क्या राहुल यह सेमी फ़ाइनल जीत पाएंगे?

Image caption भट्टापरसौल में किसानों के साथ राहुल गांधी

उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार ने राहुल गांधी को अभी तक अपेक्षित परिणाम भले ही न दिए हों, लेकिन इसने उनकी शब्दावली को रंगीन ज़रूर बना दिया है.

जिस ठेठ अंदाज़ में राहुल उत्तर प्रदेश के मतदाताओं से रूबरू हो रहे हैं, उससे यह नहीं लगता कि वह उन्हीं पिता के पुत्र हैं, जिनकी हिंदी इतनी माशाअल्लाह थी कि उस पर कई चुटकुले गढ़ दिए गए थे.

राजीव गांधी की उस टिप्पणी को काफ़ी मज़े लेकर याद किया जाता है- ’हम जीतें या लूज़ें.....’ उन्हीं के पुत्र राहुल जब खाँटी यूपी स्टाइल में कहते हैं, ‘पहले साइकिल भड़ाक से पंचर हो गई और अब हाथी पैसा खा गया’- तो लोगों का ध्यान बरबस उनकी तरफ़ जाता है.

भाजपा का ज़िक्र करते हुए जब राहुल कहते हैं- आपने उन्हें झापड़ मारा 2004 में, तो साफ़ लगता है कि लोगों तक पहुँचने के लिए राहुल ने अपनी भाषा पर ज़बरदस्त होमवर्क किया है.

फ़र्क

राहुल इस भाव के लिए ‘थप्पड़’ शब्द का इस्तेमाल भी कर सकते थे लेकिन ‘झापड़’ और ‘थप्पड़’ में फ़र्क यह है कि झापड़ हमेशा गाल पर ही पड़ता है जब कि थप्पड़ कहीं भी पड़ सकता है. राहुल गांधी यह आभास देते हैं कि वह इन दोनों शब्दों के बीच के फ़र्क को समझते हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान बढ़ी हुई दाढ़ी और बेतरतीब बालों के ज़रिए आख़िर राहुल क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या यह कि वह इतने व्यस्त हैं कि उनके पास दाढ़ी बनाने तक का समय नहीं है? या यह कि वह अपनी कुलीन करीने से हज़ामत किए गए चेहरे से निजात पाना चाहते हैं?

वजह जो भी हो, लेकिन राहुल उत्तर प्रदेश के लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने में सफल ज़रूर रहे हैं. चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही राहुल दलितों के घर खाना खा उन पर ख़ासा ध्यान देते आए हैं. देखना यह कि उनकी यह अदा मायावती के दलित वोटबैंक में कितनी दरार पैदा कर पाती है?

कम से कम 100 सीटों में निर्णायक भूमिका निभाने वाले मुसलमानों तक पहुँचने में भी राहुल ने कोई कसर नहीं रख छोड़ी है. मायावती ने भी इस वोट बैंक को नज़रअंदाज़ नहीं किया है, इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार फिर 85 मुसलमानों को अपनी पार्टी से टिकट दिए हैं.

वह इस बात पर भी अपनी पीठ ठोंक रहीं हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान कोई बड़ा मुस्लिम विरोधी दंगा नहीं हुआ. राहुल ने बुनकरों और बुंदेलखंड के लिए विशेष पैकेज की मांग कर उनसे भी जुड़ने की कोशिश की है.

अगर वह उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को बहुत हद तक कांग्रेस के पक्ष में लाने में सफल रहते हैं तो इस मांग का उठना स्वाभाविक है कि उन्हे प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया जाए.

2007 और 2003 के चुनाव में जिस तरह कांग्रेस को सिर्फ़ 22 और 25 सीटें मिली थीं, उससे यह नहीं लगता कि राहुल गांधी की मंज़िल बहुत आसान होगी.

उत्तर प्रदेश में राहुल की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वह किस हद तक मायावती की सत्ता में वापसी की मुहिम को रोक पाते हैं. उन्होंने भ्रष्टाचार और ख़राब शासन के मुद्दे पर मायावती पर लगातार हमले किए हैं.

लेकिन कुछ कुछ इसी अंदाज़ में उन्होने दो साल पहले नीतीश कुमार को भी निशाना बनाया था लेकिन वहाँ उन्हें मुँह की खानी पड़ी थी. उस हार ने राहुल को कम से कम एक सबक ज़रूर सिखाया था और वह यह कि सत्ता में रहने के नुकसान का नियम हर बार लागू नहीं होता.

भीड़ वोट दे यह ज़रूरी नहीं

इमेज कॉपीरइट PTI
Image caption क्या राहुल गांधी की बदौलत कांग्रेस यूपी में सत्ता में लौटेगी, यही सवाल है

अगर सत्ता में रहने वाली सरकार सुझाए गए विकल्प से बेहतर है, तो यह ज़रूरी नहीं कि मतदाता उन्हें सिर्फ़ इसलिए बाहर का दरवाज़ा दिखा दें क्योंकि वह सरकार सत्ता में है.

बिहार के चुनाव ने यह भी दिखाया था कि राहुल अपनी चुनाव सभाओं में भीड़ तो ला रहे थे, लेकिन वह भीड़ वोटों में परिवर्तित नहीं हो पा रही थी.

राहुल के साथ दिक्कत यह है कि जब वह लोकपाल के मुद्दे पर संसद में बोलते हैं, तो उनकी पार्टी के लोग तालियाँ बजाते हैं लेकिन वही राहुल जब इस मुद्दे पर चुप्पी साधना ठीक समझते हैं, तो वही पार्टी वाले इसे एक रणनीति करार देते हैं.

अगर कांग्रेस ऐसे किसी क्षेत्र में जीतती है, जहाँ राहुल ने प्रचार किया हो, तो उसे राहुल की जीत बताया जाता है. लेकिन अगर वह उस इलाक़े में हारती है तो उसके लिए दूसरे लाखों कारण ज़िम्मेदार होते हैं.

कांग्रेसी उसी लाइन को गोल लाइन समझते हैं जहाँ राहुल गांधी ड्रिबलिंग करना ख़त्म करते हैं.

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम यह सुनिश्चित करेंगे कि राहुल ने एक मास लीडर की दिशा में बढ़ने की तरफ़ कदम बढ़ाया है या नहीं. अगर उत्तर प्रदेश में भी बिहार दोहराया जाता है तो हो सकता है कि 2004 से पहले की तरह राहुल बनाम प्रियंका की बहस को फिर से तूल मिल जाए.

संबंधित समाचार