पहले भी हुए हैं सेना और सरकार में टकराव

इमेज कॉपीरइट webtechpoint.com
Image caption सैम मानिकशॉ भी विवादों से नहीं बच पाए

भारतीय प्रजातंत्र के 65 वर्ष के इतिहास में भारतीय सेना और सरकार के बीच हमेशा से ही एक तरह का बारीक संबंध रहा है. दोनों पक्षों के बीच एक तरह की लक्ष्मण रेखा है जिसे कोई भी पार नहीं करना चाहता.

भारत में हमेशा से सेना और सरकार के रिश्तों में सरकार को सर्वोपरि माना गया है लेकिन ऐसे कई मौके आए हैं जब सेना और सरकार के बीच खींचतान ख़तरनाक स्तर तक पहुँची है.

सबसे पहले 1959 में भारत के सर्वश्रेष्ठ सेनाअध्यक्षों में से एक जनरल के एस थिमैय्या के तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन से सतभेद इस हद तक पहँच गए थे कि उन्होंनें अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री नेहरू को भेज दिया था.

मेनन के तेवर और जनरल थिमैय्या

कृष्ण मेनन अपने रूखे और सख़्त तेवरों के लिए इतने कुख्यात थे कि सेना के तीनों प्रमुख उनके पीठ पीछे उन्हें ‘गॉड अलमाइटी’ कहा करते थे. उनकी एक आदत थी कि वह जूनियर अफ़सरों को बुला कर सीनियर अफ़सरों के बारे में उनकी राय पूछा करते थे.

एक बार उन्होंने मेजर जनरल सैम मानिकशॉ के बुला कर जानना चाहा कि वह जनरल थिमैय्या के बारे में क्या सोचते है. मानिक शॉ मुँह फट तो थे ही. उन्होंने कहा,’ सर एक जूनियर अफ़सर के तौर पर हमें अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं दी जाती. हम अपने सीनियर अधिकारियों की इज़्जत करते हैं और इस बारे में कोई दो राय नहीं है.’

ज़ाहिर है कृष्ण मेनन को यह बेबाकी पसंद नहीं आई और इसका बदला बाद में उन्होंने मानिक शॉ से निकाला.

चीन के खतरे को देखते हुए थिमैय्या चाहते थे कि भारत रक्षा तैयारियों पर और ध्यान दे. कृष्ण मेनन ने उनकी बात को गंभारता से नहीं लिया. मजबूर होकर थिमैय्या ने प्रधान मंत्री नेहरू से मिलने का समय माँगा.

उन्होंने इस बात पर माफ़ी माँगी कि रक्षा मंत्री के होते हुए भी वह रक्षा से संबंधित मामलों पर उनसे बात करने आए हैं.

उन्होंने नेहरू को साफ़ साफ़ बताया कि किस तरह मेनन उनकी सलाह की पूरी तरह से अवहेलना कर रहे हैं.

बेहतर यह होगा कि अगर वह ठीक समझें तो रक्षा मंत्री को बुला कर हालात की गंभीरता बताएं और बाद में दूसरे सेना प्रमुख भी इस बैठक में शामिल हो जाएं.

लेकिन नेहरू का कहना था कि वह पहले इस मुद्दे पर मेनन से ख़ुद बात करें.

थिमैय्या ने आशंका जताई कि मेनन को यह बात पसंद नहीं आएगी. लेकिन नेहरू का कहना था कि इस मुद्दे पर मंत्री को बाई पास करना ठीक नहीं होगा.

जब थिमैय्या कृष्ण मेनन से मिले तो मेनन उन पर आग बबूला हो गए कि वह बग़ैर उनकी इजाज़त के नेहरू से कैसे मिले? यह सरासर बग़ावत है और पूरी तरह से अनुचित है.

थिमैय्या बातचीत बीच में ही छोड़कर अपने घर चले आए और अपनी पत्नी से कहा कि सामान बाँधिए. आर्मी हाउस से बाहर निकलने का समय आ गया है.

