टीवी सीरियल देखकर बच्चे ने फाँसी लगाई

  • 10 फरवरी 2012
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Image caption ईशा कहती हैं अपराधिक धारावाहिकों में हिंसा वाले दृश्य नहीं दिखाए जाने चाहिए

उत्तरपूर्वी दिल्ली के मौजपुर में स्थित मोहम्मद सलीम के एक कमरे के मकान में सारा सामान सलीके से रखा है. चारों ओर छाई गहरी शांति के बीच सुनाई देती है गहरी सिसकियां.

ये सिसकियां है इशा बानो और उनकी मां मनुव्वर जहाँ की.

मंगलवार की शाम इशा के 12 साल के बेटे सुहैल सलीम ने ख़ुद को फांसी लगा ली थी.

इशा का कहना था, "मेरा बेटा टीवी पर आने वाले अपराध से जुड़े सीरियल देखता था और मुझसे पूछा था कि इसमें एक लड़की ने फांसी लगाई थी ये कैसे लगाते हैं? पंखे से इस महिला ने कैसे गांठ लगाई? मैंने उसे समझाया कि ये सब नाटक है और इन्हें इस काम के लिए पैसे मिलते हैं और ऐसा नहीं करना चाहिए."

जब इशा ने पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे अपने सुहैल को इस बारे में अनजाने में ही आगाह किया था उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा हादसा उनके ही घर में घट जाएगा.

इशा कहती है कि वे मंगलवार की शाम केवल कुछ समय के लिए ही अपने बेटे को अकेला छोड़कर अपने पति के साथ कुछ ही दूर अपने रिश्तेदार के घर गई थीं.

लेकिन जब वापस लौटीं तो वह अपने बेटे को खो चुकी थीं.

'कैसे भूला पाऊँगी?'

अपने बेटे को खो देने के क्षणों को याद करते हुए वे कहती हैं,''जब मैं वापस आई तो देखा कि मेरे बेटे ने चार कुर्सियों को एक के ऊपर एक लगाकर, ब़ुर्के के दुपट्टे से ख़ुद को बांधकर फांसी लगा ली थी. मैंने जल्दी से उसके पैरों को थामा, उसके तलवे बर्फ़ की तरह ठंडे थे.उसकी जीभ बहार निकली हुई थी लेकिन लगा कि शायद कुछ न हुआ हो और डॉक्टर के पास गए लेकिन हमारी उम्मीद टूट गई.''

इशा की सूझी हुई आंखों से आँसू बहे जा रहे थे और वो रह-रह कर कह रही थी,''मेरा एक ही बेटा था. मैं कैसे उसे भुला पाऊंगी. वही तो मेरी आस था.''

वो कहती हैं कि सुहैल शरारती तो था लेकिन घर के काम में भी उनका हाथ बँटाता था और ये नहीं सोचा था कि उसकी शरारत एक दिन उसे ही ले डूबेगी.

इशा को किसी से कोई शिकायत नहीं है वे कहती हैं, ''अपराध पर आधारित धारावाहिकों में कोई भी हिंसा से जुड़ा हुआ सीन नहीं दिखाना चाहिए क्योंकि बच्चे मासूम होते हैं और उन्हें अंदाज़ा नहीं होता इससे कितना नुक़सान हो जाता है. मैं नहीं चाहती मेरी तरह कोई और मां-बाप भी तड़पे.''

सुहैल की नानी, मनुव्वर जहाँ कहती हैं,'' मेरी बच्ची की तो गोद ही उजड़ गई. मुझे कोई नानी कहने वाला ही नहीं रहा."

उन्होंने कहा, "ऐसे धारावाहिक नहीं दिखाए जाने चाहिए. ऐसी चीज़े दिखाई जानी चाहिए जिसमें मां-बाप की इज़्जत करना सिखाया जाए, अच्छी बातों का ज्ञान दिया जाना चाहिए.''

सुहैल की नानी कहती हैं, ''उसने एक धारावाहिक में देखा कि एक किरदार मर गया और दूसरे दिन उसने धारावाहिक में उसे जिंदा पाया. अब बच्चे में क्या दिमाग होता है उसने अपने पर भी वही प्रयोग किया. लेकिन हम तो महरुम हो गए न?''

चंचल मन

दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष समीर मल्होत्रा कहते हैं कि बच्चों का मन कोमल और चंचल होता है और बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता है. वे पूर्ण रुप से परिपक्व नहीं होते है. ऐसे में वो जो भी कुछ देखते है उसका असर उनके ज़ेहन में रहता है और फिर वे ये प्रयोग अपने पर कर लेते है.

उनका कहना है कि ऐसी ख़बरे मीडिया में आती रहती हैं जिससे अंदाज़ा होता है कि ऐसे मामले बढ़ रहे हैं

डॉक्टर समीर मलहोत्रा कहते है, "इंटरनेट पर ऐसे कई गेम्स होते हैं जिसमें हिंसा होती है और बच्चों को इसमें किसी को मार कर बड़ा मज़ा आता है और वीरता का एहसास होता है. उनमें संवेदनशीलता कम हो जाती है."

वे कहते हैं,''बच्चे कल्पना और सच्चाई के बीच फ़र्क नहीं कर पाते. उम्र, तजुर्बा, दिमाग़ का विकास होता है उन्हें सही-गलत का फ़र्क बताता है. ऐसे में अभिभावकों का दायित्व बनाता है कि वे अपने बच्चों को जानकारी दें, उनपर निगरानी रखें, मौलिक शिक्षा दें, बच्चों को समय ज़्यादा दें, उनके सवालों के जवाब दें और बाहर जाकर खेलने कूदने का समय दें.''

दिशानिर्देश

चाइल्ड लाइन इंडिया फांउंडेशन में कम्युनिकेशन एंड स्ट्रेटजी के प्रमुख निशीत कुमार का कहना है कि फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड होता है जो फिल्मों के आधार पर बच्चों को देखने की अनुमति देता है. लेकिन टीवी सीधे हमारे घर तक पहुंचता है ऐसे में हमें दर्शकों के लिए दिशानिर्देश की ज़रुरत है.

उनका कहना है , ''दुनियाभर में कार्टून को लेकर भी दिशानिर्देश है कि इसमें हिंसा है और इसमें नहीं है लेकिन भारत में अब तक ऐसे सख़्त दिशानिर्देश नहीं है कि किस तरह के कार्यक्रम नहीं दिखाने चाहिए, या किन कार्यक्रमों में अभिभावको को बच्चों के साथ होना चाहिए. हमारे यहां केवल खंडन लगा दिया जाता है कि ये पेशेवर लोग कर रहे हैं आप ऐसा न करे ."

उनका कहना है कि हर कार्यक्रम के साथ दिशानिर्देश आने चाहिए.

जब हम खाने की चीज़ों में ये दिखा सकते हैं कि लाल रंग का निशान मांसाहारी खाने के लिए है और हरा रंग शाकाहारी खाने के लिए तो इसी तरह कार्यक्रम के साथ दिशानिर्देश हों ताकि अभिभावकों को पता रहे किस तरह का कार्यक्रम आ रहा है.

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