'इधर जाएं तो मरें, उधर नहीं जाएं तो मरें'

Image caption पलायन के कारण परंपरागत आदिवासी जीवन में खलल पड़ा है.

आदिवासी सामूहिकता के लिए जाने जाते हैं. जीवन मरण या कोई भी अनुष्ठान हो ये सब मिलकर एक दूसरे का साथ देते हैं. यही इनकी संस्कृति है जो इन्हें दूसरे समाजों से अलग पहचान देती है.

छत्तीसगढ़ में भी आदिवासियों के बीच गोतुल का प्रचलन आम था. गोतुल, यानी के जंगलों में बसे गावों का वह स्थान जहाँ आदिवासी युवक युवतियां और बुज़ुर्ग इकठ्ठा होकर खाते, पीते, नाचते, गाते और बजाते हैं. यह अनुष्ठान रात भर चला करते थे. सलमान रावी की रिपोर्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करे

अब गोतुल सिर्फ किस्से कहानियों में सिमट कर रह गया है क्योंकि बस्तर संभाग में चल रही हिंसा की वजह से के गाँव के गांव खाली होते चले जा रहे हैं. वैसे भी सूरज ढलने के बाद इन जंगलों में गाने बजाने की आवाजें अब नहीं आतीं. शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है.

दिन में जो इक्का-दुक्का गाडिया चलती हैं वह शाम में रुक जातीं हैं. यानी यूँ कहा जाए कि शाम ढलते ज़िन्दगी रुक जाती है. जिन सुदूर इलाकों में सुरक्षाबलों के नाके हैं वह भी 'सुरक्षा कारणों' से बंद कर दिए जाते हैं.

गावों में छाई ख़ामोशी को जगलों की आवाज़ और ख़ौफ़नाक बना देती है. अक्सर इन आवाजों को छेरती हुई गोलीबारी की आवाजें आतीं है. सब अपने घरों में दुबके रहते हैं.

ये हाल है छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर के इलाकों का जहाँ से आदिवासियों के सबसे ज्यादा पलायन की बातें सामने आयीं हैं.

डेढ़ लाख आदिवासियों ने घर छोड़ा

सर्व आदिवासी समाज के संयोजक रमेश ठाकुर कहते हैं कि सिर्फ इन तीन इलाकों से ही 1.5 लाख आदिवासियों का पलायन हो चूका है. आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले रमेश ठाकुर का आरोप है कि ये पलायन एक सोची समझी रण नीति के तहत हो रहा है.

रमेश ठाकुर कहते हैं, "संविधान की छठी अनुसूची जहाँ लागू होनी चाहिए थी वह नहीं हो पाई. पांचवीं अनुसूची के तहत जो नीतियां तय करनी थीं, उन्हें जानबूझ कर आज तक लागू नहीं किया गया. संविधान के भाग 46 के अनुछेद 6 में जो स्पष्ट प्रावधान है आजतक उन बातों को बस्तर में लागू नहीं किया गया है. कम से कम दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा के इलाके से दर की वजह से ही 1.5 लाख आदिवासियों का पलायन हो चुका है. लगभग 700 गाँव और टोले खाली हो चुके हैं. आदिवासियों के लिए एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है. इधर जाएँ तो मरें उधर नहीं जाएँ तो मरें."

रमेश ठाकुर के अनुसार छत्तीसगढ़ की सरकार आदिवासियों के पलायन को इस लिए नहीं रोक रही रही क्योंकि वह चाहती है कि जंगल के इलाके खाली हो जाएँ.

रमेश ठाकुर ने आरोप लगाया, "ये सीधे-सीधे सरकार की सोची समझी योजना है कि आदिवासी अपने मूल जंगल और ज़मीन से बेदखल हो जाएँ जिससे हम उस इलाके में फैक्टरी खदानें खोल सकें. पुलिस निहत्थे ग़रीब आदिवासियों को मारती है और उसे भयभीत कर भाग जाने को मजबूर करती है. सरकार चाहती है कि प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या कम हो जाए जिससे एक आदिवासी नेतृत्व और एक आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग कभी ना उठे."

ठोस योजना नहीं

वैसे छत्तीसगढ़ की सरकार के पास यहाँ चल रही हिंसा के कारण भग कर आंध्र प्रदेश चले गए आदिवासियों को वापस बुलाने की कोई ठोस योजना नहीं है.

