कड़ी सुरक्षा के बीच पंजाब और उत्तराखंड में मतदान शुरू

पंजाब में चुनाव की तैयारियाँ

पंजाब की 117 और उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों के लिए मतदान नियत समय सुबह आठ बजे से शुरू हो गया है.

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने कड़े सुरक्षा इंतज़ाम किए हैं.

पंजाब की चुनावी जंग में राज्य के क़रीब एक करोड़ 76 लाख मतदाता 1078 उम्मीदवारों की किस्मत का फ़ैसला करेंगे.

वहीं उत्तराखंड में 63 लाख मतदाता हैं और वहाँ सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है. उत्तराखंड में 788 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं.

पंजाब में आमतौर पर दो बड़ी पार्टियों में मुख्य मुकाबला होता आया है- कांग्रेस और अकाली दल गठबंधन. लेकिन इस बार कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय है.

अकाली दल से अलग हुए नेता मनप्रीत सिंह बादल का 10 महीने पुराना दल पीपल्स पार्टी ऑफ़ पंजाब यानी पीपीपी ने वामदलों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया है.

इस तरह तीन मुख्य पक्षों के बीच टक्कर होगी- अकाली दल और भाजपा गठबंधन, कांग्रेस और पीपीपी का सांझा मोर्चा.

पंजाब में अभी अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन वाली सरकार है और कांग्रेस विपक्षी पार्टी है.

मुख्य उम्मीदवार

चुनाव पर नज़र रख रहीं बीबीसी संवाददाता वंदना के अनुसार पंजाब के मुख्यमंत्री और अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल मुख़्तसर ज़िले में लांबी से चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन इस बार उनके लिए ये आम चुनाव जैसा नहीं है.

प्रकाश सिंह बादल के दो मुख्य प्रतिद्वंदी हैं- उनके सगे भाई गुरदास सिंह बादल और चचेरे भाई महेशइंदर सिंह. ये चुनावी लड़ाई के साथ-साथ पारिवारिक लड़ाई भी बन गई है.

लांबी में बादल भाईयों का आपसी प्यार भाईचारे की मिसाल रहा है..लेकिन इस बार राजनीति ने भाइयों में दरार डाल दी है.

पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल जलालाबाद से चुनाव लड़ रहे हैं जहाँ से 15 अन्य प्रत्याशी उनके सामने हैं.

कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पटियाला से मैदान में है जहाँ उनका मुख्य मुकाबला अकाली दल से है.

जबकि पीपल्स पार्टी ऑफ़ पंजाब के नेता मनप्रीत सिंह बादल गिदरबाहा से 11 उम्मीदवारों का सामना करेंगे.

पूर्व ओलंपिक खिलाड़ी परगट सिंह भी जालंधर से लड़ रहे हैं. मोहाली से अकाली दल की ओर से बलवंत सिंह रामूवालिया लड़ रहे हैं जो 1996 में केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं.

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लेकिन अकाली दल और कांग्रेस को अपनी बाग़ी उम्मीदवारों का भी सामना करना पड़ रहा है. कुछ को तो मान-मनव्वल के बाद राज़ी कर लिया गया लेकिन कुछ बाग़ी टिकट न मिलने के बाद अपने दम पर ही चुनाव लड़ रहे हैं.

पंजाब में करीब 30 फ़ीसदी दलित लोग रहते हैं और इनमें विभिन्न डेरों का अच्छा-ख़ासा प्रभाव रहता है, ख़ासकर डेरा सच्चा सौदा का. इसलिए ये डेरे अपना वोट किस पार्टी को देते हैं, वो भी अपनी भूमिका निभाता है.

उत्तराखंड में तैयारी

राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त राधा रतूड़ी के अनुसार सभी चुनाव दल दूरदराज़ के और ऊँचाई वाले इलाक़ों में भी पहुँच गए हैं.

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सभी 70 सीटों पर मुक़ाबले में है और दोनों ही पार्टियों के प्रमुख प्रचारकों ने राज्य का तूफ़ानी दौरा किया है.

राज्य में शांतिपूर्ण चुनाव हों इसके लिए केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों की 75 कंपनियाँ तो हैं ही उत्तर प्रदेश से होमगार्ड्स के 10 हज़ार और हिमाचल प्रदेश से दो हज़ार जवान बुलाए गए हैं.

रतूड़ी ने बताया कि राज्य भर में 9744 मतदान केंद्र बनाए गए हैं जिनमें से 1794 संवेदनशील और 1252 अति संवेदनशील हैं.

पंजाब में मुद्दे

ये तो हुआ राजनीतिक जोड़-तोड़ अब बात करते हैं मुद्दों की. पंजाब में जिन मुद्दों की चर्चा चुनाव प्रचार में हुई उनमें विकास, बेरोज़गारी, किसनों की दशा, युवाओं में नशाखोरी और भ्रष्टाचार शामिल रहा. अलग-अलग पार्टियों ने अपने-अपने एजेंडे के हिसाब से इन मुद्दों को उठाया है.

लेकिन पंजाब में आमतौर पर सत्ता विरोधी लहर पर लोग वोट करते आए हैं. इसलिए एक बार कभी कांग्रेस तो दूसरी बार अकाली दल सत्ता में आता रही है.

पिछले कई दशकों से ऐसा नहीं हुआ है कि कोई पार्टी सत्ता में रहने के बाद फिर सत्ता में लौटी हो.

सवाल ये है कि क्या इस बार पंजाब के लोग इस चलन को बदलेंगे. क्या वो अकाली दल को दोबारा सत्ता में लाएँगे या पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए कांग्रेस को तख़्त पर बिठाएँगे.

या फिर इस बार पीपीपी के रूप में तीसरा मोर्चा सत्ता के समीकरण बदलते हुए तुरुप का इक्का साबित होगा. जवाब करोड़ों मतदाताओं के पास है.

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