निगाहें 2014 की लोक सभा पर?

  • 7 फरवरी 2012
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कहते हैं कि दिल्ली तक पहुँचने का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है.

शायद यही वजह है कि ज़्यादातर राजनीतिक विश्लेषक आगामी उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों को 2014 के आम चुनावों से पहले के सेमी-फ़ाइनल के तौर पर देखते हैं.

कांग्रेस पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश चुनावों के नतीजे सीधे तौर पर असर डालेंगे भारत में होने वाले अगले आम चुनावों पर.

राहुल गाँधी का नेतृत्व, ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे जटिल सहयोगी और सबसे ज़्यादा तो संसद में अपनी 'गरीबी-उन्मूलन' योजनाओं के भविष्य को लेकर यह विधान सभा चुनाव कांग्रेस के लिए अहम हो जाते हैं.

कांग्रेस की मजबूरियाँ

आम चुनावों के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश चुनाव कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पार्टी दूसरे बड़े राज्यों में मुश्किल का सामना कर रही है.

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एक तरह से तृणमूल के रहमोकरम पर है और राज्य की 42 लोक सभा सीटों में उसे अग्रणी रहने की उम्मीद कम ही है.

महाराष्ट्र की 48 लोक सभा सीटों में पार्टी अपने एक जटिल सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से जूझ रही है.

आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के पास फ़िलहाल तो बढ़त है क्योंकि राज्य की 42 लोक सभा सीटों में से कांग्रेस के पास 33 हैं.

लेकिन इस बात को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता कि इस राज्य में पार्टी विभाजन की कगार पर एक लंबे समय से रही है.

इन सभी हालातों को ध्यान में रखते हुए 80 लोक सभा सीटों के साथ सिर्फ़ उत्तर प्रदेश ही वो राज्य हो सकता है जिससे लोक सभा में कांग्रेस की सीटें बढ़ सकतीं हैं.

राहुल की परीक्षा

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में इस बात का पता चलने वाला है कि राहुल गांधी की राजनीतिक समझ कितनी दूर तक जा सकती है.

यह तीसरा मौका है जब राहुल ने अपने को राष्ट्रीय राजनीति के बड़े मंच पर उतारने का प्रयास किया है.

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Image caption राहुल गाँधी यूपी चुनाव की तैयारी कई साल से कर रहे हैं.

2007 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में उन्हें ख़ास सफलता नहीं मिली थी.

जबकि 2009 के लोक सभा चुनावों में राहुल गाँधी को उत्तर प्रदेश की सीटों में सफलता का स्वाद चखने का मौका मिल था, क्योंकि पार्टी 2 लोक सभा सीटों से सीधे 22 के आंकड़े पर पहुँच गई थी.

हालांकि इस मत को उस समय की चुनावी गणित के हिसाब से ज़्यादा देखा गया था बजाय इसके कि इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ राहुल की भूमिका थी.

अगर इन विधान सभा चुनावों में पार्टी उत्तर प्रदेश में बेहतरीन प्रदर्शन कर पाती है तो ज़ाहिर है राहुल गाँधी की भूमिका आगामी आम चुनावों में बढ़ जाएगी और वे कांग्रेस के स्टार प्रचारक रहेंगे.

यूपीए की मज़बूती

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की अच्छी पारी केंद्र में आसीन यूपीए गठबंधन को भी बल देगी.

अगर कांग्रेस अपने सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल के साथ मिलकर समाजवादी पार्टी को सरकार बना पाने में समर्थन देने में सफल रही तो केंद्र में एक नए गठबंधन की नींव पड़ेगी.

क्योंकि 22 सांसदों के साथ समाजवादी पार्टी केंद्र सरकार को ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे 'मुश्किल' सहयोगियों से बराबरी करने का एक सुनहरा मौका प्रदान कर सकेगी.

हालांकि बहुजन समाज पार्टी के पास भी 21 सांसद हैं लेकिन उसके साथ का गठबंधन कांग्रेस को शायद उतना न फले जितना समाजवादी पार्टी के साथ मुमकिन है.

इस गठबंधन के बाद ये भी मुमकिन है कि केंद्र में फिलहाल धीमी गति से चल रही आर्थिक नीतियों को बढ़ावा मिले.

अगर नहीं तो क्या?

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Image caption बीजेपी ने अपनी मुहिम में उमा भारती को उतार दिया है.

हालांकि अगर कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में बुरी तरह हार जाती है तो राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य जस का तस रहेगा.

पार्टी का मनोबल बुरी तरह गिर जाएगा, संसद में पहले से मौजूद दुविधाएं बढ़ जाएंगी और विपक्ष एक तरह से सरकार पर हावी हो जाएगा.

साथ ही तेलंगाना आंदोलन को बल मिलेगा और अन्ना हज़ारे के समर्थकों को एक तरह से नया जीवनदान मिल सकेगा.

सहयोगियों की बात हो तो कांग्रेस की बढ़ी कमज़ोरी को देखकर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस शायद मध्यावधि चुनावों की ओर के प्रयास तेज़ करे दे.

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भाजपा के समक्ष चुनौती

रहा सवाल भारतीय जनता पार्टी का, तो अगर पार्टी उत्तर प्रदेश चुनावों में चौथे स्थान पर रहती है तब तो 2014 के आम चुनावों में केंद्र सरकार में अहम भूमिका के बारे में उन्हें भूल जाना चाहिए.

इतिहास गवाह है कि भाजपा जब भी राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत बन कर उभरी है उसके पहले उसने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया है.

1991 और 1996 के आम चुनावों में भाजपा ने प्रदेश की 85 लोक सभा सीटों में से 52 पर कब्ज़ा किया था.

इस बात को कहना शायद गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का भाव इसलिए भी नीचे गिरा है क्योंकि उत्तर प्रदेश में उसकी हालत ख़स्ता सी है.

सौ बात की एक बात यही है कि आगामी विधान सभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए देश के सबसे घनी आबादी वाले राज्य में अपना खूंटा गाड़ लेने वाली लड़ाई है.

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