कुरान के सहारे परिवार नियोजन

  • 15 फरवरी 2012
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Image caption डॉ इलियास अली का दावा करते हैं कि उनके अभियान को मौलवियों का समर्थन मिल रहा है

ये बहस लंबे समय से जारी है कि इस्लाम परिवार नियोजन की इजाजत देता है या नहीं लेकिन इसी बहस के बीच असम के एक मुसलमान डॉक्टर ने मुसलमानों को परिवार नियोजन के लिए राज़ी करवाने की मुहिम छेड़ रखी है.

असम में गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्रोफ़ेसर इलियास अली इसके लिए बाक़ायदा क़ुरान की आयतों का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं कि क़ुरान परिवार नियोजन के ख़िलाफ़ नहीं है.

उनका कहना है कि उन्होंने मुसलमान धार्मिक नेताओं को भी अपने तर्कों से सहमत कर लिया है और वे भी इस अभियान का हिस्सा बन गए हैं.

उनका दावा है कि उनके अभियान के असर से बड़ी संख्या में मुसलमान पुरुष अब नसबंदी करवा रहे हैं और महिलाएँ और पुरुष परिवार नियोजन के दूसरे साधनों का प्रयोग कर रहे हैं.

गुवाहाटी के ही मौलाना तालेबुद्दीन हालांकि डॉक्टर इलियास अली से इस बात पर सहमत नहीं हैं कि क़ुरान नसबंदी के विरोध में नहीं है लेकिन वे ये भी मानते हैं कि इससे मुस्लिम समुदाय को फ़ायदा हो रहा है.

पटना के एक वरिष्ठ धार्मिक नेता मौलाना निज़ामुद्दीन कहते हैं कि क़ुरान की जिन आयतों का ज़िक्र डॉक्टर कर रहे हैं उसमें बच्चों के बीच अंतराल रखने का तो ज़िक्र है लेकिन नसंबदी की सख़्त मनाही है.

अभियान

डॉक्टर इलियास अली ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा कि चूंकि वे नॉन स्कैलपेल वैसेक्टॉमी (एनएसवी) यानी बिना सर्जरी के नसबंदी की विधा में प्रशिक्षित थे, उन्हें असम सरकार ने इसके प्रचार का जिम्मा सौंपा.

एनएसवी के बारे में वे कहते हैं कि इस विधि में न छुरी से काटने की ज़रुरत होती है और टाँके लगाने की.

उनका कहना है कि इस आधार पर उन्होंने पाया कि ऐसी प्रक्रिया तो क़ुरान में भी प्रतिबंधित नहीं है और उन्होंने मुस्लिम बस्तियों में जाकर इसका प्रचार करना शुरु किया.

डॉक्टर अली कहते हैं, "मैंने लोगों को समझाया कि अल्लाह ने हमको धरती पर भेजा है जिससे कि हम इसे ख़ूबसूरत बनाए रख सकें. इसके लिए हमें पेड़ पौधों और जानवरों की भी देखभाल करनी होगी और ये सबका दायित्व है."

वे कहते हैं, "मैंने क़ुरान के दो नंबर सूरा की आयत 233 का और 46 नंबर सूरा की आयत 15 का ज़िक्र किया और लोगों को समझाया कि क़ुरान भी कहता है कि बच्चे को कम से कम ढाई साल तक माँ का दूध नसीब होना चाहिए और दो बच्चों के बीच इतना ही अंतराल भी होना चाहिए."

लेकिन क्या इसका मुसलमान धार्मिक नेताओं ने विरोध नहीं किया, इस सवाल पर वे बताते हैं कि शुरू-शुरू में कुछ लोग विरोध कर रहे थे लेकिन अब कोई विरोध नहीं कर रहा है और कई मौलाना तो उनके साथ अभियान में साथ होते हैं और मंच से लोगों को परिवार नियोजन के फ़ायदे गिनाते हैं.

इस अभियान में मुसलमानों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए उन्होंने कुछ कैंपों में 1200 लोगों के बीच एक सर्वेक्षण किया था और इसमें लगभग 46 प्रतिशत लोग मुसलमान थे.

उनका कहना है कि इस अभियान के बाद बड़ी संख्या में मुसलमान पुरुष कंडोम का इस्तेमाल करने लगे हैं और मुसलमान औरतें गर्भ निरोधक गोलियों और कॉपर टी आदि का प्रयोग करने लगी हैं.

डॉक्टर अली का दावा है कि मौलाना तालेबुद्दीन भी उनके अभियान में शामिल हैं. लेकिन नसबंदी के सवाल पर उन्होंने बीबीसी से कहा, "डॉक्टर इलियास अली कोई धार्मिक विद्वान तो नहीं हैं लेकिन वे क़ुरान का ज़िक्र करके लोगों को परिवार नियोजन करवा रहे हैं. क़ुरान और हदीस नसबंदी की इजाजत तो नहीं देते, लेकिन कोई एहतियात बरतना चाहे तो इसकी मनाही नहीं है."

इस सवाल पर कि क्या असम के ज़्यादातर मुसलमान धार्मिक नेता डॉक्टर अली से सहमत हैं, उन्होंने कहा, "ये कहना ठीक नहीं होगा कि सभी मौलवी उनके साथ हैं, हाँ कुछ मौलवी उनके साथ घूमते ज़रुर रहते हैं."

लेकिन मुस्लिम समुदाय को फ़ायदे-नुक़सान के मुद्दे पर वे कहते हैं, "समाज को फ़ायदा तो हो रहा है."

विरोध

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Image caption मुस्लिम समुदाय में परिवार नियोजन को लेकर कोई साफ़ दृष्टिकोण नहीं है

लेकिन कई धार्मिक नेता अभी भी इसके ख़िलाफ़ हैं.

मौलाना निज़ामुद्दीन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव हैं और इमरात-ए-शरिया फुलवारी शरीफ़, पटना के प्रमुख हैं.

बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, "चंद औलादों के बाद अगर कोई शख्स एहतियात बरते और अपने परिवार को छोटा रखे और नसबंदी न करवाए तो इसमें ऐतराज़ नहीं है लेकिन नसबंदी ग़लत है."

वे कहते हैं, "नसबंदी करना या ये पाबंदी लगा देना कि दो से ज़्यादा औलादें न हों, नहीं तो नौकरी नहीं मिलेगी या चुनाव नहीं लड़ सकेंगे ये ग़लत है."

मौलामा निज़ामुद्दीन कहते हैं, "क़ुरान और हदीस में कहा गया है कि औरत और मर्द को बनाया ही इसलिए गया है कि आबादी में इज़ाफ़ा हो और वो हो रहा है. आबादी बढ़ जाएगी तो कैसे रहेंगे, कैसे खाएँगे ये चिंता करने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि अल्लाह ने इंसान को इतनी अक्ल दे दी है कि वो इंतज़ाम कर सकता है."

डॉक्टर इलियास अली के अभियान पर वे कहते हैं कि क़ुरान की जिन आयतों का वे ज़िक्र कर रहे हैं उनके बारे में वे भी जानते हैं और इसमें दो बच्चों के बीच अंतराल के बारे में कहा गया है ना कि नसबंदी पर.

मौलाना सलाह देते हैं कि जो लोग क़ुरान का ज़िक्र करते हैं उन्हें हदीस का भी अध्ययन करना चाहिए क्योंकि हदीस में ही समझाया गया है कि आयतों का क्या अर्थ है.

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