मलिहाबाद के मुसलमानों का रंज

  • 11 फरवरी 2012
मलिहाबाद
Image caption आम के मौसम के बाद कई लोग बाज़ार में दुकान लगाते हैं

उत्तर प्रदेश में दशहरी की धरती मलिहाबाद में इन दिनों हर गली, हर नुक्कड़ पर चर्चा-ए-आम विधान सभा चुनाव ही है. हालांकि वो बात और है कि अभी तो आम का मौसम आने में कई महीने हैं.

लेकिन यहाँ के लोगों का जज़्बा है कि पूछिए मत! मुसीबत के दिनों को भी इतनी ख़ूबसूरती से बयां करते हैं कि आप इनके क़ायल हो जाएँ.

मायावती और मुलायम में से किसने अपने-अपने शासन में प्रदेश और इलाक़े के लिए क्या किया है और क्या कर सकते थे, इस बात का अंदाजा सिर्फ़ आम लोगों से बात भर करने के बाद लगने लगता है.

मोहम्मद क़ासिम दशहरी आम के एक बाग़ के पिछवाड़े में ही रहते हैं और जाड़े के दिनों में मूंगफली का ठेला लगाते हैं.

वे कहते हैं, "हमारे इलाक़े को इस बात से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता कि पास सरकार किसकी है. जिसकी भी होगी वो आम खाते वक़्त हमें याद तो करेगा ही. लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि आम के अलावा हमारे बारे में दूसरा कोई ख़्याल इन नेताओं के दिमाग़ में नहीं है."

इंतज़ार

इन दिनों क़ासिम साहब की दिनचर्या ज़रा दूसरी है. उन्हें इंतज़ार रहता है टीवी चैनलों पर दिखाई जाने वाली चुनावी ख़बरों का. लेकिन मायूसी है कि पीछा ही नहीं छोड़ रही.

उनका कहना है, "महीनों से उर्दू अख़बारों में रोज़ पढ़ रहा हूँ कि मुसलमान वोटरों को लुभाने में लगी हैं पार्टियाँ. लेकिन जनाब यहाँ तो हम मुसलामानों की ज़िंदगी में जैसे आम की मिठास का तमगा सा लग गया है. सभी को लगता है कि मलिहाबाद में तो मुसलमान अच्छा खाते और पीते हैं. फिर उनके बारे में बात क्यों करना."

इलाक़े में कई घंटे बिताने के बाद मुझे इस बात का अहसास हो चला था कि मलिहाबाद में 'ऑफ़-सीज़न' के दिनों में इर्द-गिर्द मंडराने वालों में उन लोगों की तादाद ज़्यादा है जो बाग़ों में काम करते हैं, न कि उनकी जो इन बाग़ों के मालिक हैं.

लेकिन एक ज़माने में एक छोटा सा गाँव रहे मलिहाबाद के निवासी आज भी सालों पुरानी आदत से बाज़ नहीं आते.

शाम होते ही इलाके के बड़े-बूढ़े झुंड में यहाँ-वहाँ दिखाई देते हैं. ऐसे ही एक झुंड के पास बैठने पर पता चला कि इन लोगों के हाथ से सजाये-सँवारे गए आम मुलायम सिंह यादव के गाँव से लेकर सोनिया गाँधी के निवास 10 जनपथ तक जाते हैं.

लेकिन इन लोगों का रंज आज भी वही है जो बीसों साल पहले था. चुनाव के दिनों में भी कोई हाल चाल ठीक से नहीं लेता.

बेरुख़ी

Image caption सरकार से आम मुसलमानों को नाराज़गी है

लगभग सभी की राय यही है कि उनके बारे में तो प्रशासन से लेकर सरकार तक तभी जाग उठती है जब आम का सीज़न आता है. इलाके में लोग-बाग़ सड़कों के किनारे तक उतर आते हैं अपने-अपने आमों की पेटियां लेकर.

आगामी मतदान में ग़ौर करने वाली बात यही रह सकती है कि मलिहाबाद की मौजूदा सीट, जो समाजवादी पार्टी के पास है आख़िर किसकी झोली में जाएगी.

वर्ष 2007 में हुए मुकाबले में बसपा के उम्मीदवार मेवा लाल ने गौरी शंकर को इस सुरक्षित सीट पर कांटे की टक्कर दी थी.

रहा सवाल कांग्रेस का, तो उनके उम्मीदवार को सातवें स्थान से ही संतोष करना पड़ा था. अब इस बार ऊँट किस करवट बैठेगा, इसका फ़ैसला छह मार्च को मलिहाबाद के निवासियों के सामने ही होगा.

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