'मणिपुर में चुनावों को लेकर उत्साह नहीं'

मणिपुर इमेज कॉपीरइट reuters
Image caption मणिपुर में अंगुली पर स्याही का निशान लगाते वक्त तमाम वोटरों की फोटो खींची जाएगी.

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की 60 विधानसभा सीटों के लिए 28 जनवरी को होने वाले चुनाव को लेकर न तो देश के दूसरे राज्यों में कोई ख़ास हलचल है और न ही इस राज्य में.

ये खू़बसूरत पर्वतीय प्रदेश अक्सर ग़लत वजहों से ही सुर्खियां बटोरता रहा है.

चाहे चरमपंथी हिंसा हो या फिर नगा और कूकी संगठनों की ओर से अपनी-अपनी मांगों के समर्थन में की जाने वाली आर्थिक नाकेबंदी.

इनके अलावा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के ख़िलाफ बीते एक दशक से भी लंबे अरसे से धरने पर बैठी ईरोम शर्मिला का मामला ही इस खू़बसूरत पर्वतीय प्रदेश को सुर्खियां दिलाता रहता है.

आज़ादी के बाद से ही विभिन्न समस्याओं और चरमपंथ ने इस राज्य की खूबियों को ढक दिया है.

मणिपुर में होने वाला कोई भी चुनाव राष्ट्र की मुख्यधारा की राजनीति पर कोई असर नहीं डालता. इसी वजह से मुख्यधारा की मीडिया में इसकी खबरें भी हाशिए पर रहती हैं.

सन्नाटा

इस बार राज्य में भी पूरी तरह सन्नाटा है. न तो कहीं कोई चुनावी रैली नजर आती है और न ही उम्मीदवार चुनाव प्रचार करते नजर आ रहे हैं.

लेकिन इसकी वजह चुनाव आयोग नहीं बल्कि चरमपंथी हैं. चरमपंथी संगठनों की धमकियों की वजह से चुनावी शोरगुल थम गया है.

कहीं न तो लाउङस्पीकर का इस्तेमाल हो रहा है और न ही किसी पार्टी के पोस्टर नजर आते हैं.ऐसा नजारा यहां पहली बार देखने को मिल रहा है.

मणिपुर में विधानसभा के लिए पहला चुनाव वर्ष 1967 में हुआ था. लेकिन उससे बहुत पहले वर्ष 1948 में ही इस राज्य में एक विधानसभा का गठन हुआ था.

हानलांकि यहां मतदान का प्रतिशत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले हमेशा ज़्यादा रहा है. वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों में यहां औसतन 86 प्रतिशत वोट पड़े थे.

मणिपुर में चुनावों के मौके पर पैसों या उपहारों के लेन-देन का प्रचलन आम है.

चरमपंथी संगठनों व सामाजिक संगठनों के निर्देश और गांव के मुखिया के फै़सले ही उम्मीदवारों का भाग्य तय करते हैं.

देहात इलाकों में उम्मीदवार वोटरों को उपहार के तौर पर चावल या चानी के पैकेट देते हैं. लेकिन कथित तौर पर उनके भीतर नकदी छिपी होती है.

मणिपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष और प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर ईबो कहते हैं कि राज्य में यह सब आम बात है, लेकिन इस बार चुनाव आयोग की सख्ती से शायद इस पर कुछ अंकुश लगेगा.

एक अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षक मांगी सिंह भी उनकी बातों का समर्थन करते हैं.

वे आश्चर्य जताते हुए कहते हैं, “कई मतदान केंद्र तो ऐसे हैं जहां तक पहुंचने के लिए वोटरों को आठ से 10 किमी तक पैदल चलना पड़ता है. बावजूद इसके उन केंद्रों पर 90 फ़ीसदी से ज़्यादा मतदान होता है.

चुनावी आंकड़े

मणिपुर में मुख्यमंत्री ईबोबी सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस की सरकार सत्ता में है.

लेकिन इस बार पहली बार राष्ट्रीय व स्थानीय राजनीतिक दलों ने कांग्रेस के खिलाफ एकजुटता दिखाते हुए प्रोग्रेसिव पीपुल्स फ्रंट (पीपीएफ) नामक एक नए मोर्चे का गठन किया है.

इसमें भाजपा, राजद, मणिपुर पीपुल्स पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) शामिल है.

आंकड़ों की बात करें तो विधानसभा की 60 सीटों के लिए 279 उम्मीदवार मैदान में हैं.

इनमें से कांग्रेस ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं और तृणमूल कांग्रेस ने 48 पर. विपक्षी मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी के 31, भाकपा के 24, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के 22, भाजपा के 19 और मणिपुर पीपुल्स पार्टी के 14 उम्मीदवार भी मैदान में हैं.

भरपूर सुरक्षा

उग्रवादी संगठनों की सक्रियता, उम्मीदवारों को मिल रही धमकियों और उन पर हुए हमलों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं.

आयोग के निर्देश पर जनवरी के पहले सप्ताह में पुलिस महानिदेशक वाई जयकुमार सिंह को हटा कर रत्नाकर ब्राल को उनकी जगह नियुक्त किया गया.

इसके अलावा राज्य में अंगुली पर स्याही का निशान लगाते वक्त तमाम वोटरों की फोटो खींची जाएगी.

देश में पहली बार यह प्रक्रिया अपनाई जाएगी ताकि फर्जी वोटिंग पर अंकुश लगाया जा सके.

साथ ही वोटरों और उम्मीदवारों को मिलने वाली धमकियों पर भी नजर रखी जा रही है.

संबंधित समाचार