'मुलायम मा जौन बात, तेस राहुल और माया मा कहां'

उत्तर प्रदेश में आख़िर क्या बदला पिछले पांच सालों में? सुल्तानपुर के सियासी माहौल के बीच बस अड्डे के पास एक शख़्स के साथ बिताए एक घंटे ने मुझे जैसे हिलाकर रख दिया.

सज्जन सिंह पिछले 22 सालों से सुबह सात बजे से लेकर दोपहर दो बजे तक एक चबूतरे पर अख़बार बेचते हैं.

यहाँ इस बात का ज़िक्र ज़रूरी है कि सज्जन इस ज़िले के रहने वाले नहीं हैं. वे दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में जन्मे थे.

कब जन्में, इसका पता इन्हें भी नहीं, क्योंकि न तो मां-बाप ने बताया और न ही उनके कोई भाई-बहन या रिश्तेदार हैं.

अपने बीते दिनों की याद करते हुए वे बताते हैं, "नौ साल के रहेन, तब्बै से एक ठे पड़ोसी अपन साथे यहाँ लै आयेन. स्कूल कालेज कब्बो देखेन नाई, होत केस हैं".

'अहिर हैं साहब'

बहुत पूछने पर सज्जन सिंह ने बड़ी मुश्किल से अपनी जात-पात का पता दिया. कहते हैं कि जो पडोसी उन्हें एक पैसेंजर ट्रेन में बैठा कर यहाँ लाये थे, उन्ही से पता चला कि वे यादव समुदाय से हैं.

सज्जन ने बताया, " बचपन मा तो हम अवधियो बोलै नाई जानित रहा. सब मनई घूर देत रहे इह बताएक पर कि हम पश्चिम का रहै वाले हैं. पर हमै कब्बो सरम नाई रही कि हम अहिर हैं साहब."

हालाँकि वो बात और है कि ख़ुद सज्जन के मुताबिक़ पिछले पांच क्या दस सालों में भी इस ज़िले में कुछ नहीं बदला है.

बहुत कुरेदने पर और माइक बंद रखने के वादे पर उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में पहले तो सवर्णों का बोलबाला था, लेकिन पिछले क़रीब दस वर्षों में चीज़ें बदल गई हैं.

सज्जन बताते हैं, "मायावती जब सरकार बनायिन ओहके बाद से जौन ठाकुर-पंडित रहे, वै अब सांत बैठा हैं. लेकिन हम कब्बो बहनजी का नहीं देखा जिला मा."

'मुलायम हमार नेता'

सज्जन ने अपनी रोज़ी-रोटी के बारे में भी विस्तार से बात की. उन्होंने बताया कि बीस से भी ज़्यादा वर्षों से वे एक ही काम कर रहे हैं, अखबार बेचने का.

कहते हैं कि जब शुरू किया था तब तो एक रूपये से कम में आते थे सभी अखबार, अब चीज़े बदल गईं हैं महंगाई के साथ-साथ.

लेकिन उत्तर प्रदेश कि मुख्यमंत्री मायावती के शासन से बिल्कुल नाख़ुश दिखने वाले सज्जन सिंह को गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले सुल्तानपुर-अमेठी क्षेत्र में रहते हुए भी उनसे उम्मीद कम ही है.

वे कहते हैं, "मुलायम मा जौन बात है, तेस राहुल और माया मा कहां. वै जब सीएम रहेन तब महंगायियो कम रही और बेईमानियो न रही."

मुलायम सिंह यादव के प्रति सज्जन कि निष्ठा के बारे में सोचते हुए मैंने थोड़ा हिचकिचाते अंदाज़ में उनसे पूछ ही डाला कि क्या ऐसा वो इसलिए मानते हैं क्योंकि वे भी यादव समुदाय के ही हैं?

जबाव के नाम पर चुप रहते हुए उन्होंने मुझे झिड़कने वाली प्रतिक्रिया दी.

इसके साथ ही मेरे ज़ेहन में एक बात साफ़ हो चली थी. उत्तर प्रदेश में चाहे विकास के नाम पर वोट मांगे जा रहे हों या भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर, यहाँ के जातीय समीकरण अभी भी चुनावों पर ख़ासे हावी हैं.

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