बीएमसी चुनाव: 'भाजपा-सेना गठबंधन के गढ़ में सेंध की आशंका'

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Image caption बीएमसी चुनाव पर राजनीतिक विश्लेषकों की नज़रें लगी हैं

देश में सबसे बड़ी मुंबई महानगरपालिका के गुरुवार को संपन्न हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना गठबंधन के गढ़ में सेंध लगने की संभावना दिख रही है.

ये देश की सबसे धनी महानगरपालिका भी है जिसका बजट 21 हज़ार करोड़ का होता है.

इस बार के चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा स्थानीय सुविधाओं का था. मुंबई की सड़कों की हालत, मुंबई में ट्रैफ़िक, फ़्लाईओवर और पानी की आपूर्ति सबसे बड़े मुद्दे थे.

इसके अलावा मुंबई के बाहर से आकर झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों की मान्यता का मुद्दा भी काफ़ी उछला.

इस बार कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी या एनसीपी ने इस महानगरपालिका चुनाव के लिए गठबंधन किया है और माना जा रहा है कि उन्हें इसका फ़ायदा वैसे ही मिलेगा जैसा उन्हें लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर लड़ने की वजह से हुआ था.

लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को अपने गढ़ मुंबई में हार का सामना करना पड़ा था.

कांग्रेस इस गठबंधन की प्रमुख पार्टी है और एनसीपी उसके छोटे भाई की भूमिका निभा रही है.

गठबंधन

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Image caption शरद पवार ने इस बार जमकर प्रचार किया है

इस गठबंधन को इस बात का भी फ़ायदा होता दिख रहा है कि उनके कद्दावर नेता शरद पवार ने इस चुनाव में काफ़ी जमकर प्रचार किया.

इतना ही नहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण का ये पहला चुनाव है और उन्होंने भी प्रचार में कोई क़सर नहीं छोड़ी है.

इस चुनाव में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना या मनसे का भी असर दिख रहा है.

पिछली बार भी उन्होंने बीएमसी का चुनाव लड़ा था, हालाँकि उन्हें कोई सीट नहीं मिली थी.

मगर मुंबई से विधानसभा की 34 में से 10 सीटें जीतने में वह ज़रूर क़ामयाब रही.

साथ ही मनसे ने शिवसेना को उसके गढ़ में काफ़ी चुनौती दी है. शिवसेना का गढ़ मध्य मुंबई में माना जाता है जहाँ दादर और परेल जैसे इलाक़े हैं.

वैसे इस बार भी मनसे अगर ज़्यादा सीटें नहीं भी जीत पाती है जितना उसका प्रचार हो रहा है तब भी उसकी भूमिका निर्णायक हो सकती है.

विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में किसी एक गठबंधन को संभवतः पूर्ण बहुमत न मिले. ऐसे में मनसे की भूमिका निर्णायक हो सकती है.

वैसे राज ठाकरे की पार्टी के कारण कांग्रेस को फ़ायदा होता दिख रहा है.

उत्तर भारतीयों और हिंदी भाषियों का जो राज ठाकरे के प्रति ग़ुस्सा है उसका ही कांग्रेस को फ़ायदा हो रहा है क्योंकि ये दोनों वर्ग इस बार चुनाव में कमर कसकर उतरे हैं और कांग्रेस गठबंधन की ओर उनका रुख़ साफ़ दिख रहा है.

(बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से बातचीत पर आधारित)

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