'क्योंकि दाग अच्छे हैं'

Image caption चाहे दागी हो या अपराधी आख़िर उसे चुनती तो जनता ही है

उत्तर प्रदेश की राजनीति का ज़िक्र हो दागी दबंगों का ज़िक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता. जैसे गुलगुले बिना गुड के और गुड बिना गन्ने के नहीं बनता वैसे उत्तर प्रदेश की विधानसभा भी बिना दागियों के नहीं बनती.

पर इस बार फिज़ा थोड़ी बदलती दिख रही है.

बदलाव ये आया हैं कि सभी प्रमुख दलों ने दागी उम्मीदवारों के चुनाव मे थोडी सी सावधानी ज़रुर बरती हैं और पिछले चुनाव के मुकाबले दलों ने कम दागियों को टिकट दिया हैं.

अन्ना की आंच

शायद इसकी सबसे बड़ी वज़ह लगातार खुलते घोटालों के साथ- साथ अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन की आंच है.

मायावती ने तो चुनाव से पहले पार्टी में सफ़ाई अभियान ही शुरु कर दिया. मंत्री बर्खास्त होते रहे. चुनाव से पहले तो उनका मंत्रिमंडल लगभग खाली ही हो गया.

कारण साफ़ है कि मायावती को लगने लगा था कि इन दागी लोगों के भरोसे उत्तर प्रदेश की कमान दोबारा नही हासिल की जा सकती.

पर इधर से निकाले गए तो क्या दूसरे दलों से लपके गए.

दूसरों ने लपका

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में कई हज़ार करोड़ रुपयों के घोटाले के मुख्य अभियुक्त और माया सरकार के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा जब बसपा से निकाले गए, तो भाजपा ने इन्हें गले से लगा लिया.

पर जिन कुशवाहा वोटों की राजनीति की वजह से उन्हें भारतीय जनता पार्टी में शामिल किया गया था, पार्टी में ख़ुद ही इस मामले पर दो फाड़ हो गए और उसे सफ़ाई देनी पड़ी कि उन्हें टिकट नही दिया जाएगा.

पूर्वांचल में बीजेपी के मुख्य स्तंभ और सांसद योगी आदित्यनाथ ने इस निर्णय को “शरारतपूर्ण, दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए कहा कि अगर कुशवाहा को बाहर नहीं किया गया तो वे स्वयं पार्टी छोड़ देंगे.

फूलन देवी को जब समाजवादी पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया था तब भी इसी तरह के कई सवाल उठे थे. तब कहा गया था कि वह मल्लाहों की प्रतिनिधि हैं.

आत्ममंथन

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Image caption अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन की आंच नज़र आ रही है

चाहे अन्ना के आंदोलन का असर कहें या फिर इसे दलों का आत्ममंथन से उपजा ज्ञान,

बाहुबली बीएसपी विधायक डीपी यादव वह सपा में आना चाहते थे लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव के मना करने पर उन्हें शामिल नहीं किया गया.

लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के सभी बाहुबली या तो खुद मैदान मे हैं या फिर उनके रिश्तेदार, और इस बार उनकी पनाहगार बनी हैं छोटी पार्टियां .

2002 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में करीब 200 दागी लोग विधायक चुने गए थे. 2007 में दागी छवि वाले 160 उम्मीदवार चुनाव जीते थे.इनमें कुछ उम्मीदवार जेल में रहते हुए चुनाव जीते थे.

जेल से चुनाव

इस बार भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसे प्रत्याशी भी हैं जो विभिन्न आपराधिक मुकदमों में जेल में बंद होने के बावजूद चर्चा और आकर्षण का केन्द्र भी बने हुए हैं और जेल से ही चुनाव लड़ रहे हैं.

बहुजन समाज पार्टी के विधायक राजू पाल की हत्या समेत अपहरण और हत्या के प्रयास में इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद अतीक अहमद इलाहाबाद से अपना दल के प्रत्याशी हैं.

मऊ से निर्दलीय विधायक मुख्तार अंसारी अब अपनी बनाई पार्टी कौमी एकता दल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.लोकसभा के पिछले चुनाव में बीएसपी ने मुख्तार अंसारी को वाराणसी से उम्मीदवार बनाया था.

मधुमिता शुक्ला हत्या मामले मे आजीवन कारावास की सजा काट रहे विधायक अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी को समाजवादी पार्टी ने प्रत्याशी बनाया है.

टिकट नकारे जाने के बाद बाहुबली बीएसपी विधायक डीपी यादव अब बदायूं सीट से निर्दलीय प्रत्याशी हैं.

चाहे अख़बारों के सम्पादकीय कुछ लिखें मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी राजनीति में दबंगों के बारे में कुछ कहें, सच ये है कि उन पर मामले कितने भी दर्ज क्यों न हों, वो जेल में ही क्यों न हों, दबंग और दागी जीतते हैं और जो ज़मीन पर घूमे हैं वो जानते हैं की दबंग केवल गुंडागर्दी और बाहुबल के कारण ही नहीं जीतते.

जनता पर पकड़

आज के समय में जब चुनाव आयोग से लेकर विरोधी हर कोई दबंगों के डर से मतदाताओं को बचाने की कोशिश करते हुए ये कहते हैं कि दबंग केवल भय का महौल पैदा कर जीत जाते हैं कहना मुश्किल है.

चाहे गोरखपुर से सांसद महंत आदित्यनाथ हों या उनके मुखर विरोधी हरिशंकर तिवारी हो या प्रतापगढ़ से रघुराज प्रताप सिंह भैया राजा या रायबरेली से अखिलेश सिंह. यह लोग केवल बाहुबल पर नहीं जीतते. जातीय समीकरणों के अलावा इनका जनता से जुड़ाव भी है.

ऐसे समय में जब सामान्य आदमी कोई काम नहीं करा सकता तब यह लोग सरकारी तंत्र को जनता की बात सुनने के लिए मजबूर करते हैं.

मसलन पिछले विधानसभा चुनावों में प्रियंका गाँधी ने अखिलेश सिंह के लगातार लोगों से अपील की लेकिन वो फिर भी जीत गए. एक पत्रकार जो वहां गए थे लोगों ने उनको बताया कि सोनिया हो या राहुल प्रियंका कोई हमारे साथ अस्पताल नहीं जाएगा थाने कचहरी में मदद नहीं करेगा काम अखिलेश भैया ही आयेगें.

इसीलिए कहते हैं न कि 'दाग अच्छे हैं'

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