प्याज़ की परतें और जाति

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Image caption यूपी के चुनावों में हर दल जाति पर वोट ज़रुर जुटाने की कोशिश कर रहा है

साठ के दशक में जाने माने कार्टूनिस्ट अबू अब्राहम ने एक कार्टून के ज़रिए कहा था कि लोग वोट नहीं देते बल्कि जाति पर वोट देते हैं. ये बात कई वर्षों के बाद आज भी बार बार कही जाती है चुनावों के दौरान और यूपी के चुनाव में तो जाति को सबसे अहम माना जाता है. चुनाव के दौरान जाति इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो जाती है.

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर आनंद कुमार कहते हैं कि राजनीतिक दबाव के तौर पर जाति आज़ादी के बाद उभरी है.

वो कहते हैं, ''जाति की सामाजिक मान्यता गिरी है लेकिन जाति का जनतंत्र के साथ संवाद हुआ है और यही कारण है कि इसका राजनीतिक महत्व बढ़ गया है. गांवों में ये अधिक है इसमें शक नहीं किया जा सकता. ऐसा नहीं है कि एक दल ने ऐसा किया है सारे दल ही जाति के आधार पर चुनावों की रणनीति तय करते हैं. ''

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यूपी देश में आबादी के हिसाब से बड़े राज्यों में गिना जाता है और यहां एक बड़ी आबादी दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों और अन्य जातियों की है. इन जातियों का इस्तेमाल लगातार राजनीतिक दल करते रहे हैं. इलाहाबाद के गोविंद वल्लभ पंत इंस्टीट्यूट में पढ़ाने वाले बदरी नारायण कहते हैं.

''पहले अगड़ी जातियों ने लोगों को जाति के नाम पर गोलबंद किया. साठ के दशक में मुद्दे अलग थे. सत्तर के दशक में ओबीसी जातियां गोलबंद होने लगीं और उसके बाद दलित जातियों ने उन्हीं नेताओं को चुना जो उनकी जाति के लिए काम करते थे. इसमें विकास का मुद्दा पीछे नहीं छूटा बल्कि परतों में चलता रहा. इसे एक प्याज़ की तरह समझा जा सकता है. जातियों के हित और राजनीतिक विकास प्याज़ के परतों की तरह हैं. ''

यूपी में हालात अब ऐसे बन चुके हैं कि हर दल को किसी न किसी जाति से जोड़ कर देखा जाता है. मसलन मायावती का नाम दलितों से जोड़ा जाता है तो सपा का नाम यादवों से और बीजेपी को ठाकुरों की पार्टी कहा जाता है लेकिन क्या ये सारी जातियां इन्हीं पार्टियों को वोट देते हैं. आनंद कुमार कहते हैं कि ऐसा सोचना सरलीकरण होगा.

वो कहते हैं, '' देखिए ऐसा नहीं है कि एक जाति सिर्फ एक जाति को वोट देती है. पहले दलित कांग्रेस को वोट देते थे. मुसलमान भी. बाद में मायावती के समय दलितों और ब्राहमणों ने एक साथ वोटिंग की. और ये भी जान लीजिए कि इंदिरा गांधी से लेकर सभी ने जाति का इस्तेमाल किया. सोशलिस्ट राजनीति के दौरान चरण सिंह का अजगर समीकरण फिर मुलायम सिंह का माई समीकरण. वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें आनन फानन में लागू कर के ओबीसी को गोलबंद किया और फिर मायावती लेकिन अभी भी एक जाति के सारे लोग एक ही दल को वोट नहीं देते हैं. ''

अगर विभिन्न जातियां किसी एक पार्टी को वोट नहीं देती तो फिर ये वोट देती कैसे हैं. तो क्या फिर जाति के आधार पर राजनीति को समझना भूल है. बदरी नारायण कहते हैं कि जाति को एक ही चश्मे से देखना नहीं चाहिए क्योंकि इसकी कई परते हैं. वो कहते हैं कि ज़रुरी नहीं कि दलित भी एक समूह की तरह वोट करता हो. उनका कहना था, '' देखिए दलित में भी कई समूह हैं. वाल्मीकि, जाटव, चमार और ये सभी अलग अलग हितों को मानते हैं और अलग अलग वोट भी डालते हैं. वाल्मीकि पहले बीजेपी के साथ जा चुके हैं. हां ये ज़रुर होता है कि प्रभावशाली गुट जहां वोट करता है बाकी सभी उसकी तरफ ही चलने लगते हैं. ''

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में ऊंची जातियों की संख्या कम है जबकि दलितों की संख्या ज्यादा. ऐसे में उन्हें एक वोट ब्लॉक की तरह देखना सभी राजनीतिक दलों की मजबूरी भी बन जाता है. 2001 के आकड़ों के अनुसार इस राज्य में अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 20 प्रतिशत है जबकि अन्य पिछड़ी जातियों का हिस्सा 51 प्रतिशत है. साफ है कि इन जातियों को रिझाने के नित नए उपाय किए जा रहे हैं.

जहां कांग्रेस सैम पित्रोदा के मुंह से कहलवाती है कि वो जाति के बढ़ई हैं वहीं भारतीय जनता पार्टी उमा भारती को पार्टी में वापस बुलाती है और यूपी से चुनाव लड़वाती है.

इन दांव पेंचों का कितना फायदा होता है ये चुनाव परिणामों में ही पता चल पाता है लेकिन बदरी नारायण की मानें तो इन चुनावों में लोग विकास की भी बात कर रहे हैं लेकिन वो भी एक दिखावे के तौर पर.

यानि की जाति की छाया यूपी चुनावों पर ज़रुर रहेगी लेकिन कितनी ये कहना फिलहाल मुश्किल होगा और ये कहना भी कि दलित सिर्फ मायावती को वोट देंगे और यादव सिर्फ सपा को या फिर ठाकुर सिर्फ बीजेपी को.

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