नेताओं के बदले पत्रकारों का प्रचार!

पत्रकारों की होर्डिंग
Image caption पत्रकार भी राजनेताओं से कहाँ पीछे रहने वाले हैं

लखनऊ से सटे उन्नाव में यूँ तो छह विधान सभा सीटें हैं. लेकिन इलाक़े में कई घंटे बिताने के बाद भी न तो चुनावी रंग देखने को मिलते हैं और न ही फ़िज़ा चुनावी है.

हाँ, बड़े-बड़े होर्डिंग ज़रूर मिले. लेकिन उम्मीदवारों या दिग्गज नेताओं के नहीं, बल्कि ज़िले के पत्रकारों के. शहर के बीचों-बीच स्थित है बड़ा चौराहा, जिससे निकलने वाली चार सडकें मानों इलाक़े का पूरा राजनीतिक परिदृश्य बता रही हों.

इस पर बात बाद में, क्योंकि इसी बड़े चौराहे पर लगा है एक होर्डिंग, जो दो स्थानीय पत्रकारों की गाथा गा रहा है. पास के एक दुकान वाले से पूछा कि माजरा क्या है?

तो राम कुमार ने बताया, "अरे ये लोग तो बड़े लोग हैं. पैसे इतने इनके पास कहाँ से आते हैं, ये तो राम ही जाने."

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सड़कों का महत्व

शहर में दाखिल होते वक़्त जब आप बड़े चौराहे पर पहुँचते हैं, तो यक़ीन मानिए, आपके पास चार राजनीतिक विकल्प होते हैं.

अगर बाईं ओर मुड़ जाइए, तो कांग्रेसी इलाक़ा है और उस पर इनके समर्थकों की भरमार है.

ज़ाहिर है, यहीं पर आगे चल कर संसदीय क्षेत्र की सांसद अनु टंडन का दफ़्तर भी है. वो दूसरी बात है कि जब हम उनसे बातचीत की उम्मीद लिए वहाँ पहुंचे, तो उनके दफ़्तर में वीरानी छाई थी.

पूछने पर एक दो कर्मचारियों ने अलग-अलग जवाब दिए.

पहला बोला- मैडम चुनाव सभा में गईं हैं. दूसरा बोला- साहब, लखनऊ गईं हैं और कुछ पता नहीं कब लौटेंगी. तीसरा बोला- आप उनके सचिव से बात कर लें, वही सही-सही बता सकेंगे.

बात दरअसल यह है कि उन्नाव की सांसद अनु टंडन रहतीं यहाँ से दूर लखनऊ में हैं, लेकिन दफ़्तर उनका यहाँ है.

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झंडों का रहस्य

ख़ैर, वापस चौराहे पर लौटिए, तो सीधे जाने वाली सड़क आपको यहाँ की मस्जिद तक ले जाएगी और उधर समाजवादी पार्टी के बारे में लोगों की राय ज़्यादा बेहतर लगी.

तीसरी सड़क आपको क़िले के इलाक़े में ले जाती है, जिसमें बहुजन समाज पार्टी का बोलबाला है और यहाँ के मौजूद विधायक वहीं रहते हैं.

रहा सवाल चौथी सड़क का, तो उस पर दाईं और बाईं तरफ केसरी झंडे ही लहरा रहे दिखते हैं.

मुझे एकाएक लगा कि यह इलाक़ा तो भाजपा समर्थकों के अलावा किसी और का हो ही नहीं सकता. लेकिन पास से गुज़रते वक़्त बाबा झंडेश्वर नाथ मंदिर की ध्वजा पताका देख कर विचार थोडा डगमगा सा गया!

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