पटियाला पेग और बिग फ़ैट पंजाबी वेडिंग!

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Image caption प्रदेश में होनी वाली चुनावी चहल-पहल पर लोगों की पैनी नज़र है.

पंजाब के लोगों के लिए आगामी आम चुनाव पहले हुए सभी चुनावों से अलग है.

ये शायद पहला ऐसा चुनाव है जिस दौरान प्रदेश में शादियों और प्रॉपर्टी की ख़रीद-फ़रोख़्त पर रोक सी लग गई है.

आम लोगों की मानें तो वे फ़िलहाल शादी-ब्याह और प्रॉपर्टी ख़रीदने जैसे महत्वपूर्ण काम अब 30 जनवरी को होने वाले मतदान के बाद ही करेंगे.

ऐसा नहीं है कि चुनाव आयोग को शादियों या प्रॉपर्टी की खरीद फरोख्त़ से कोई आपत्ति है.

लेकिन समस्या ये है कि पंजाब में होने वाली ज़्यादातर शादियों में कई दिनों तक जश्न चलता है और आम तौर पर उनमे 'पटियाला पेग' की धूम रहती है और इन शादियों को 'द बिग फ़ैट पंजाबी वेडिंग' कहा जाता है.

लेकिन चुनाव आयोग ने इन दिनों इतनी ज्य़ादा सख्त़ी कर रखी है कि घर में शराब रखने और शराब की पेटियों को गाड़ी में लेकर जाना मुसीबत मोल लेने जैसा है.

वैसे पंजाब में किसी को शराब पिलाने की परमिट भी मिल सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि परमिट पर जितनी बोतलें मिलती हैं उनसे शादियों में गुज़ारा नहीं चलता.

इसके अलावा जनवरी महीने के अंतिम सप्ताह में तीन 'ड्राई-डे' हैं यानी इन दिनों यहां शराब की दुकानें बंद रहेंगीं.

चंडीगढ़ में शादी कराने वाले एक हाई-प्रोफाइल पंडित मदन गुप्ता सपाटू कहते हैं, ''पिछले कुछ दिनों से लगातार ऐसे लोग आ रहे हैं जो अपने घरों में होने वाली शादियों को चुनाव होने तक स्थगित करना चाहते हैं.''

उनका कहना है कि शादियों वाले घर के लोग यही चाहते हैं कि घर आए लोगों के स्वागत सत्कार में कोई कमी न रहे.

प्रॉपर्टी व्यवसाय में मंदी

कुछ ऐसा ही हाल प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त़ का है.

जैसा कि आमतौर पर होता है इस तरह की बिज़नेस डील में कथित काले धन का खुलकर इस्तेमाल किया जाता है जो चुनावी माहौल में ज़रा मुश्किल दिखाई पड़ रहा है.

कई प्रॉपर्टी डीलर मानते हैं कि पुलिस के हत्थे चढ़ने के बजाए कुछ दिन रुक जाने में ही ज़्यादा समझदारी है.

सुरक्षा पर बात की जाए तो इन दिनों पंजाब में चप्पे-चप्पे पर नाके लगे हैं और हर कोने पर एके-47 राइफल और अन्य हथियारों से लैस पंजाब पुलिस के अधिकारियों और कमांडो के अलावा सीआईएसएफ के जवान भी तैनात है.

शाम का माहौल तो कुछ ऐसा है कि सड़क पर से गुज़रते हुए 1980 और 1990 के दशक में व्याप्त चरमपंथी गतिविधियों का दौर याद आने लगता है.

चंडीगढ़ से अमृतसर के बीच लगभग 300 किलोमीटर के सफ़र में हमें कुल सात बार रोका गया.

Image caption पंजाब में सुरक्षा बालों ने वाहनों की पड़ताल का भी अभियान चला रखा है.

कुछ जवान तो इतनी गंभीरता से तलाशी ले रहे थे कि आपको खुद पर भी शक़ होने लगे.

हमसे कई अटपटे सवाल भी पूछे गए, लगा कि अगर गाड़ी पर प्रेस का स्टीकर होता तो शायद वो थोड़ी नर्मी दिखाते.

जलंधर में घुसते ही एक नाके में तैनात पंजाब पुलिस के सब-इंस्पेक्टर कर्मसिंह ने बताया कि उन्हें कालाधन, शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों पर नज़र रखने को कहा गया है.

नयापन

इस बार के चुनावों में और भी बहुत कुछ नया देखने को मिला.

हमें रास्ते में ना किसी दीवार पर उम्मीदवारों और उनके चुनाव-चिन्हों से चमकता हुआ कोई पोस्टर चिपका हुआ मिला ना ही घरों या सड़कों पर राजनीतिक दलों के झंडे लहराते हुए मिले.

हां, कुछ शहरों में सड़क किनारे लगे होर्डिंग्स यानी विज्ञापन आपको बस याद दिलाते रहते हैं कि चुनाव आस-पास हैं.

इस बात पर हैरानी जताते हुए जब पंजाब की मुख्य चुनाव अधिकारी कुसुमजीत सिद्धू से सवाल किया, तो जवाब मिला, "विभाग अपना काम कर रहा है ताकि चुनाव साफ़-सुथरे हो सके, बाक़ी कुछ कानून हैं जिनका हमें पालन करना है".

हालांकि आम लोग काफी खुश नज़र आए और साथ ही नेता भी.

नेताओं के पास बहाना है कि चुनाव आयोग काफी सख्त है, इसलिए वो आम लोगों की ज़्यादा ख़ातिर फिलहाल नहीं कर सकते!

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