मालदा के बाद मुर्शिदाबाद भी शिशु मौतों की चपेट में

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Image caption पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में बच्चों की मौतों का सिलसिला पिछले लगभग तीन माह से जारी है.

पश्चिम बंगाल के मालदा में पिछले लगभग महीने भर से जारी बच्चों की मौत के सिलसिले ने अब पास के ज़िले मुर्शिदाबाद को भी अपनी चपेट में ले लिया है जहां के बेहरामपुर सरकारी अस्पताल में पिछले 24 घंटों में पांच बच्चों की मौत हो गई है.

बीबीसी पश्चिम बंगाल संवाददाता अमिताभ भट्टासाली ने कहा है कि मालदा में बीते एक महीने में 96 बच्चों की मौत हुई है जबकि मुर्शिदाबाद में पिछले 24 घंटों में दस बच्चे काल के काल के गाल में समा गए हैं.

मुर्शिदाबाद ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी शाहजहां सिराज ने कहा है कि बेहरामपुर सरकारी अस्पताल में मारे गए बच्चों को ग्राम स्वास्थ्य केंद्रों से रेफ़र किया गया था और उनमें से ज़्यादातर सांस संबंधित रोग, कम वज़न और भुखमरी से पीड़ित थे.

मुख्य चिकित्सा अधिकारी के अनुसार इन बच्चों की उम्र दो दिन से लेकर तीन महीने तक की थी.

प्रथा

पीटीआई ने शाहजहां सिराज के हवाले से कहा है कि बेहरामपुर सरकारी अस्पताल में सुविधाओं की कमी है और जहां वहां रोज़ाना क़रीब 120 बच्चों को भर्ती किया जा रहा है, अस्पताल में केवल 20 बेड उपलब्ध हैं.

बीबीसी संवाददाता के अनुसार मुर्शिदाबाद जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बच्चों की मौत के पीछे इलाक़े में कथित तौर पर प्रचलित कम उम्र में शादी की प्रथा को भी ज़िम्मेदार ठहराया है.

अधिकारी के अनुसार छोटे उम्र में माँ बनने वाली महिलाएं कम वज़न के कमज़ोर बच्चों को जन्म दे रहीं हैं.

वहीं पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्या ने कहा है कि राज्य में उनके पार्टी के सत्ता में आने के बाद शिशु मृत्यु दर में तीन फ़ीसदी की कमी आई है.

पहले भी मौतें

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Image caption सरकार जिला स्तर पर विशेष शिशु चिकित्सा केंद्र स्थापित करने पर विचार कर रही है.

पिछले साल नवंबर में मालदा के सदर अस्पताल में छह दिनों में 25 बच्चों की मौत हो गई थी.

स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पतालों में आम तौर पर हर रोज़ चार से पांच बच्चों की मौतें होती रहती हैं.

चिकित्सकों का कहना है कि बच्चों को इलाज के लिए दूर-दराज़ क्षेत्रों से लाया जाता है, उनको सही समय पर चिकित्सा नहीं मिल पाती.

एक चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि ज़्यादातर बच्चों को ग्राम और जिला स्वास्थ्य केन्द्रों में बिना उचित चिकित्सा दिए ही बड़े अस्पतालों में भेज दिया जाता है.

अधिकारियों के अनुसार राज्य सरकार जिला स्तर पर विशेष शिशु चिकित्सा केन्द्र बनाने पर भी विचार कर रही है, हालांकि इसमें समय लग सकता है.

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