वह हसीन औरत

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Image caption मधुबाला सिर्फ़ 36 साल तक जीवित रहीं

भारत में अभिनेत्रियों की सुंदरता का ज़िक्र होता है तो सबसे पहले मधुबाला का नाम लिया जाता है. वह भारत की मर्लिन मनरो थीं.

फिल्मफ़ेयर के पूर्व संपादक बी के करंजिया का मानना था कि मधुबाला के किसी भी प्रकाशित चित्र ने उनकी सुंदरता के साथ न्याय नहीं किया है.

उन्हीं के ज़माने की अभिनेत्री मीनू मुमताज़ कहा करती थीं, ''मधुबाला को पर्दे पर देख कर कोई कह नहीं सकता था कि उन्हें दिल की बीमारी थी. सितारा देवी याद करती हैं कि नाचते समय हर दस मिनट बाद मधुबाला कहा करती थीं कि क्या वह थोड़ा आराम कर सकती हैं. लेकिन उसके बाद जब वह नाचती थीं तो पूरी दुनिया देखती थी.''

1952 में संगदिल की शूटिंग के दौरान जब 16 साल के गोपीकृष्ण उन्हें नृत्य निर्देशन देने आए तो मधुबाला ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगीं और बोलीं, ''मुझे नहीं पता था कि बच्चे भी डांस डायरेक्टर बन सकते हैं.''

लेकिन जब फ़िल्म पूरी हुई तो वह 101 रुपए लेकर उनके घर गईं और उनसे कहा कि वह उन्हें अपना शिष्य बना लें.

मधुबाला को शुरू में सिर्फ़ उर्दू और पश्तो ही आती थी.वह अंग्रेज़ी का एक शब्द भी नहीं बोल सकती थीं. फिर उन्होंने तय किया कि वह अंग्रेज़ी सीखेंगी और तीन महीने के अंदर वह अंग्रेज़ी लिखने पढ़ने और बोलने लगी थीं.

मधुबाला को कार ड्राइव करने का बहुत शौक था. वह उनका तनाव कम करने का एक ज़रिया था. वह कार से ख़रीदारी के लिए दादर जाती थीं वह भी बुर्के में.

सौंदर्य पोल में चौथा स्थान

1952 में फ़िल्म फ़ेयर ने एक सौंदर्य पोल आयोजित किया था और नामी प्रोड्यूसरों और अभिनेताओं से पूछा था कि उनकी नज़र में सबसे ख़ूबसूरत अदाकारा कौन है. पहले नंबर पर नलिनी जयवंत आईं थीं.

उसके बाद नर्गिस और बीना राय का नंबर था. मधुबाला को चौथा स्थान मिला था और उनके बारे में कहा गया था कि उनके पास नलिनी जयवंत जैसा शारीरिक आकर्षण नहीं है.

41 साल बाद 1993 में एक और फ़िल्मी पत्रिका ने जब अपने युवा पाठकों से पूछा कि उनकी सबसे प्रिय पुरानी हीरोइन कौन है, 58 फ़ीसदी लोगों ने जवाब दिया मधुबाला.

1953 में तीन बार के ऑस्कर पुरुस्कार विजेता फ़्रैंक कापरा जब मुम्बई आए तो उनका ज़बरदस्त स्वागत किया गया.

फ़िल्म पत्रकार बी के करंजिया जब उनका इंटरव्यू करने गए तो अपनी पत्रिका मूवी टाइम्स का एक अंक भी अपने साथ लेते गए. उसके कवर पर मधुबाला की तस्वीर छपी हुई थी.

कापरा ने पूछा, ''यह कौन साहिबा हैं ? क्या वह इतनी हसीन हैं जितनी इस तस्वीर में दिख रही हैं ? मैं इनसे मिलना चाहता हूँ.''

