जिन्हें दो गज़ ज़मीन तक नसीब नहीं

कालबेलिया कलाकार इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption कालबेलिया कलाकारों की नृत्य शैली पर्यटकों को लुभाती आई है.

कालबेलिया जाति का नाम सुनते ही कानों में संगीत गूँजने लगता है और कभी नाच, कभी बीन तो कभी हस्तशिल्प से लोगों को लुभाते बंजारों की छवि बनने लगती है. लेकिन इनका शोषण और दर्द न प्रशासन को दिखता है और न सरकारों को...

भारत में बौद्धों के पतन के बाद समाज के जो हिस्से ख़ुद को हिंदुओं की मुख्यधारा से नहीं जोड़ सके, वे नाथपंथियों के रूप में पहचाने जाते हैं. कालबेलिया समाज इन्हीं नौ नाथों में से एक, कनिपनाथ को मानने वालों में हैं.

राजस्थान में ये मुख्य रूप से पाली, भीलवाड़ा, जोधपुर, बाड़मेर, राजसमंद, अजमेर, प्रतापगढ़ ज़िलों में पाए जाते हैं. इनमें से अधिकतर का कोई स्थायी बसेरा नहीं है. चलते-फिरते, दर-दर की ठोकरें खाते और खाक छानते ये बंजारे अभी तक दुतकारों और उलाहनों के बीच चलते-जीते रहने को मजबूर हैं.

इस रिपोर्ट का ऑडियो सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

राजस्थान के राजसमंद ज़िले की सवागी बताती हैं कि उनके पास न तो जाति प्रमाण पत्र और न रहने को पक्का ठौर...कहीं कोई पानी तक भरने नहीं देता. उनके और अन्य महिलाओं के साथ पानी भरने की जगहों पर या सार्वजनिक स्थानों पर बाकी जातियों के लोग बदतमीज़ी से पेश आते हैं.

ग़रीबी, उपेक्षा, तिरस्कार और शोषण की यह कहानी केवल सवागी का नहीं, कालबेलिया समाज के एक बड़े हिस्से का सच है.

भीख मांगने को मजबूर

राजस्थान के विकास अध्ययन संस्थान की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि राज्य के 81 प्रतिशत कालबेलिया भीख मांगने को मजबूर हैं. अस्सी प्रतिशत ऐसे हैं जो अब तक कहीं बसाए नहीं जा सके हैं और अपनी बकरियों, गधों और मुर्गियों के साथ बंजारों की तरह एक जगह से दूसरी जगह भटकने को विवश है.

कालबेलिया अधिकार मंच के रतननाथ कालबेलिया अपने समाज की स्थिति बयां करते हैं, “हमारे समाज में अधिकतर लोगों के नाम के आगे नाथ लिखा जाता है क्योंकि हम नाथपंथी हैं. अगर किसी ने कालबेलिया नहीं लिखा है तो उसे अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र नहीं मिलता है. कुछ ज़िलों में नाथों को एससी श्रेणी में रखा ही नहीं गया है. कई घरों में पिता के पास अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र है पर बेटे के पास नहीं.”

वो बताते हैं, “समाज के अधिकतर लोगों के पास मतदाता पहचान-पत्र नहीं है. इंदिरा आवास के घर इन लोगों को मिले नहीं हैं. किसी भी सरकारी योजना का लाभ इनको नहीं मिलता. चाहे वो जननी सुरक्षा हो, नरेगा हो, मध्याहन भोजन हो. जो कुछ बच्चे स्कूलों में जाते भी हैं, उनके साथ बहुत भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है.”

जोधपुर, चित्तौड़, अजमेर और राजसमंद में कालबेलिया समाज के लोगों से मिलकर हमने पाया कि गांवों के बाहर डेरे डालकर रह रहे कालबेलिया परिवारों की महिलाएं दबंगों का शिकार बनती हैं. बहुत समय तक गांवों के लोग इन्हें अपने आसपास की ज़मीन पर बसने नहीं देते. चोरी डकैती का कोई भी मामला हो, पुलिस की पहली गाज इन्हीं पर गिरती है.

