोर बिजली संकट से और भी किरकिरी हुई.

उधर मगध विश्वविद्यालय परिसर में सैलानियों को ठहराने के लिए जो सबसे बड़ा शिविर लगा था, वो कीचड़ से भर गया. इस कारण वहाँ ठहरे सैलानियों ने आसपास की बस्तियों में शरण ली.

कुछ विदेशी सैलानियों से मैंने जब उनकी इन परेशानियों पर टिप्पणी पूछी, तो उन्होंने 'सब चलता है' के अंदाज़ में कंधे झटक दिए. रूस और नीदरलैंड के सैलानी कह रहे थे कि अच्छे के साथ बुरा भी जुड़ा होता है, जैसे कि इस पवित्र स्थल बोधगया के साथ गंदगी जुड़ गई है.

ख़ैर, ये तो रहा बोद्धों के इस महापर्व की आयोजन व्यवस्था का काला पक्ष. लेकिन दूसरी तरफ़ बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के प्रवचन और पूजा संचालन के लिए बने विशाल पंडाल के अंदर और बाहर ध्यान मुद्रा में बैठे हज़ारों श्रद्धालुओं की आस्था चरम पर थी.

पूजा समापन के दिन अपने प्रवचन में दलाई लामा कह रहे थे, "चित्त यानी आत्मा की शांति के लिए की जाने वाली कालचक्र साधना से कई प्रकार के शारीरिक रोग, शोक और तनाव से मुक्ति मिल सकती है. इसलिए ज़रूरी है कि अंदरूनी आध्यात्मिक चेतना जगाकर बाहरी बाधाओं और बीमारियों से निबटने की शक्ति प्राप्त की जाए."

कालचक्र पूजा में भाग लेने के लिए हॉलीवुड के सुपरस्टार रिचर्ड गियर भी बोधगया आए थे और अपनी पहचान छिपाने के प्रयास के बावजूद वह वहाँ बहुत से लोगों के आकर्षण का केंद्र बने रहे.

दूरी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कालचक्र पूजा के समापन समारोह में भागे लेने पहुंचे थे. उन्हें आशीर्वाद देते हुए दलाई लामा ने कहा, "सिर्फ़ आशीर्वाद से अगर काम चल जाता तो भगवान बुद्ध का ज्ञान प्राप्ति स्थल बना यह बिहार राज्य पूरे देश में सर्वोच्च स्थान पर होता. लेकिन उस ऊँचाई तक पहुँचने के लिए अच्छा कर्म और कड़ी मेहनत बेहद ज़रूरी है."

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बोधगया में पत्रकारों से दूर-दूर रहे. इसका कारण ये बताया जा रहा है कि कालचक्र पूजा आयोजन की व्यवस्था में देखी गई प्रशासनिक बदइंतज़ामी संबंधी सवाल उनसे पूछे जा सकते थे. इसलिए उन्होंने मीडिया कर्मियों से दूरी बना कर रखी.

उधर बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने भी ना तो पूजा के आरंभ में और ना ही पूजा के समापन पर मीडिया से बातचीत का कोई कार्यक्रम रखा.

जबकि पिछले प्रायः सभी कालचक्र पूजा के दौरान वे विधिवत प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते थे.

कहा जा रहा है कि तिब्बत को चीन से आज़ादी दिलाने के सवाल पर उनका पहले जैसा सख्त रुख़ अब नहीं रहा, या उन्होंने तिब्बत को सिर्फ़ 'स्वायत्तता' दिलाने जैसा समझौता कर लेने का संकेत दिया है. संभवतः इसलिए कालचक्र पूजा के मौक़े पर वो ऐसे राजनीतिक सवालों से बचना चाहते होंगे.

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