बलात्कार मामले में अहम सिफारिश

  • 30 जनवरी 2012
Image caption सामाजिक संगठन लंबे समय से उंगली परीक्षण ख़त्म करने की मांग कर रहे थे.

बलात्कार की शिकार हुई महिलाओं और बच्चों को और अधिक मानसिक प्रताड़ना से बचाने के लिए योजना आयोग की एक उच्च स्तरीय समिति ने सुझाव दिया है कि बलात्कार और यौन संबंध की पुष्टि के लिए किया जानेवाला उंगली परीक्षण ख़त्म कर दिया जाना चाहिए.

बलात्कार की शिकार हुई महिलाओं को लगातार कई तरह की फ़ोरेंसिक जांच से गुज़रना पड़ता है जिसमें दो उंगलियों से किया जानेवाला परीक्षण भी शामिल है जिसके ज़रिए ये पता लगाया जाता है कि बलात्कार हुआ है या नहीं या फिर यौन संबंध बनाया गया है या नहीं.

सामाजिक कार्यकर्ता लंबे अरसे से इस परीक्षण को अपमानजनक बताते हुए ख़त्म करने की मांग कर रहे थे. उनका कहना है कि बलात्कार की पुष्टि के लिए किया जानेवाला ये एक अवैज्ञानिक और अपमानजनक तरीक़ा है.

इन्हीं मांगों पर ग़ौर करते हुए योजना आयोग की समिति ने यौन उत्पीड़न के शिकार हुए लोगों की सुरक्षा के लिए ये सुझाव भी दिया है कि ऐसे पीड़ितों को पुलिस, मजिस्ट्रेट, अदालत आदि के सामने बार-बार बयान देने के लिए भी बाध्य नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे पीड़ित व्यक्ति मानसिक रूप से और ज़्यादा परेशान होता है.

क़ानून का पक्ष

क़ानून के जानकारों का कहना है कि उंगली परीक्षण बलात्कार की पुष्टि करने का एकमात्र तरीक़ा नहीं है और अगर इसे हटा भी दिया जाता है तो जांच में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. आपराधिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ वकील आई यू ख़ान कहते हैं, "दो उंगलियों से परीक्षण बलात्कार की पुष्टि की कोई अहम शर्त नहीं है. बलात्कार के मामलों में पीड़ित का बयान सबसे महत्वपूर्ण है.इसके अलावा मेडिकल सबूत तथा अन्य साक्ष्य ज़्यादा अहमियत रखते हैं." समिति ने ये भी कहा है कि यौन उत्पीड़न के शिकार हुए बच्चे अक़्सर ये बताने में सक्षम नहीं होते कि उनके साथ किस तरह का यौन दुर्व्यवहार हुआ है, इसलिए ऐसे मामलों में क़ानून को बाल मनोविश्लेषक और चिकित्सक जैसे विशेषज्ञों को बच्चों की तरफ़ से पेश होने की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि उत्पीड़न की सही स्थिति का पता चल सके.

इस बारे में मनोविश्लेषक संदीप वोरा कहते हैं, "जो छोटे बच्चे होते हैं उनके लिए ये बता पाना बहुत मुश्किल होता है कि उनके साथ हुआ क्या है. कई बार तो वो ये भी नहीं समझ पाते कि उनका यौन शोषण किया जा रहा है. ऐसे मामलों में बाल मनोविश्लेषकों को बच्चों की तरफ़ से पेश करने का सुझाव बिल्कुल सही है और इसी तरह ये पता लगाया जा सकेगा कि बच्चा आख़िर किस तरह के यौन उत्पीड़न से गुज़रा है."

योजना आयोग की समिति का ये भी कहना है कि दंड प्रक्रिया संहिता में भी बदलाव लाने की ज़रूरत है ताकि इसे महिलाओं और बच्चों के लिए ज़्यादा मददगार बनाया जा सके.

परिभाषा

Image caption समिति ने बलात्कार की परिभाषा में बदलाव लाने की सिफ़ारिश की है.

समिति ने बलात्कार की परिभाषा को भी और व्यापक बनाने का सुझाव दिया है क्योंकि मौजूदा परिभाषा में महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ किए जाने वाले कई अन्य अपराधों को शामिल ही नहीं किया गया है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ समिति का कहना है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक़ 15 से 49 साल के बीच की महिलाओं में से एक तिहाई शारीरिक हिंसा का शिकार होती हैं और हर दस में से एक महिला यौन हिंसा का शिकार होती है.

समिति ने ये भी कहा है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में दोषियों को सज़ा कम ही हो पाती है क्योंकि ज़्यादातर ऐसे मामलों की सही तरीक़े से पड़ताल नहीं की जाती और अदालतों में पर्याप्त सबूत पेश नहीं हो पाते.

अगर 2010 के आंकड़ों पर ग़ौर करें तो बलात्कार के 22,171 मामले दर्ज किए गए थे जिनमें से मात्र 26 फ़ीसदी मामलों में ही दोष सिद्ध हो सका था.

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