भारत और अयोध्या...वाया गोधरा

  • 22 अप्रैल 2012
अयोध्या
Image caption 2002 में भी अयोध्या में कारसेवक जमा हुए थे. साबरमती एक्सप्रेस से लौट रहे इन कारसेवकों की जलकर मौत के बाद गोधरा कांड हुआ.

सरयू के किनारे खड़ी अयोध्या आज शांत है. कारसेवकपुरम में भी शांति है. रामजन्मभूमि (बाबरी मस्जिद गिराए जाने की जगह) के आसपास का इलाक़ा छावनी में तब्दील हो चुका है जहां रात दिन ड्यूटी कर रहे पुलिसवाले चिढ़े हुए से लगते हैं.

लोगों की तलाशी लेते बार बार झल्ला उठते हैं. लोहे की ग्रिलों के बीच गुज़रते गुज़रते समझ में नहीं आता है कि आप कहां से कहां पहुंच जाते हैं.

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आसपास मिट्टी के उठे हुए टीले हैं. ऐसे ही एक टीले पर मटमैला प्लास्टिक लगा हुआ है. पास आने पर पुलिसवाला चिल्लाता है. यही जन्मभूमि है हाथ जोड़िए. कुछ सेकंड्स जब तक आप हाथ जोड़ें, आप आगे बढ़ा दिए जाते हैं. फिर पीली काली रेलिंग्स और पुलिसवालों के चिढ़े हुए चेहरे.

भीड़ न के बराबर. तीर्थयात्रियों से अधिक बंदर जो प्रसाद छीन लेते हैं. अधिगृहित भूमि के बाहर कई दुकानें हैं. पीछे की दुकानों पर बाबरी मस्ज़िद गिराए जाने के फुटेज दिखाने वाली सीडी धड़ल्ले से बिकती है.

लंबे समय से दुकान चला रहे सुरेश कुमार कहते हैं, ''ये कैसेट खूब बिकते हैं. बाहर से जो लोग आते हैं वो ये कैसेट अधिक ले जाते हैं. पहले तो अधिक बिकते थे. अब कम बिकते हैं.''

अगले हिस्से में ये कैसेट टीवी पर नहीं दिखते. आल्हा की शक्ल में गाया गया रामायण सुनाई पड़ता है. दुकानदार कहते हैं आजकल इसकी मांग अधिक है. इसलिए हर दुकान में आल्हा की कैसेट ज़रुर मिलेगी आपको.

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1992 से 2002 तक

थोड़ी ही दूर पर हनुमानगढ़ी है यानी हनुमान का मंदिर. विशालकाय मंदिर में भीड़ भी खूब है. हनुमान रामलला से अधिक लोकप्रिय हैं अयोध्या में भी. देश में भी हनुमान जी के मंदिर अधिक ही होंगे रामजी से. हनुमान जी जनता के भगवान हैं सवा रुपए में मान जाते हैं.

राम जी के लिए मस्ज़िद तोड़नी पड़ती है और उसके बाद कारसेवकपुरम में करोड़ों रुपए की लागत वाली मंदिर के डिज़ाइन के लिए पत्थर काटे जाते हैं.

2007 के बाद कारसेवकपुरम में काम बंद था. इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद काम थोड़ा सा शुरु हुआ है फिर लेकिन तेज़ी नहीं है. कारसेवकपुरम में पुजारी का काम कर रहे हज़ारी बताते हैं कि वो 1989 के बाद से यहीं हैं.

Image caption कारसेवकपुरम में पुजारी का काम कर रहे हज़ारी बताते हैं कि वो 1989 के बाद से यहीं हैं.

वो गर्व से बताते हैं, ‘'हमने तोड़ा था ढांचा. चढ़ गए थे ऊपर. उसके मलबे में दब गए. हाथ पैर में बहुत चोट आई. कंधा अभी भी दुखता है हमारा. शाहजहांपुर से आए थे. अब संकल्प है जब तक मंदिर नहीं बनेगा वापस नहीं जाएंगे.’’

हज़ारी को ज़मानत भी मिल गई वो कारसेवकपुरम में आराम से रहते हैं. हज़ारी जैसे कई कारसेवक 2002 में भी जमा हुए थे अयोध्या में कारसेवा के लिए.

उनमें से कई 26 फरवरी को लौटे थे साबरमती एक्सप्रेस से...वो कभी अपने घर नहीं पहुंचे. गोधरा में ट्रेन जली 59 कारसेवक मारे गए जिसके बाद 2000 मुसलमान.

मैंने भी अयोध्या देखा और अब साबरमती एक्सप्रेस से ही जा रहा हूं गोधरा. अयोध्या और गोधरा के बीच का फासला सिर्फ दस साल का है. 1992 और 2002 लेकिन कुछ लोगों के लिए ये दूरी ज़िंदगी और मौत की बन गई. मेरी कोशिश है भारत और अयोध्या को देखने की --- वाया गोधरा....

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