राज्य सरकार में आदिवासी मामलों के संसदीय सचिव महेश घाघरा से बात कर तो कुछ ऐसा ही समझ में आया.

जहाँ आंध्र प्रदेश की सरकार के अधिकारी समझते हैं कि अब छत्तीसगढ़ की सरकार को आगे आकर इस समस्या का हल निकालना चाहिए, वहीं महेश घाघरा कहते हैं कि उन्होंने आंध्र प्रदेश की सरकार से बात करने की बजाय पलायन कर गए कुछ आदिवासियों से बात की.

महेश घाघरा कहते हैं, "हमने भी पलायन कर चले गए आदिवासियों के रिश्तेदारों के माध्यम से उन्हें संदेश भिजवाया कि वह वापस आयें. इस मामले में मेरी मुख्यमंत्री से भी चर्चा हुई. कई बार क्या होता है कि जवान लड़के लड़कियां हैं. नक्सली मांग करते हैं कि आप हमारे दल में शामिल हो जाइए. कई बार ग्रामीण होने के कारण पुलिस भी उन्हें शक की निगाह से देखती है. यहाँ के लोग दोराहे पर खड़े ज़रूर हैं."

घाघरा का कहना है कि आंध्र प्रदेश की सरकार से तो बात नहीं करेंगे मगर जो ग्रामीण गए हैं उनके लिए राज्य सरकार इतनी सक्षम है कि उनका पुनर्वास किया जा सकता है. मगर घाघरा को खुद नहीं पता ऐसा कब तक होगा.

गंभीर मुद्दा

Image caption दंतेवाड़ा के कलेक्टर ओपी चौधरी ने भरोसा दिलाया कि वे पलायन के मुद्दे पर आंध्र प्रदेश सरकार से बात करेंगे.

मगर दंतेवाड़ा के कलेक्टर ओम प्रकाश चौधरी नें पलायन के मुद्दे को गंभीर बताया और कहा कि इसे युद्ध स्तर पर रोकने की आवश्यकता है.

उनका कहना है कि कोंटा प्रखंड से ही विस्थापन का सिलसिला ज्यादा हो रहा है, "यह निश्चित रूप से एक बड़ा मुद्दा है कि अपने घरों को छोड़ कर लोगों को जाना पड़ा है. इस मुद्दे का हल निकलना बहुत ज़रूरी है. हम इसके लिए प्रयास कर रहे हैं की और पलायन ना हो."

इसके अलावा ओम प्रकाश चौधरी का कहना था कि स्थानीय प्रशासन की तरफ से कई ऐसी योजनाएं शुरू की गई हैं जिसके सहारे लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद मिलेगी.

उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर वह खम्मम जिले के प्रशासनिक अधिकारियों से भी चर्चा करेंगे ताकि पलायन कर गए आदिवासियों को सुरक्षित स्थानों पर फिर से बसाया जा सके.

ठोस नीति की दरकार

Image caption सरकार के पास आदिवासियों को वापस छत्तीसगढ़ लाने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है.

दंतेवाड़ा के कलेक्टर नें भरोसा दिलाया है कि वह आंध्र प्रदेश की सरकार से और विस्थापित हुए आदिवासियों बात कर उनके वापस घर लौटने का रास्ता बनायेंगे.

मगर जानकारों को लगता है कि ये फैसला नीतिगत है जो अकेले दंतेवाड़ा या बस्तर के किसी भी जिले के अधिकारी खुद नहीं ले सकते हैं. इसके लिए रज्य की सरकार को ही कोई ठोस नीति बनानी पड़ेगी.

मौजूदा हालत में तो इसके असार कम ही नज़र आ रहे हैं. आंध्र प्रदेश के दबाव के बावजूद छत्तीसगढ़ की सरकार इस मुद्दे पर मौन है. अलबत्ता कुछ सामाजिक संगठनों की पहल पर बीजापुर से भाग कर गए कुछ परिवार अपने गोवों लौटे हैं.

इस श्रृंखला की अगली कड़ी में मैं आपको बीजापुर के सुदूर अंचल के एक ऐसे ही गाँव लिंगागिरी ले चलूँगा.

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