उन्होंने नेहरू से मिलने का एक बार फिर समय लिया.

नेहरू उनका इस्ताफ़ा देख कर दंग रह गए. उनके कंधे पर हाथ रखते हुए उन्होंने कहा, "इस इस्तीफ़े को तुरंत वापस लीजिए. सात बजे तक इस इस्तीफ़े को बापस लेने के बारे में एक और पत्र मुझे दीजिए. तब तक यह पत्र मैं अपने पास रखे रखूँगा."

थिमैय्या झिझक रहे थे. तब नेहरू ने अपना टृंप कार्ड चला, "टिमी मैं आप से कह रहा हूँ कि आप मेरे लिए इस इस्तीफ़े को वापस ले लें और मैं ऐसा प्रधान मंत्री के तौर पर ऐसा नहीं कह रहा हूँ बल्कि एक बुज़ुर्ग के रूप में कह रहा हूँ."

मानिकशॉ और नौकरशाही में भी ठनी

थिमैय्या को नेहरू की बात माननी पड़ी. सत्तर के दशक में जनरल सैम मानिक शॉ की भी रक्षा मंत्री जगजीवन राम से नहीं बनती थी.

लेकिन वह इस मामले में भाग्यशाली थे कि उनकी बात सुनने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दरवाज़े हमेशा खुले रहते थे.

लेकिन यह साफ़ था कि भारतीय नौकरशाही को मानिकशॉ की यह अदा नागवार गुज़रती थी. 1971 की लड़ाई के बाद मानिकशॉ ने एक विवादास्पद बयान दिया था जिसकी वजह से उनकी काफ़ी किरकरी हुई थी.

उन्होंने कहा था कि 1947 में उनके पास विकल्प था कि वह पाकिस्तानी सेना में जा सकते थे. अगर ऐसा हुआ होता जो 1971 की लड़ाई का परिणाम दूसरा ही होता.

उन्होंने यह बात मज़ाक के तौर पर कही थी लेकिन इस पर संसद में काफ़ी बवाल हुआ था और सरकार को काफ़ी सफ़ाई देनी पड़ी थी.

अस्सी के दशक में इंदिरा गाँधी ने वरिष्ठता के नियम को तिलांजलि देते हुए जनरल एसके सिन्हा के स्थान पर जनरल एएस वैद्य को सेना प्रमुख बनाया था.

जनरल सिन्हा का कसूर सिर्फ़ इतना था कि एक समय वह जयप्रकाश नारायण के काफ़ी नज़दीकी होते थे.

जनरल सिन्हा ने जनरल वैद्य को बधाई देने के बाद अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

एडमिरल भागवत की बर्ख़ास्तगी

90 के दशक में एडमिरल भागवत ने वाइस एडमिरल हरेंद्र सिंह को उप नौसेना अध्यक्ष बनाने के मंत्रिमंडल के आदेश को मानने से इनकार कर दिया था.

एक शाम जब वह अपना काम ख़त्म कर अपने घर जा रहे थे तो अतिरिक्त रक्षा सचिव सुबीर दत्ता का लिखा पाँच लाइन का एक पत्र उन्हें दिया गया जिसका लब्बोलबाव था कि राष्ट्रपति एडमिरल भागवत को तुरंत प्रभाव से बर्ख़ास्त करते हैं.

कारण बताया गया था कि वह सरकार का विश्वास खो चुके हैं.

लगभग उसी समय वाइस एडमिरल सुशील कुमार को कोच्चि से एक विशेष विमान से दिल्ली लाकर उन्हें नए नौसेना अध्यक्ष की कमान सौंप दी गई थी.

एडमिरल कुमार से यह बात इतनी गुप्त रखी गई थी कि पद सँभालने के कुछ देर बाद उन्होंने अपनी पत्नी वेनिटा को फ़ोन कर कहा था कि उनके गर्म कपड़े निकलवाकर तुरंत दिल्ली भिजवाएं!