उत्तर प्रदेश में 'वोटों की बरसात' के मायने

  • 9 फरवरी 2012
Image caption उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के पहले चरण में क़रीब 62 प्रतिशत मतदान हुआ

क्या भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र और मज़बूत हो रहा है?

चुनाव अधिकारियों का तो यही मानना है. उनके मुताबिक़ विधानसभा चुनाव के पहले चरण में हुआ 62 प्रतिशत मतदान आज़ादी के बाद से अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है.

साल 2007 के विधानसभा चुनाव में इस इलाक़े में सिर्फ़ 47 प्रतिशत मतदान हुआ था.

एक अख़बार ने तो उत्साह दिखाते हुए इस ख़बर का शीर्षक दिया- 'उत्तर प्रदेश में वोटों की बरसात'.

लेकिन तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस बात से सहमत नहीं.

देश के मशहूर चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव का मानना है कि बढ़े हुए मतदान प्रतिशत को संशोधित मतदाता सूची से जोड़कर देखा जाना चाहिए, जिसमें ऐसे तमाम लोगों के नाम हटा दिए गए जो या तो मर चुके हैं या फिर देश के बाहर रहने लगे हैं. साथ ही कई नए नाम इसमें जोड़े भी गए हैं.

मतदाता सूची अगर संशोधित न होती तो क्या होता? ऐसी स्थिति में 80 या 90 लोगों में से 46 लोग मतदान करते. यानी फिर भी मतदान 46 प्रतिशत ही रहता. जबकि वास्तव में मतदान 50 प्रतिशत होता.

तो क्या लोकतंत्र की मज़बूती संबंधी मीडिया के हो-हल्ले को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?

योगेंद्र यादव इस मत से भी बहुत ज़्यादा सहमत नहीं हैं.

उनका कहना है, "हो सकता है कि मतदान में हिस्सा लेने वालों की संख्या कुछ बढ़ी हो. असल में हमारे पास मतदाताओं की बढ़ी संख्या और मतदाता सूची में संशोधन संबंधी पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं, जिससे दोनों में तालमेल बिठाया जा सके."

पिछले दो साल में उत्तर प्रदेश में एक करोड़ 70 लाख नए मतदाता जुड़े हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में ग़लत मतदाता सूची के कारण कम मतदान होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

इसीलिए जब चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में संशोधन के मामले में सख़्ती बरती, तो उसके अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं.

राजनीतिक जागरूकता

लेकिन दूसरे राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

उनका मानना है कि मतदान प्रतिशत में नाटकीय बढ़ोत्तरी निचले तबके में आई उस राजनीतिक जागरूकता का परिणाम है, जिसकी शुरुआत 1990 से हुई थी.

इन विश्लेषकों का तर्क है कि 1960 के दशक में तमिलनाडु में भी इसी तरह की जागरुकता की शुरुआत हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप वहां 60 प्रतिशत से ज़्यादा मतदान होने लगा था.

लेकिन इस तर्क से भी इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया कि उत्तर प्रदेश में साल 2007 तक मतदान सिर्फ़ 46 प्रतिशत पर क्यों अटका था?

किसका फ़ायदा

और हां, ज़्यादा मतदान से फ़ायदा किसे होगा?

जहां तक भारत का सवाल है, तो परंपरागत तरीक़े से यह कहा जाता है कि ज़्यादा मतदान से सत्ता पक्ष को नुक़सान होता है.

यह भी कहा जाता है कि कैडर आधारित पार्टियां जैसे भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियां कम मतदान में फ़ायदे में रहती हैं जबकि कांग्रेस जैसी पार्टी ज़्यादा मतदान से फ़ायदे में रहती है.

तो इस तर्क के हिसाब से उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी और राजनीति का दलित चेहरा मायावती को नुक़सान हो सकता है और समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा को फ़ायदा मिल सकता है.

लेकिन इस तरह का कोई भी क़यास लगाना बहुत ही पेचीदा है.

साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में, बसपा के वोटों में सिर्फ़ तीन प्रतिशत की गिरावट आई थी लेकिन उसकी सीटों की संख्या विधानसभा की तुलना में आधी रह गई थी. वहीं कांग्रेस पार्टी के वोटों में 18 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई, लेकिन सीटों के लिहाज से उसे 95 प्रतिशत का फ़ायदा हुआ.

अभी भी ज़्यादातर लोगों का यही मानना है कि उत्तर प्रदेश में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा, बावजूद इसके कि वहां ‘वोटों की बरसात हो रही है.’

या फिर योगेंद्र यादव के शब्दों में कहें तो ये कि पहले यह तो तय हो जाए कि वास्तव में वोटों की बरसात हुई है.

संबंधित समाचार