छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला, दो पुलिकर्मी मरे

  • 9 फरवरी 2012
छत्तीसगढ़ में नक्सली
Image caption पुलिसबल पिछले साल इस क्षेत्र में आदिवासियों के घरों को जलाने की घटना की जांच के सिलसिले में गए हुए थे.

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पोलमपल्ली और चिंतलनार के इलाके में माओवादी छापामोरों द्वारा किये गए बारूदी सुरंग के विस्फोट में दो जवानों के मारे जाने की खबर है जबकि एक दो जवानों के घायल होने की बात कही जा रही है.

ये सभी पुलिसकर्मी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डीएस मरावी के नेतृत्व में चिंतलनार गए हुए थे जहाँ मार्च 2011 में आदिवासियों के घरों में हुई आगज़नी की घटना की जांच चल रही है. ये जांच केंद्रीय अनुसन्धान ब्यूरो यानी सीबीआई द्वारा की जा रही है.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जब ये सभी पुलिसकर्मी चिंतलनार से वापस सुकमा लौट रहे थे तभी पहले से घात लगाकर बैठे माओवादी छापामारों नें पहले तो बारूदी सुरंग का विस्फोट किया. फिर जवानों पर गोलिया चलानी शुरू कर दीं. घटना शाम के साढ़े पांच से छह बजे के बीच की बताई जा रही है.

मार्च 2011 में चिंतलनार और तारमेतला में आदिवासियों की 300 झोपड़ियाँ जला दी गई थीं. इस इलाके में राहत लेकर जा रहे सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और अन्य अधिकारियों के दल पर विशेष पुलिस अधिकारियों नें हमला किया था.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच

Image caption पिछले साल इस इलाक़े में हुई पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की जांच के आदेश दिए थे.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद घटना की जांच सीबीआई कर रही है. पिछले दो दिनों से सीबीआई का दल चिंतलनार, तिम्मापुरम और ताड़मेटला में अपनी जांच कर रहा था.

मारे गए लोगों में कर्तम सूर्या और किच्चे नंदा शामिल हैं जो पहले विशेष पुलिस अधिकारी रह चुके हैं.

मार्च 2011 को हुई घटना के बाद जब बस्तर संभाग के आयुक्त, दंतेवाड़ा के कलेक्टर और अन्य अधिकारी पीड़ित आदिवासियों के लिए राहत लेकर जा रहे थे, तभी उनपर पुलिसकर्मियों और विशेष पुलिस अधिकारियों नें हमला कर दिया था.

इस हमले में कर्तम सूर्य और किच्चे नन्दा का नाम प्रमुख रूप से सामने आया था.

सुरक्षाबलों पर आरोप है कि उन्होंने पांच ग्रामीणों को नक्सली बताते हुए "ठंडे दिमाग" से मार गिराया है, लगभग तीन सौ झोपड़ियों में आग लगाई और तीन महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया है.

पिछले साल पुलिस की कार्रवाई

चिंतलनार के पुलिस कैंप के बीस किलोमीटर की परिधि में घने जंगलों की श्रृंखला के बीच कई आदिवासी गांव हैं और 14 मार्च 2011 की सुबह अचानक नाकेबंदी करते हुए अर्द्ध सैनिक बलों के जवानों नें इस पूरे इलाके को घेर लिया.

पुलिस का दावा था कि उन्हें गुप्त सूचना मिली थी कि मोरापल्ली के इलाके में बड़े माओवादी कमांडरों का जमावड़ा है और इस इलाके में नक्सलियों की हथियार बनाने की मशीन भी लगी हुई है. मगर यहाँ पुलिस को कुछ नहीं मिला.

खबरें हैं की सुरक्षा बलों की टुकड़ी नें लौटते वक़्त पास के ही तिमापुरम में पड़ाव डाला जहाँ उनकी माओवादियों के साथ मुठभेड़ हुई. इस मुठभेड़ में तीन जवान मारे गए थे जबकि 9 जवान घायल हुए थे.

कहा जा रहा है कि उसके बाद जो कुछ हुआ उसने पुलिस और अर्धसैनिक बलों को कटघरे में खड़ा कर दिया है. सुरक्षाबलों पर आरोप है कि बौखलाहट में उन्होंने तीन गांव में जमकर तांडव मचाया.

बस्तर के नारायणपुर, जगदलपुर, बीजापुर और कांकेर जिलों में पिछले दो सालों में ऐसी कई वारदातें हुईं हैं जिसने सुरक्षा बलों को कटघरे में खड़ा कर दिया है.

साल 2010 में नारायणपुर के ओंग्नार में भी सुरक्षा बलों पर इसी तरह के आरोप लगे थे. वहां गांव की अपनी झोपडी में खाना पका रही एक लड़की को गोली मारने का आरोप भी पुलिस पर लगा है.

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