आचार संहिता के कारण 'माई सैंडिल' के मंचन पर रोक

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Image caption मायावती सरकार विपक्ष के लगाए कई आरोपों का सामना कर रही है

नाटक, कविता, कहानी और कार्टून आदि चाहे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अभिन्न अंग हों लेकिन लखनऊ ज़िला प्रशासन ने एक राजनीतिक व्यंग्य नाटक के मंचन पर मौखिक आदेश से रोक लगा दी है.

'माई सैंडिल' नाम के इस नाटक की पटकथा में 500 साल पहले मायागढ़ की एक राजकुमारी माया और उसके चापलूस मंत्रियों की काल्पनिक कहानी है.

राय उमा नाथ बाली प्रेक्षाग्रह में 28 जनवरी को इसका पहली बार मंचन प्रस्तावित है.

लेकिन यह कहानी मायावती सरकार के पांच साल के कामकाज से मिलती-जुलती हो सकती है, इसलिए लखनऊ ज़िला प्रशासन ने नाटककार मुकेश वर्मा को बुलाकर कहा है कि चुनाव तक इसका मंचन न करें.

जिलाधिकारी अनिल सागर के अनुसार, "इस नाटक के मंचन से आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन होगा."

ग़ौरतलब है कि मायावती सरकार ने हालफ़िलहाल में कई कथित तौर पर भ्रष्ट मंत्रियों और राजनीतिक नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है और बहुजन समाज पार्टी नेतृत्व कई बार भ्रष्टाचार के आरोपों को ख़ारिज कर चुका है.

लिखित में मांगी अनुमति

नाटक करने वाली संस्था सत्यपथ रंगमंडल के लोग ज़िला प्रशासन के इस निर्णय से क्षुब्ध हैं और वे इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश मानते हैं.

नाटक के लेखक और निदेशक मुकेश वर्मा कहते हैं कि,"नाटक समाज का आइना है. इसे प्रतिबंधित न किया जाए तो अच्छा है."

मुकेश वर्मा ने नाटक के मंचन के लिए लिखित अनुमति मांगी है और वे चाहते हैं कि प्रशासन भी अपना आदेश उन्हें लिखित रूप में दे.

उन्होंने नाटक की पटकथा प्रशासन को उपलब्ध करा दी है.

नाटक की कहानी बहुत दिलचस्प है. इससे यह भी पता चलता है कि पांच साल की माया हुकूमत के बारे में लेखक और कलाकार क्या सोचते हैं.

'हाथी सोने का सैंडिल खा गया'

कल्पना की गई है कि 500 साल पहले मायागढ़ नाम का एक राज्य था. उसकी राजकुमारी माया के पास ऐरावत हाथी था जो सोना चांदी खाता था.

राजकुमारी अपना जन्म दिन शौक से और धूमधाम से मनाती थी. राजकुमारी के मंत्रियों ने राजकुमारी के जन्मदिन पर उपहार देने के लिए सोने की सैंडिल खरीदी. सैंडिल खज़ाने में रखी गई. मगर महावत की गलती से हाथी अपने भोजन के साथ सैंडिल भी खा गया. इससे हड़कंप मच गया क्योंकि वही सैंडिल जन्मदिन पर राजकुमारी माया को उपहार में दी जानी थी.

हाथी के पेट से सैंडिल निकलवाने के लिए वैद्य बुलाया गया. वैद्य ने औषधि दी मगर दरबारियों को एहसास हुआ कि हाथी के पेट से सैंडिल के साथ राजकुमारी की हुकूमत के सारे राज़ भी निकलेंगे जिसकी गंध पूरे राज में फ़ैल जाएगी. इससे समाज में विद्रोह होने का डर था.

इसलिए तय हुआ कि हाथी की लीद को राज्य की सीमाओं पर फेंक दिया जाए. कुछ दरबारियों में इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद था और वह इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे. लेकिन कुछ मंत्री राजकुमारी के ख़िलाफ़ साज़िश में शामिल थे.

इन लोगों की सलाह पर हाथी को दवा खिलाकर सैंडिल पेट से निकाल ली गई और लीद को राज्य की सीमाओं पर फेंक दिया गया.

इससे राजकुमारी का भंडाफोड हो गया और राज्य में विद्रोह हो गया.

लोगों ने राजमहल पर हमला बोल दिया तब राजकुमारी की नींद खुली और उन्होंने मंत्रियों को तलब कर जन विद्रोह का कारण पूछा. मंत्रियों ने सारा किस्सा बताया.

इसके बाद राजकुमारी ने सारे भ्रष्ट मंत्रियों को मार दिया.

निर्देशक मुकेश वर्मा का कहना है, "नाटक अंत में लोगों को संदेश देता है कि लोग घरों से निकल कर अच्छे लोगों को वोट करें. नाटक में राजकुमारी का नाम ज़रुर माया है, लेकिन मंचन में कहीं भी माया नामा का संबोधन नही हुआ. नाटक में भ्रष्टाचार संबंधित मुद्दों पर प्रहार है, न कि किसी की व्यक्तिगत आलोचना."

लेकिन ज़िला मजिस्ट्रेट अनिल सागर ने पत्रकारों को बताया, "चुनाव आचार संहिता के अनुसार किसी नेता पर प्रत्यक्ष या परोक्ष टिप्पणी नही हो सकती."

जिला प्रशासन ने नाटक के निर्देशक को मौखिक रूप से बता दिया है कि चुनाव तक नाटक का प्रदर्शन नही हो सकता.

मगर कागज़ पर अभी निर्णय नही हुआ. ज़िला प्रशासन के एक अधिकारी का कहना है कि अभी पुलिस से रिपोर्ट मांगी गयी है और रिपोर्ट आने के बाद निर्णय लिया जाएगा.

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