चिकन के बाद अब हलाल चीनी

गन्ने के खेत
Image caption प्रमाण पत्र के लिए ये भी ज़रुरी होता है कि चीनी सीधे गन्ने से बनाई गई हो और कोई रसायन न डाला गया हो

आपने चिकन और मांस का हलाल होना तो सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि अब हलाल चीनी का भी उत्पादन होने लगा है.

भारत में कई कंपनियाँ हलाल चीनी का उत्पादन कर रही हैं और उसका निर्यात किया जा रहा है.

संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, सऊदी अरब, ओमान, कतर, और बहरीन जैसे खाड़ी के देश इसके मुख्य खरीददार हैं.

हलाल चीनी में इस्लाम में वर्जित किसी पदार्थ या प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं किया जाता और इसके लिए कुछ एजेंसियाँ बाक़ायदा प्रमाण पत्र जारी करती हैं.

सोमवार को महाराष्ट्र में सहकारी क्षेत्र में कार्य करने वाली वारणा शुगर ने दावा किया था कि उसने दुनिया के पहले हलाल चीनी का उत्पादन किया है.

लेकिन मुंबई में हलाल उत्पादों का प्रमाण पत्र जारी करने वाली एजेंसी का दावा है कि उसने तीन कंपनियों को पहले ही हलाल होने का प्रमाण पत्र दे रखा है.

हलाल होने का प्रमाण पत्र

हलाल कमेटी जमिएय उलेमा-ए-महाराष्ट्र के तहत जमीयत हलाल वेलफ़ेयर सोसायटी नाम की एक संस्था हलाल प्रमाण पत्र जारी करती है.

प्रमाण पत्र जारी करने वाले अधिकारी वसीम अख्तर बताते हैं कि उनके विशेषज्ञ संयंत्रों दौरा करते हैं और निर्माण की पूरी प्रक्रिया का अध्ययन करते हैं इसके बाद वे प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं.

चीनी को दिए जाने वाले प्रमाण पत्र के बारे में उन्होंने कहा, "इसके लिए हम मुख्य रुप से ये देखते हैं कि चीनी गन्ने से बनाई गई हो, किसी तरह के रसायन, जैसे एंजाइम का प्रयोग नहीं किया गया है और उसे शुद्ध करने के लिए या उसको लंबे समय तक रखने के लिए अगर कोई रसायन नहीं मिला गया है. अगर ये सब नहीं हुआ तो हम प्रमाण पत्र दे देते हैं."

उनका कहना है कि ये प्रमाण पत्र एक वर्ष के लिए जारी किया जाता है फिर उसका नवीनीकरण करवाना होता है. इसके लिए कंपनी को हलफ़नामा भी देना होता है कि वे किसी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं.

उनका कहना है कि उन्होंने तीन चीनी उत्पादों को प्रमाण पत्र जारी किए हैं.

इसी तरह का प्रमाण पत्र जारी करने वाली एक और एजेंसी हलाल इंडिया के एक अधिकारी शरीफ़ ने बीबीसी को बताया कि वे आवेदन आने के बाद प्रमाण पत्र जारी करने के लिए एक प्रक्रिया का पालन करते हैं.

उन्होंने प्रक्रिया का विवरण देने से इनकार करते हुए कहा कि ये आवेदन के बाद ही तय होता है. हालांकि इस एजेंसी का कहना है कि उन्होंन अब तक किसी चीनी को हलाल होने का प्रमाण पत्र जारी नहीं किया है.

ज़रुरत

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Image caption चीनी बनाने की कुछ प्रक्रिया में पहले हड्डियों का चूरा भी उपयोग में लाया जाता था

आख़िर हलाल प्रमाण पत्र की ज़रुरत क्यों है, इस सवाल पर जमीयत हलाल वेलफ़ेयर सोसायटी के वसीम अख़्तर कहते हैं, "इस्लामिक देश अगर किसी खाद्य सामग्री का आयात कर रहे हैं तो वे देखते हैं कि वे इस्लामिक ढंग से उसे खा सकते हैं कि नहीं, ख़ासकर तब जब ये सामान भारत जैसे ग़ैर इस्लामिक देश से आयात हो रहा हो."

