कितनी चुनौती देगी पंजाब पीपुल्स पार्टी?

  • 26 जनवरी 2012
मनप्रीत बादल
Image caption मनप्रीत बादल अकाली सरकार में वित्त मंत्री थे

पंजाब में खेती-बाड़ी हो या राजनीति दोनों एक ही ढर्रे पर चलने की आदी हो गई हैं.

जैसे पंजाब में फ़सल उगाने का चक्र गेंहूँ और चावल के बीच फँस कर रह गया है वैसे ही राजनीति में दो बड़ी सियासी पार्टियाँ हर विधानसभा चुनाव में बारी-बारी से सत्ता का स्वाद चखती रही हैं.

पिछले कई दशकों से शिरोमणी अकाली दल और कांग्रेस के बीच ही सत्ता ही धुरी घूमती रही है.

लेकिन इस बार सबकी निगाहें लगी है एक तीसरी धुरी पर, जो साँझा मोर्चा नाम से तैयार हुआ है. इसमें मुख्य पार्टी है पीपीपी. पहले लोगों में इसके नाम को लेकर काफ़ी भ्रम रहा क्योंकि पाकिस्तान में भी पीपीपी है.

पंजाब की ये पीपुल्स पार्टी ऑफ़ पंजाब 10 महीने पहले ही अस्तित्व में आई है.

आएगा बदलाव?

अकाली सरकार में वित्त मंत्री रहे मनप्रीत सिंह बादल ने अकाली दल से अलग हो पीपीपी का गठन किया है. सीपीएम, सीपीआई और अकाली दल (लोंगोवाल) जैसी पार्टियों के साथ मिलकर ये साँझा मोर्चा एक तीसरे मोर्चे के तौर पर उतरा है.

पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल रिश्ते में मनप्रीत के ताऊ लगते हैं. लेकिन पंजाब सरकार की आर्थिक नीतियों से नाराज़ चल रहे मनप्रीत को जब 2010 में पार्टी से निकाल दिया गया तो उन्होंने एक अलग दल बना लिया.

सवाल ये है कि क्या अकाली दल और कांग्रेस के बीच उलटते-पलटते सत्ता समीकरण को ये तीसरा मोर्चा चुनौती दे पाएगा.

पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष मनप्रीत सिंह बादल कहते हैं कि अरब क्रांति की तर्ज़ पर पंजाब के लोग भी बदलाव के लिए तैयार हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "लोगों ने दोनों पार्टियों को आज़मा कर देख लिया है और अब उन्हें इन पार्टियों पर विश्वास नहीं है. पंजाब में पिछले 64 सालों से नूरा कुश्ती का खेल चल रहा है- एक बार कांग्रेस आती है और एक बार अकाली. अब इन्हें अपनी कुर्सियाँ छोड़नी पड़ेगी. हमने अरब देशों में अरब क्रांति देखी है, अन्ना साहब भी बदलाव की बयार लेकर आए. ये तब्दीली का दौर है. बदलाव के इस दौर से पंजाब की जनता अलग नहीं है. जनता हमारी बात समझ रही है."

पीपीपी से बढ़ी उलझन

साँझा मोर्चा के कई घटक दल हैं, जिनका पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में प्रभाव है. टीकाकार मानते हैं कि ये दल एकजुट होकर ज़रूर अपना राजनीतिक प्रभाव डाल सकते हैं.

चंडीगढ़ में हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार प्रवभीत सिंह कहते हैं, "पीपीपी ने वामदलों के साथ मिलकर मोर्च बनाया है. आम तौर पर पंजाब में लेफ़्टिस्ट-सोशलिस्ट धर्मनिपेक्ष वोट कांग्रेस और वामदलों में बंट जाता है. लेकिन पीपीपी की अगुआई में साँझा मोर्चा इस वोट को एकजुट कर सकता है. 117 में से आधी सीटों पर साँझा मोर्चा कांग्रेस और अकाली दल को टक्कर देगा. त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में पीपीपी अहम भूमिका निभा सकता है. पीपीपी ने दोनों बड़ी पार्टियों को परेशान तो ज़रूर किया है."

वहीं पंजाब में कांग्रेस नेता अमरिंदर सिंह का मानना है कि पंजाब की राजनीति में असर डालने के लिए मनप्रीत बादल को अभी इंतज़ार करना पड़ेगा.

पीपीपी को लेकर चर्चा गर्म ज़रूर है पर उसकी राह आसान नहीं है.. चुनाव से पहले ही पीपुल्स पार्टी ऑफ़ पंजाब में फूट पड़ गई है और उसके कुछ लोग पार्टी छोड़ कांग्रेस में चले गए.

साझा मोर्चा के सामने चुनौती दो बड़ी पार्टियों, कांग्रेस और अकाली दल के वर्चस्व के बीच अपनी जगह बनाने की है. ख़ासकर उन मतदाताओं को रिझाने की, जो इन दोनों पार्टियों से नाख़ुश हैं और तीसरे और बेहतर विकल्प की तलाश में हैं.

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