चुनाव में सुरक्षा बलों की फजीहत

सुरक्षाकर्मी

उत्तर प्रदेश में हो रहे विधान सभा चुनावों में अब तक जो खास बात देखने को मिली है, वो है यहाँ तैनात मुस्तैद सुरक्षाकर्मी.

हर शहर, हर जिले की सीमाओं पर मौजूद सैंकड़ों सुरक्षाकर्मी यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि चुनाव में किसी प्रकार की गड़बड़ी या बाधा न आए.

लेकिन इस सबके बीच एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे निगल पाना जरा मुश्किल लगता है. सच यही है कि इन हजारों सुरक्षाकर्मियों की रोजमर्रा की जद्दोजहद बहुत मार्मिक है.

आइए एक नज़र दौडाते हैं इन लोगों की तादाद पर जो दूर-दराज़ से उत्तर प्रदेश पहुंचे हैं, जिससे चुनाव शांतिपूर्ण रहे. उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद सबसे ज़्यादा सुरक्षा बल की तैनाती की गई है.

केंद्रीय सुरक्षा बलों के 70,000 से भी ज़्यादा जवान विभिन्न इलाकों में ड्यूटी बजा रहे हैं. इनका बखूबी साथ निभा रहे हैं उत्तर प्रदेश के डेढ़ लाख से भी ज़्यादा पुलिसकर्मी और पीएसी के जवान.

ख़स्ताहाल दिनचर्या

15 फरवरी को वाराणसी की आठ विधान सभा सीटों के लिए मतदान होना है, जिसके लिए 20 लाख से भी ज़्यादा मतदाता हैं.

यहाँ से सटे कई अन्य इलाकों में मतदान के लिए पिछले दो दिनों से निरंतर नए सुरक्षाकर्मी पहुंचाए जा रहे हैं. लेकिन जिन हालातों में यह सुरक्षाकर्मियों की तैनाती हो रही है, वो बेहद दुखद है.

बड़े-बड़े ट्रकों में इन सुरक्षाकर्मियों को एक जगह चुनाव ख़त्म होने के बाद दूसरी जगह पहुंचाया जाता है. न ही इनके खान-पान का ठीक इंतजाम है और न ही इनके रहने का.

इलाहबाद-वाराणसी की सीमा से सटे इलाके में मैं एक ढाबे में इनमे से कुछ से मिला. घंटों सफ़र करने के बाद इन सिपाहियों के पास अपने-अपने खाने के डिब्बों में हैंड पंप से पानी भर पी लेने की ही फुर्सत रहती है.

क्योंकि आगे चल के इन्हें दिन की हाज़िरी भी देनी है और अपना-अपना खाना भी बटोरना है.

'घर बार से तो दूर हैं'

Image caption सुरक्षाकर्मियों को कठिन परिस्थितियों में रहना पड़ता है

पीएसी की एक कंपनी बनारस की सीमा पार कर अगले विधान सभा क्षेत्र चंदौली में चौकसी के लिए जा रही है. मैंने इसी कंपनी के दो जवानों प्रताप और सूरजभान से जब बात की तो इनका जज्बा देख कर दंग रह गया.

प्रताप ने बताया, "हम लोगों की तो नौकरी ऐसी है कि महीनों घर-बार से दूर रहना पड़ता है. अब जो सच है वो तो सच है."

बहुत ज़्यादा पूछने पर भी ये लोग इस बात को बताने से कतराते हैं कि खाना-पीना समय से मिल पाता है कि नहीं.

लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि इनकी नींद भी समय से पूरी नहीं हो पा रही है चुनावी ड्यूटी करते-करते.

वरना सामान ढोने वाले ट्रक में भी चलते समय बैगों-अटैचियों पर किसी तरह लेट कर सोना कोई मामूली बात भी नहीं है!

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