महादलित रेडियो प्रसंग: चढ़ेगा रंग या होगा बदरंग

बिहार में महादलितों के लिए रेडियो

बिहार की राजनीति में रेडियो और महादलित से जुड़ा हुआ एक रोचक प्रसंग उभरा है. उसी के तहत यह सवाल भी उठा है कि राजनीति के इस खेल का रंग खिलेगा या बदरंग हो जायेगा ?

हुआ ये है कि राज्य के महादलित परिवारों को रेडियो ख़रीदने के लिए राज्य सरकार की तरफ़ से प्रति परिवार चार सौ रूपए के कूपन दिये जा रहे हैं.

अबतक ऐसे 65 हज़ार परिवारों के बीच लगभग ढाई करोड़ रूपए के कूपन बांटे जा चुके है. इस तरह राज्य के सभी 22 लाख महादलित परिवारों को दो वर्षों के भीतर मुफ़्त में रेडियो उपलब्ध कराने की योजना है.

विपक्ष इसे वोट की राजनीति या सस्ती लोकप्रियता हासिल करने जैसी धूर्तता बता रहा है. जवाब में सत्ता पक्ष तीखेपन से कहता है कि दलितों में भी जो महादलित है, उस पर अगर मुख्यमंत्री कुछ ज़्यादा मेहरबान हैं तो विरोधी दलों के पेट में दर्द क्यों होता है ?

रेडियो योजना पर बहस

यह जो ' मुख्यमंत्री महादलित रेडियो योजना ' बनी है, उसे राज्य सरकार के महादलित विकास मिशन से जोड़ा गया है. इस के पीछे काम कर रही राजनीतिक रणनीति को प्रेक्षक चुनावी लाभ से प्रेरित मानते हैं.

बिहार में नीतीश सरकार ने दलित समुदाय की कुल 22 जातियों में से सिर्फ एक जाति 'दुसाध' यानी पासवान को अलग करके ' महादलित ' नाम से दलितों का एक नया वर्ग बनाया है.

आरोप है कि वर्ष 2007 का ये फ़ैसला इस राज्य में लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान का दलित जनाधार तोड़ने की नीयत से किया गया था.

इस प्रदेश में दलितों (अनुसूचित जाति) की कुल आबादी एक करोड़ तीस लाख से अधिक मानी जाती है. इनमें अकेले पासवान जाति के लोगों की तादाद 40 लाख के आस-पास है.

यही है वो जातीय समीकरण, जिसने नीतीश राज में ' महादलित ' शब्द को जन्म दिया है. और चुनावी परिणाम गवाह है कि इस का बिहार में जनता दल (यू) और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन को भरपूर फ़ायदा भी मिला.

महादलित की राजनीति

Image caption सरकार और विपक्ष में इस योजना पर ख़ूब बयानबाज़ी हो रही है.

इसलिए रेडियो के साथ महादलित का सम्बन्ध सूत्र जोड़ने वाली इस राजनीति को यहाँ हर कोई साफ़-साफ़ समझ रहा है. लेकिन इसी राजनीति ने बिहार की महादलित बस्तियों में घर-घर रेडियो पहुँचाने का जो कार्यक्रम चलाया है, उस के कुछ खट्टे-मीठे अनुभव मैंने भी बटोरे हैं.

बतौर मौक़ा मुआइना, आइये सुनते हैं, पटना के पास दीघा इलाक़े की एक महादलित बस्ती का यह अनोखा रेडियो-प्रसंग. (सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें )

इस योजना के मकसद के बारे में सरकार का औपचारिक बयान 'दलित उत्थान' वाला ही राग अलापता है. इस बाबत राज्य सरकार के विभागीय सचिव रवि परमार से मेरी बातचीत हुई.

उन्होंने कहा, ''महादलित परिवारों के बीच उनके विकास से सम्बंधित योजनाओं की जानकारी और उनके स्वास्थ्य या शिक्षा से जुड़ी हुई सूचनाएँ रेडियो के ज़रिये उन तक पहुँचाना ही इस योजना का मुख्य मक्सद है .इसके लिए उपयोगी प्रोग्राम तैयार करने या सामुदायिक रेडियो जैसी व्यवस्था करने का प्रस्ताव राज्य सरकार के विचाराधीन है. लेकिन इसमें साल-दो साल का वक़्त लगेगा.''

लेकिन दूसरी तरफ़ भूमिहीन महादलित परिवार की तात्कालिक समस्याएं और ज़रूरतें कुछ और ही हैं. उन्हें सबसे पहले रोज़ी-रोटी और बसने के लिए ज़मीन का कोई टुकड़ा चाहिए.

रोज़ी-रोटी बनाम रेडियो

दीघा की दलित महिला प्रेमलता देवी कह रही थीं - '' ठीक है कि सरकार के दिये हुए रेडियो पर समाचार या गाना-बजाना सुन लेती हूँ. लेकिन इससे क्या होगा ? घर का खर्चा कैसे चलेगा ? दोनों बेटा बेरोज़गार है और बेटी घर में कुंआरी बैठी है. मैं विधवा और बीमार औरत हूँ.''

ऐसा ज़रूर लगा कि सरकार से मुफ़्त में रेडियो हासिल करने वाले महादलित परिवार के लोगों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति रुझान बढ़ा है. लेकिन ऐसा भी साफ़ दिखा कि उसी बस्ती के अन्य दलित यानी पासवान और पिछड़ी जातियों में इस कारण नीतीश सरकार के प्रति काफ़ी रोष पैदा हुआ है.

ग़ुस्से में आकर वहाँ मलाह(निषाद) और यादव जाति की महिलाओं ने तो यहाँ तक कह दिया कि रेडियो बाँटने वाला पार्टी इस बार वोट मांगने आएगा तो झाड़ू मार कर भगाउंगी.

सियासत के रंग

एक ने कहा ''दो-चार सौ रूपए का रेडियो तो हम मज़दूर क्लास के लोग जब चाहें ख़रीद सकते हैं. अरे, देना ही है तो रोज़गार दो ना ? ''

जो भी हो, शुक्र है कि टेलीविज़न, कम्प्यूटर- इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन के ज़ोर-शोर वाले ज़माने में मंद पड़े रेडियो का प्रवेश किसी बहाने बिहार के 22 लाख परिवारों में हो तो रहा है !

जहाँ अरबों-अरब रूपए की सरकारी योजनाओं में महालूट मची हो, वहाँ लगभग अस्सी करोड़ रूपए की महादलित रेडियो योजना एक ऐसी भेंट है, जो किसी भी हालत में बिलकुल बेकार तो नहीं ही जायेगी.

यह बात और है कि महादलित टोलों में प्रति माह चार हज़ार रूपए की सरकारी तनख्वाह पर नियुक्त किये गये 'विकास मित्रों' को पिछले चुनाव में सरकारी दलों के पक्ष में काफ़ी सक्रिय देखा गया था.

लग रहा था जैसे महादलित मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक पहुँचाना ही उन 'विकास मित्रों ' की पहली ड्यूटी थी. वाह ! क्या-क्या रंग हैं इस राजनीति के ! ?

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