वे बताते हैं कि इसलिए इस्लामिक देश चाहते हैं कि आयात होने वाली हर खाने की सामग्री पर हलाल का प्रमाण पत्र हो.

वे बताते हैं, "प्रोसेस्ड फ़ूड यानी प्रसंस्करित खाद्य, बिस्कुट और सौंदर्य प्रसाधनों जैसे लिपस्टिक, फ़ेसियल और पाउडर आदि के लिए भी हम प्रमाण पत्र जारी करते हैं."

उनका कहना है कि कई बार उत्पादन करने वाले लोगों को पता नहीं होता कि इस्लाम के अनुसार किन चीज़ों का प्रयोग करना चाहिए और किन चीज़ों का नहीं, ऐसे में वे लोगों को सही सलाह देते हैं और फिर सुधार कर लेने के बाद प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाता है.

कंपनियाँ और प्रक्रिया

हलाल चीनी का उत्पादन करने वाली कंपनियों में हाल ही में वारणा शुगर (इंडिया) का नाम जुड़ा है.

हालांकि उनका ये दावा सही प्रतीत नहीं होता कि उन्होंने दुनिया में पहली बार हलाल चीनी का उत्पादन शुरु किया है लेकिन उनके इस दावे ने हलाल चीनी की ओर लोगों को ध्यान तो खींचा ही है.

महाराष्ट्र में सहकारिता के क्षेत्र में काम करने वाली इस कंपनी के चेयरमैन विनय कोरे ने बीबीसी को बताया कि खाड़ी देशों में जब उन्होंने अपने सहकारी संगठन के बारे में लोगों को बताया तो उन्हें लोगों ने ही बताया कि ये तो इस्लाम की अवधारणा के अनुरुप ही है और तभी हमें खयाल आया कि क्यों न हलाल चीनी का उत्पादन किया जाए.

हालांकि वे ये भी मानते हैं कि इसके पीछे वारणा को एक ब्रांड की तरह स्थापित करना भी एक मक़सद था.

इसी कंपनी के प्रबंध निदेशक वीएस चव्हाण ने बीबीसी को बताया कि कुछ साल पहले हड्डी के पाउडर का प्रयोग चीनी को सफ़ेद करने के लिए किया जाता था, हालांकि अब इसका प्रयोग नहीं किया जाता.

हलाल चीनी के बारे में उन्होंने बताया कि इसके प्रमाण पत्र के लिए दो मुख्य शर्त होती है, एक तो गन्ना में चूहे आदि नहीं होना चाहिए, दूसरे रसायन भी फ़ूड ग्रेड रसायन चाहिए.

वे कहते हैं कि चूंकि उन्होंने यूरोपीय संघ की ओर से अनुमोदित तकनीक ख़रीद ली है इसलिए वे फ़ूड ग्रेड का भी रसायन उपयोग में ला रहे हैं.

उनका कहना है, "हलाल चीनी के लिए एक शर्त ये भी थी कि नदी के पानी में बैक्टीरिया नहीं होना चाहिए, इसलिए हमने कई करोड़ रुपए खर्च करके रिवर्स ऑस्मॉसिस यूनिट लगा दिया है."

वारणा शुगर इंडिया का कहना है कि वह अपने नए संयंत्र में हर साल दस लाख टन हलाल चीनी का उत्पादन करेगी और उसका लक्ष्य है कि इसे पूरा निर्यात कर लिया जाए.

जमीयत हलाल वेलफ़ेयर सोसायटी के वसीम अख़्तर कहते हैं कि उनकी संस्था ने नागलामल, टिटावी और श्रीरेणुका नाम की तीन कंपनियों की चीनी को हलाल चीनी होने का प्रमाण पत्र जारी किया है.

श्रीरेणुका के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट ने बीबीसी को बताया कि उनकी कंपनी वर्ष 2007-08 से हलाल चीनी का निर्यात कर रही है. उन्होंने बीबीसी को अपनी कंपनी का हलाल सर्टिफ़िकेट भी भेजा है.

ब्राज़ील के बाद भारत दुनिया का दूसरा बड़ा चीनी उत्पादक है. अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा वह निर्यात भी करता है.

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