कला की कैसी कद्र

इतना सब तब है जबकि राजस्थान सरकार पर्यटन के नाम पर पर्चे, पोस्टर, वेबसाइटें और अन्य प्रचार सामग्री बनाते समय सबसे पहले कालबेलिया लोक कलाकारों की ही तस्वीर दिखा रहे होते हैं.

कालबेलिया नृत्य और संगीत दुनियाभर में राजस्थान की लोककला को पहचान और प्रसिद्धि दिलाता है.

इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption स्थायी घरों के अभाव में कालबेलिया दर-दर भटकते रहते हैं

लेकिन युनेस्को द्वारा संरक्षित नृत्य की श्रेणी में रखे गए कालबेलिया नृत्य संगीत के कलाकार बिचौलियों, दलालों की मार तो झेल ही रहे हैं, सरकारें भी इनकी कोई सुध नहीं ले रही हैं.

राजस्थान में दलितों के मुद्दों पर काम कर रहे पत्रकार भंवरलाल मेघवंशी बताते हैं, “दलाल और बिचौलिये औने-पौने पैसे देकर इन लोगों को दुनिया के अन्य हिस्सों में ले जाते हैं और इनकी प्रस्तुतियों से पैसे कमाते हैं. इन कलाकारों के पास विदेशों में जाने के लिए पासपोर्ट तो हैं पर अपने ही देश में रहने-बसने के लिए एक इंच ज़मीन तक नहीं है.”

दो गज़ ज़मीं नहीं

सबसे दुखद तो यह है कि इन लोगों को जीते जी तो कोई जगह रहने-बसने के लिए नसीब नहीं, मरने के बाद भी इनके लिए कोई जगह नहीं है. कालबेलिया लोग जहाँ बस गए हैं वहां ज़िंदा और मुर्दा लोग एक ही छत के नीचे रह रहे हैं. जीते रहे तो उस घर में और मर गए तो उसी घर में दफ़ना दिए गए.

वजह यह है कि कालबेलिया समाज में जलाने की नहीं, शवों को दफ़नाने की परंपरा है. पर इनके पास कोई शमशान भूमि नहीं है. गांवों के अन्य लोग, जहाँ कालबेलिया बसे होते हैं, इन लोगों को किसी निजी या सार्वजनिक ज़मीन में शव दफ़नाने नहीं देते.

राजसमंद के मांगूनाथ कालबेलिया बताते हैं, “कोई मौत हो जाती है तो हम रो भी नहीं सकते क्योंकि अगर रोएंगे तो लोग सतर्क हो जाएंगे और फिर दफ़नाना एक मुसीबत बन जाता है. रातों को चुपचाप अंधेरे में शवों को गधे पर रखकर हम दूर सूनसान जगहों पर ले जाते हैं. बिना आहट के इन्हें दफ़नाते हैं. कई बार तो दफ़नाने के लिए शव को ले जाते समय हम पकड़े और खदेड़े भी गए हैं.”

यह समाज दलितों में भी अति-दलित है लेकिन इनकी एक बड़ी तादाद अनुसूचित जाति के प्रमाण-पत्रों से वंचित है. जाति प्रमाण पत्र के अभाव में न तो ये दलितों के लिए मिलने वाली सहायता, सुविधाएं ले सकते हैं और न ही इनपर हो रहे शोषण को दलित उत्पीड़न के मामलों के तौर पर दर्ज किया जाता है. इसके चलते स्थिति और भी भयावह है.

भारत यूआईडी तक पहुंच गया है. विभाजन और सन 71 की लड़ाई के बाद के शरणार्थी भी यहां नागरिक होने का हक़ हासिल कर चुके हैं पर कालबेलिया समाज आज भी इस ज़मीन में अपने नाम, अपनी पहचान, अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहा है.

संबंधित समाचार