तय हुआ कि मधुबाला को कापरा से मिलने के लिए दिन के खाने पर ताज होटल में बुलाया जाए. करंजिया ने जोश में मधुबाला के पिता अताउल्लाह खाँ को फ़ोन कर दिया.

ख़ां साहब ने इस प्रस्ताव में कोई भी रुचि नहीं दिखाई. सिर्फ़ इतना बोले, ''मधुबाला काँटे छुरी से खाना नहीं खा सकतीं. इसलिए वह ताज होटल नहीं जाएंगी.''

एक बार न्यूयॉर्क की थियेटर ऑर्ट पत्रिका ने अपने मुख पृष्ठ पर मधुबाला की तस्वीर छाप कर उनपर एक लेख छापा जिसका शीर्षक था, ‘दुनिया की सबसे बड़ी अभिनेत्री जो बेवरली हिल्स में नहीं रहती.'

मधुबाला समय की बहुत पाबंद थीं. ठीक पाँच बजे उठ कर कार्टर रोड के समुद्र के किनारे पर चहलक़दमी करती थीं और नौ बजे स्टूडियो पहुँचती थीं.

इस पर फ़िल्म इंडिया ने एक मज़ाक छापा था कि महबूब को अपने सारे टेक्नीशियनों के साथ बहुत जल्दी स्टूडियो पहुँचना होता है.

फ़िल्म इंडिया ने लिखा था, ''महबूब जम्हाईयाँ लेते हुए वहाँ पहुँचते हैं ताकि वह वहाँ सो रहे दिलीप कुमार को जगा सकें जो कि आज कल स्टूडियो में ही सो रहे हैं ताकि वह अपनी हीरोइन के पास वक़्त से पहुँच सकें.''

चू एन लाई और भुट्टो ने उन्हें नाचते देखा

मुग़लेआज़म की शूटिंग के दौरान जब शीश महल का सेट बनवाया गया तो कई लोग शूटिंग देखने वहाँ पहुँचा करते थे. जिन लोगों ने मधुबाला को वहाँ नाचते हुए देखा उन में चीन के तत्कालीन प्रधान मंत्री चू एन लाई भी थे.

उसी सेट पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने एक मुशायरे में भाग लिया था. जब मधुबाला वहाँ अपने नृत्य का अभ्यास करती थीं तो पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो उन्हे देखने वहाँ आया करते थे .

मुग़लेआज़म की शूटिंग के दौरान जब दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच अंतरंग प्रेम सीन फ़िल्माए जाने थे तो निर्देशक के आसिफ ने मधुबाला के पिता अताउल्लाह ख़ाँ को सेट से दूर रखने की योजना बनाई क्योंकि वह दिलीप कुमार को पसंद नहीं करते थे.

आसिफ़ साहब को पता था कि अताउल्लाह ख़ाँ रमी खेलने के शौकीन हैं. उन्होंने अपने पब्लिसिस्ट ताराकाँत गाँधी को कुछ हज़ार रुपए दिए और कहा कि आज से तुम्हारा काम यह है कि अगले कुछ दिनों तक तुम ख़ाँ साहब से रमी खेलो ओर जानबूझ कर हारो.

मज़े की बात यह है कि जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो फ़िल्म फ़ेयर ने इसे सिर्फ़ तीन पुरस्कार दिए ओर वह भी सर्वश्रेष्ठ फ़ोटोग्राफ़ी, सर्वश्रेष्ठ संवाद और सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म की श्रेणी में.

के आसिफ़ ने सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार यह कह कर ठुकरा दिया कि जब इसके हीरो ओर हीरोइन को पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया तो इसको सबसे अच्छी फ़िल्म चुनने का क्या औचित्य है.

उस साल का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म अभिनेत्री का पुरुस्कार घूँघट फ़िल्म के लिए बीना रॉय को मिला लेकिन पुरस्कार पाए बिना भी मुग़लेआज़म की मधुबाला हमेशा के लिए अमर हो गईं.

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