चिदंबरम की भूमिका पर अहम फ़ैसला आज

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Image caption केंद्र सरकार पी चिदंबरम का बचाव करती रही है

संभावना है कि सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जु़ड़े तीन अहम मसलों पर फ़ैसला सुनाएगी.

इनमें से सबसे अहम फ़ैसला ये है कि क्या स्पेक्ट्रम की क़ीमत तय करने में तत्कालीन वित्तमंत्री और वर्तमान गृहमंत्री पी चिंदबरम की कोई भूमिका थी.

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला देना है कि क्या उन 11 कंपनियों के लाइसेंस ख़त्म कर दिए जाएं जिनकी वैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं और तीसरा ये कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की सीबीआई जाँच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट करती रहेगी या नहीं.

न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली के एक पीठ ने इस मामलों में अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है.

जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी, सुपरिचित वकील प्रशांत भूषण और सेंटर फ़ॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की याचिकाओं पर इस पीठ को ये फ़ैसला सुनाना है.

इस पीठ के न्यायमूर्ति एके गांगुली गुरुवार को ही सेवानिवृत्त हो रहे हैं.

शिकायतें

डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने अदालत से शिकायत की थी कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने पी चिदंबरम से पूछताछ नहीं की है.

Image caption सुब्रमण्यम स्वामी की याचिकाओं ने केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ाई है

उनका कहना था कि सीबीआई को स्पेक्ट्रम की क़ीमतें तय करने में वित्तमंत्री के रूप में पी चिदंबरम की भूमिका की जाँच की जानी चाहिए.

जबकि प्रशांत भूषण ने अपनी याचिका में कहा है कि वर्ष 2001 की क़ीमतों में वर्ष 2008 में स्पेक्ट्रम का आवंटन नीलामी की जगह 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार पर करना ग़लत था और इससे सरकार को राजस्व का भारी नुक़सान हुआ है.

उनकी मांग है कि अदालत इस आवंटन को रद्द करे और उसकी फिर से नीलामी करे.

डॉ स्वामी ने अदालत से अपील की है कि पहले आवेदन की जो तिथि तय की गई थी, यानी पहली अक्तूबर 2007, उस तिथि तक आवेदन करने वाले हर किसी को नीलामी में हिस्सा लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए.

आरोप है कि इस तिथि को ऐन वक़्त पर बदलकर सरकार ने 25 सितंबर कर दिया था और कई लोग आवंटन की प्रक्रिया में हिस्सा लेने से वंचित रह गए थे.

2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले पर सीबीआई जाँच कर रही है और उसने पूर्व संचार मंत्री ए राजा, डीएमके सांसद कनिमोड़ी और कई कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र पेश किया है.

सीएजी का कहना है कि स्पेक्ट्रम की नीलामी न करने से सरकार को 1.76 लाख करोड़ का नुक़सान हुआ है.

सरकार इसे घोटाला मानने से इनकार करती है और कहती है कि जो कुछ भी हुआ वह नियमानुसार हुआ.

सरकार का तर्क

केंद्र सरकार पी चिदंबरम का बचाव करती है और उसका तर्क है कि स्पेक्ट्रम की क़ीमतें तय करने या लाइसेंस के आवंटन में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.

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Image caption ए राजा अभी भी तिहाड़ जेल में हैं

वित्त मंत्रालय और वित्तमंत्री की तरह पी चिदंबरम का हमेशा से ये मत था कि लाइसेंस और स्पेक्ट्रम का आवंटन नीलामी से होना चाहिए न कि 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार पर.

केंद्र सरकार ने अदालत में कहा है कि तत्कालीन संचार मंत्री एक राजा ने टेलीकॉम कमीशन की उस अहम बैठक को नौ जनवरी, 2008 से 15 जनवरी, 2008 तक टाला था जिसमें नीलामी को लेकर अहम फ़ैसला होना था.

केंद्र का कहना है कि कंपनियों को आवंटन के पत्र 10 जनवरी, 2010 को ए राजा ने जारी किए थे तो चिदंबरम को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है.

सरकार का ये भी तर्क रहा है कि हालांकि वित्तमंत्रालय चाहता तो आवंटन को रद्द कर सकता था लेकिन ये एक बड़ा नीतिगत मसला था और इसमें क़ानूनी अड़चनों का अंबार आ जाता इसलिए ऐसा नहीं किया गया.

सरकार का कहना है कि वर्ष 1994 में बनाई गई संचार नीति के आधार पर आवंटन किए गए और उस नीति में नीलामी का प्रावधान नहीं था.

केंद्र सरकार कहती रही है कि इसलिए सिर्फ़ नीलामी न होने को आधार बनाकर लाइसेंस और आवंटन रद्द नहीं किए जा सकते.

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